पुनौरा धाम: जहां की मिट्टी ने दी भारत को मां जानकी

  • August 16, 2026 12:49 pm
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मिथिला की पावन धरती सिर्फ अपनी संस्कृति और परंपराओं के लिए ही नहीं, बल्कि माता सीता से जुड़े अपने गहरे धार्मिक इतिहास के लिए भी प्रसिद्ध है. बिहार के सीतामढ़ी स्थित पुनौरा धाम को धार्मिक मान्यता में माँ जानकी की जन्मभूमि माना जाता है. मान्यता है कि राजा जनक जब यज्ञ के लिए भूमि तैयार करते हुए हल चला रहे थे, तभी हल की रेखा से एक दिव्य कन्या प्रकट हुईं. यही कन्या आगे चलकर सीता, जानकी, मैथिली और वैदेही के नाम से प्रसिद्ध हुईं. आज पुनौरा धाम का जानकी मंदिर और सीता कुंड उस प्राचीन आस्था की जीवंत पहचान हैं. आइए जानते हैं उस पावन धाम की कहानी, जहां मिट्टी, मातृत्व और मिथिला की संस्कृति एक साथ दिखाई देती है.

पुनौरा धाम: जहां की मिट्टी ने दी भारत को मां जानकी
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सीतामढ़ी से करीब 5 किलोमीटर पश्चिम स्थित पुनौरा धाम को धार्मिक परंपरा में माता सीता की जन्मभूमि माना जाता है. यहां का जानकी मंदिर और सीता कुंड सदियों से श्रद्धा का केंद्र रहे हैं. मान्यता है कि इसी पवित्र भूमि पर राजा जनक को खेत जोतते समय हल की रेखा से एक दिव्य कन्या प्राप्त हुई थी. वही कन्या आगे चलकर माता सीता, जानकी और वैदेही के नाम से प्रसिद्ध हुईं. पुनौरा धाम आज भी मिथिला की उस गौरवशाली परंपरा और सीता के धरती से जुड़े रिश्ते की जीवंत स्मृति है.

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सीतामढ़ी से करीब 5 किलोमीटर पश्चिम स्थित पुनौरा धाम को धार्मिक परंपरा में माता सीता की जन्मभूमि माना जाता है. यहां का जानकी मंदिर और सीता कुंड सदियों से श्रद्धा का केंद्र रहे हैं. मान्यता है कि इसी पवित्र भूमि पर राजा जनक को खेत जोतते समय हल की रेखा से एक दिव्य कन्या प्राप्त हुई थी. वही कन्या आगे चलकर माता सीता, जानकी और वैदेही के नाम से प्रसिद्ध हुईं. पुनौरा धाम आज भी मिथिला की उस गौरवशाली परंपरा और सीता के धरती से जुड़े रिश्ते की जीवंत स्मृति है.

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वाल्मीकि रामायण के बालकांड में राजा जनक द्वारा सीता के प्राकट्य की कथा मिलती है. जनक बताते हैं कि यज्ञ के लिए भूमि तैयार करते समय वे स्वयं खेत जोत रहे थे. उसी दौरान हल की रेखा से एक दिव्य कन्या प्रकट हुई. राजा ने उन्हें अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया. इसीलिए सीता को जनकनंदिनी और जानकी भी कहा गया. पुनौरा धाम इसी परंपरा से जुड़ा प्रमुख धार्मिक स्थल है. यहां आने वाले श्रद्धालु सीता कुंड और जानकी मंदिर के दर्शन कर उस पौराणिक कथा से जुड़ाव महसूस करते हैं.

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सीता’ नाम अपने आप में उनकी जन्मकथा को समेटे हुए है. संस्कृत में ‘सीता’ का अर्थ खेत में हल चलाने से बनी रेखा या क्यारी से जुड़ा है. धार्मिक कथा के अनुसार माता सीता का प्राकट्य भी हल की इसी रेखा से हुआ था. इसलिए उनका नाम सीता पड़ा. उन्हें जानकी इसलिए कहा गया क्योंकि वे राजा जनक की पुत्री थीं. मिथिला से जुड़ाव के कारण वे मैथिली और विदेह से संबंध के कारण वैदेही कहलाती हैं. उनके अलग-अलग नाम उनके व्यक्तित्व के साथ-साथ मिथिला की सांस्कृतिक पहचान को भी सामने लाते हैं.

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माता सीता के नामों में मिथिला की पूरी पहचान दिखाई देती है. ‘सीता’ उन्हें हल की रेखा से जोड़ता है, ‘जानकी’ राजा जनक की पुत्री होने का परिचय देता है. ‘मैथिली’ उन्हें मिथिला की राजकुमारी के रूप में पहचान देता है, जबकि ‘वैदेही’ विदेह की पुत्री होने का संकेत है. इन नामों में केवल धार्मिक भावनाएं नहीं, बल्कि मिथिला की संस्कृति, धरती और परंपरा भी समाई हुई है. पुनौरा धाम इसी बहुआयामी पहचान का महत्वपूर्ण केंद्र है, जहां श्रद्धालु माता जानकी के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करने पहुंचते हैं.

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सीता के प्राकट्य की कथा को केवल धार्मिक चमत्कार के रूप में ही नहीं, बल्कि मिथिला की कृषि संस्कृति के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है. हल वह साधन है जो धरती से अन्न पैदा करता है और उसी हल की रेखा से सीता के प्रकट होने की कथा जुड़ी है. धरती ने कन्या दी और राजा जनक ने उन्हें बेटी के रूप में स्वीकार किया. यह कथा बेटी को स्वीकार करने, सम्मान देने और स्नेह से पालने का संदेश भी देती है. इसलिए सीता की कहानी आज भी सामाजिक और सांस्कृतिक अर्थ रखती है.

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पुनौरा धाम परिसर में माता जानकी का मंदिर, सीता कुंड, पूजा स्थल और हवन मंडप प्रमुख आकर्षण हैं. बिहार पर्यटन के अनुसार यह स्थान महर्षि पुंडरीक के आश्रम की परंपरा से भी जुड़ा हुआ है. राम नवमी और सीता नवमी जैसे अवसरों पर यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं. सीता कुंड को लेकर भी धार्मिक आस्था जुड़ी हुई है. मंदिर परिसर में श्रद्धालु पूजा-अर्चना करते हैं और माता जानकी के प्राकट्य की कथा को स्मरण करते हैं. पुनौरा धाम इसलिए सिर्फ मंदिर नहीं, बल्कि मिथिला की सांस्कृतिक स्मृति का भी केंद्र है.

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पुनौरा धाम की धार्मिक मान्यता त्रेता युग की कथा से जुड़ी है, लेकिन वर्तमान मंदिर की संरचना अपेक्षाकृत आधुनिक मानी जाती है. सीतामढ़ी जिले के ऐतिहासिक विवरण के अनुसार वर्तमान जानकी मंदिर का स्वरूप लगभग 100 वर्ष पुराना है. इससे पहले करीब 500 वर्ष पूर्व संत बीरबल दास द्वारा इस स्थल को फिर से धार्मिक पहचान दिलाने की परंपरा का उल्लेख मिलता है. यानी पुनौरा की आस्था और स्थल की स्मृति बहुत पुरानी है, जबकि आज दिखाई देने वाली मंदिर संरचना बाद के समय में विकसित हुई.

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पुनौरा धाम को आधुनिक धार्मिक और पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में भी काम शुरू हुआ है. 8 अगस्त 2025 को इसके व्यापक विकास परियोजना का भूमि पूजन किया गया. करीब 890 करोड़ रुपये की योजना में 68 एकड़ से अधिक क्षेत्र के विकास की बात कही गई है. प्रस्तावित कार्यों में मंदिर का जीर्णोद्धार, परिक्रमा पथ, ध्यान वाटिका, धार्मिक जलस्रोतों का पुनर्विकास, धर्मशाला, यात्री सुविधाएं और डिजिटल गैलरी शामिल हैं. इससे पुनौरा धाम में श्रद्धालुओं के साथ पर्यटकों के लिए भी सुविधाएं बढ़ने की उम्मीद है.

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राम की कथा अयोध्या से जुड़ी है, लेकिन उसकी आत्मा में मिथिला की जानकी भी हैं. पुनौरा धाम उस भूमि की पहचान है, जहां धार्मिक परंपरा माता सीता के प्राकट्य की कथा से जुड़ी है. यहां हल की एक रेखा बेटी के जन्म और धरती की उर्वरता का प्रतीक बन जाती है. सीता की कहानी में मिथिला की मिट्टी, कृषि संस्कृति, मातृशक्ति और बेटी के सम्मान का संदेश दिखाई देता है. बिहार के सीतामढ़ी का पुनौरा धाम इसलिए केवल आस्था का स्थल नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक स्मृति का महत्वपूर्ण अध्याय है.