धर्म-कर्म फोटो स्टोरी
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धर्म-कर्म8नई शादी के बाद कपल्स क्यों जाते हैं मंगलागौरी मंदिर? जानिए खास वजह
गया जी सिर्फ पिंडदान और मोक्ष की भूमि ही नहीं, बल्कि देवी शक्ति की उपासना का भी प्रमुख केंद्र है. मंगला गौरी पहाड़ी पर स्थित मां मंगला गौरी मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है. धार्मिक मान्यता है कि यहां माता सती का वक्षस्थल गिरा था. यही वजह है कि मां मंगला गौरी को मातृशक्ति, सौभाग्य और मंगल का प्रतीक माना जाता है. खासकर नवविवाहित जोड़े और महिलाएं यहां सुखी दांपत्य जीवन, परिवार की खुशहाली और वैवाहिक सुख की कामना लेकर पहुंचते हैं. सावन के मंगलवार को इस मंदिर की महिमा और भी खास हो जाती है.
धर्म-कर्म9भारत का सबसे प्राचीन जीवित मंदिर! जहां आज भी सांस लेता है हजारों साल का इतिहास
भारत का सबसे पुराना जीवित मंदिर... जहां इतिहास से भी पुरानी लगती है आस्था, बिहार के कैमूर जिले की पवरा पहाड़ी पर स्थित मां मुंडेश्वरी मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता, स्थापत्य और सनातन परंपरा का जीवंत प्रमाण है. सदियों से यहां पूजा लगातार जारी है. यही वजह है कि इसे भारत के सबसे प्राचीन जीवित मंदिरों में गिना जाता है.
धर्म-कर्म8सावन 2026 का शुभारंभ: आज से शुरू हुई भोलेनाथ की आराधना
भगवान शिव की भक्ति, आस्था और आध्यात्म का सबसे पवित्र महीना सावन आज से शुरू हो गया है. जलाभिषेक, व्रत, मंत्र जाप और शिव आराधना के इस विशेष अवसर पर जानिए सावन का धार्मिक महत्व, पूजा की सही विधि, शुभ मुहूर्त और वे मान्यताएँ, जो इस पूरे महीने को शिव भक्तों के लिए बेहद खास बनाती हैं.
धर्म-कर्म9जहां ‘मूर्ख’ कालिदास को मिला ज्ञान का वरदान, जानें उच्चैठ भगवती की कहानी
बिहार के मधुबनी जिले में स्थित उच्चैठ भगवती स्थान सिर्फ आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि एक ऐसी प्रसिद्ध लोककथा से भी जुड़ा है, जिसमें एक साधारण और अल्पज्ञ माने जाने वाले कालिदास को माँ भगवती के आशीर्वाद से ज्ञान प्राप्त होने की बात कही जाती है. मंदिर की अनोखी प्रतिमा, उफनती नदी, रात में दीप जलाने की कहानी और देवी के वरदान से जुड़ी यह कथा आज भी लोगों को आकर्षित करती है. कहा जाता है कि यहीं से कालिदास के जीवन ने ऐसी दिशा बदली, जिसने उन्हें संस्कृत साहित्य के महान कवियों में शामिल कर दिया.
धर्म-कर्म8परंपरा बदली, सोच बदली: बनारस में बेटियाँ सीख रहीं पुजारी बनने की कला
जहाँ कभी पूजा-पाठ और वेदों की शिक्षा को सिर्फ पुरुषों तक सीमित माना जाता था, वहीं बनारस की बेटियाँ अब वेद-मंत्र सीखकर पुजारी बनने की राह पर आगे बढ़ रही हैं. यह पहल न सिर्फ परंपराओं को नई दिशा दे रही है, बल्कि महिला सशक्तिकरण की एक नई तस्वीर भी पेश कर रही है.
धर्म-कर्म9शंखों पर गूंजती हैं पुराणों की कथाएँ: बब्लू नंदी की अनोखी शंख कला
शंख भारतीय संस्कृति, आस्था और परंपरा का महत्वपूर्ण प्रतीक है. लेकिन पश्चिम बंगाल के बाँकुड़ा ज़िले के प्रसिद्ध शंख शिल्पी बब्लू नंदी ने इसे अपनी अद्भुत नक्काशी के माध्यम से कला का अनमोल रूप दे दिया है. वे और उनका परिवार साधारण शंख पर देवी-देवताओं की आकृतियाँ, महाभारत और रामायण के दृश्य, लोककथाएँ तथा सामाजिक संदेशों को जीवंत बना देते हैं. महीनों की मेहनत, धैर्य और बारीक कारीगरी से तैयार होने वाली उनकी हर रचना भारतीय हस्तशिल्प की अनूठी पहचान है. इसी उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें राष्ट्रीय हस्तशिल्प पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है. आइए जानते हैं इस अद्भुत कला और इसके पीछे छिपे समर्पण की कहानी.
धर्म-कर्म8कौन हैं भगवान जगन्नाथ की 'मौसी'? जानिए गुंडिचा देवी की पूरी कहानी
हर साल निकलने वाली भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा केवल एक भव्य धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि प्रेम, आस्था और पारिवारिक रिश्तों का अद्भुत प्रतीक भी है. इस यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा श्रीमंदिर से निकलकर गुंडिचा मंदिर पहुंचते हैं, जिसे भक्त भगवान का 'मायका' मानते हैं. मान्यता है कि यहां भगवान अपनी प्रिय 'मौसी' गुंडिचा देवी से मिलने आते हैं. आखिर गुंडिचा देवी कौन थीं, उन्हें भगवान की 'मौसी' क्यों कहा जाता है और इस परंपरा के पीछे कौन-कौन सी धार्मिक मान्यताएं जुड़ी हैं? आइए जानते हैं इस अनोखी और सदियों पुरानी कथा के बारे में.
धर्म-कर्म615 दिन दर्शन क्यों नहीं देते भगवान जगन्नाथ..क्या है भगवान जगन्नाथ का अनासार काल !
भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा से पहले एक ऐसी अनोखी परंपरा निभाई जाती है, जिसके तहत भगवान 15 दिनों तक भक्तों को दर्शन नहीं देते. आखिर इस एकांतवास (अनासार काल) का क्या महत्व है और इसके पीछे क्या धार्मिक मान्यता है? आइए जानते हैं इसकी पूरी कहानी.
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