नई शादी के बाद कपल्स क्यों जाते हैं मंगलागौरी मंदिर? जानिए खास वजह

  • August 8, 2026 2:57 pm
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गया जी सिर्फ पिंडदान और मोक्ष की भूमि ही नहीं, बल्कि देवी शक्ति की उपासना का भी प्रमुख केंद्र है. मंगला गौरी पहाड़ी पर स्थित मां मंगला गौरी मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है. धार्मिक मान्यता है कि यहां माता सती का वक्षस्थल गिरा था. यही वजह है कि मां मंगला गौरी को मातृशक्ति, सौभाग्य और मंगल का प्रतीक माना जाता है. खासकर नवविवाहित जोड़े और महिलाएं यहां सुखी दांपत्य जीवन, परिवार की खुशहाली और वैवाहिक सुख की कामना लेकर पहुंचते हैं. सावन के मंगलवार को इस मंदिर की महिमा और भी खास हो जाती है.

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गया जी की मंगला गौरी पहाड़ी पर स्थित मां मंगला गौरी मंदिर आस्था का बड़ा केंद्र है. इसे देवी सती से जुड़े 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है. खास बात यह है कि नवविवाहित जोड़े यहां सुखी और मंगलमय दांपत्य जीवन की कामना लेकर आते हैं. मान्यता है कि मां मंगला गौरी का आशीर्वाद वैवाहिक जीवन में सुख, समृद्धि और प्रेम बनाए रखने में सहायक होता है. पति-पत्नी साथ में मां के दर्शन कर अपने नए जीवन की शुभ शुरुआत के लिए प्रार्थना करते हैं.

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गया का मां मंगला गौरी मंदिर धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. यह मंदिर मंगला गौरी पहाड़ी पर स्थित है और यहां सालभर श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है. मंदिर को देवी सती के शक्तिपीठों में शामिल माना जाता है. यहां मां के दर्शन करने वाले भक्त सुख, सौभाग्य, परिवार की खुशहाली और मंगल की कामना करते हैं. विशेष रूप से सावन के मंगलवार को मंदिर में पूजा और दर्शन का महत्व बढ़ जाता है. नवविवाहित जोड़ों के लिए भी यह स्थान विशेष आस्था का केंद्र है.

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पौराणिक कथा के अनुसार माता सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में हुए अपमान से दुखी होकर अपने प्राण त्याग दिए थे. भगवान शिव माता सती के शरीर को लेकर शोक में विचरण करने लगे. इससे सृष्टि का संतुलन बिगड़ने लगा. तब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर को कई भागों में विभाजित किया. मान्यता है कि जहां-जहां माता सती के अंग या आभूषण गिरे, वहां शक्तिपीठ स्थापित हुए. गया का मंगला गौरी मंदिर भी इन्हीं पवित्र शक्तिपीठों में माना जाता है.

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धार्मिक मान्यता के अनुसार गया की मंगला गौरी पहाड़ी पर माता सती का वक्षस्थल गिरा था. इसी वजह से मां मंगला गौरी को पोषण, मातृशक्ति और कल्याण का प्रतीक माना जाता है. श्रद्धालु मां से अपने परिवार की सुख-शांति और समृद्धि की प्रार्थना करते हैं. माता के इस स्वरूप को करुणा और शक्ति से भी जोड़ा जाता है. यही धार्मिक मान्यता गया के इस मंदिर को दूसरे शक्तिपीठों से अलग और विशेष बनाती है. यहां आने वाले भक्त मां के दर्शन को अपने जीवन के लिए मंगलकारी मानते हैं.

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मां मंगला गौरी को देवी सती और माता पार्वती का कल्याणकारी स्वरूप माना जाता है. ‘मंगला’ यानी शुभ और कल्याण करने वाली मां के रूप में भक्त उनकी पूजा करते हैं. श्रद्धालु यहां परिवार की सुख-समृद्धि, सौभाग्य, शांति और मंगल की कामना करते हैं. विशेष रूप से महिलाएं मां की पूजा कर परिवार और पति के कल्याण की प्रार्थना करती हैं. इसी आस्था के कारण मंगला गौरी मंदिर वैवाहिक जीवन और पारिवारिक सुख से भी जुड़ गया है. मां के दरबार में नवविवाहित जोड़े भी आशीर्वाद लेने पहुंचते हैं.

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नवविवाहित जोड़ों के लिए मां मंगला गौरी मंदिर खास आस्था का स्थान है. बिहार पर्यटन से जुड़ी जानकारी के अनुसार, नए शादीशुदा जोड़े यहां सुखी, समृद्ध और मंगलमय दांपत्य जीवन की कामना लेकर आते हैं. पति-पत्नी साथ में मां के दर्शन करते हैं और अपने नए जीवन के लिए आशीर्वाद मांगते हैं. यह कोई अनिवार्य विवाह रस्म नहीं है, बल्कि श्रद्धा और परंपरा से जुड़ी मान्यता है. माना जाता है कि मां का आशीर्वाद दंपती के जीवन में प्रेम, सुख और पारिवारिक खुशहाली बनाए रखे.

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श्रावण मास के प्रत्येक मंगलवार को मां मंगला गौरी की विशेष पूजा और व्रत करने की परंपरा है. विवाहित महिलाएं पति की लंबी उम्र, परिवार की सुख-समृद्धि और वैवाहिक जीवन के मंगल की कामना करती हैं. एक प्रचलित पूजा परंपरा में मां को 16 चूड़ियां, 7 फल और 5 मिठाइयां अर्पित की जाती हैं. सावन के मंगलवार को मंदिर में विशेष भीड़ देखने को मिलती है. नवविवाहित महिलाओं के लिए भी मंगला गौरी व्रत को विशेष शुभ माना जाता है.

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गया जी का मां मंगला गौरी शक्तिपीठ सिर्फ धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि आस्था और पारिवारिक मंगल से जुड़ी परंपराओं का केंद्र भी है. यहां माता सती की कथा मातृशक्ति और पोषण का प्रतीक मानी जाती है. सावन के मंगलवार दांपत्य सुख और परिवार की खुशहाली की प्रार्थना से जुड़े हैं. वहीं नवविवाहित जोड़े अपने नए जीवन की शुरुआत मां के आशीर्वाद के साथ करने पहुंचते हैं. यही वजह है कि गया की मंगला गौरी पहाड़ी आज भी श्रद्धालुओं के लिए बेहद खास बनी हुई है.