मंदार पर्वत: समुद्र मंथन से वासुपूज्य तक, आस्था और इतिहास का अद्भुत संगम

  • August 14, 2026 1:25 pm
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बिहार के बांका जिले में स्थित मंदार पर्वत सिर्फ एक पहाड़ नहीं, बल्कि आस्था, इतिहास और पौराणिक कथाओं का अनोखा संगम है. हिंदू मान्यता में इसे समुद्र मंथन की मथानी माना जाता है, तो जैन धर्म में यह भगवान वासुपूज्य स्वामी से जुड़ा पवित्र स्थल है. पर्वत की चट्टानों, मंदिरों और आसपास के धार्मिक स्थलों से जुड़ी कई कहानियां आज भी लोगों को आकर्षित करती हैं. पापहरणी सरोवर से लेकर पर्वत के शिखर तक, मंदार की हर जगह अपने अंदर एक अलग कहानी समेटे हुए है. आइए जानते हैं इस खास पर्वत से जुड़ी धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परंपराओं के बारे में.

मंदार पर्वत: समुद्र मंथन से वासुपूज्य तक, आस्था और इतिहास का अद्भुत संगम
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मंदार पर्वत: समुद्र मंथन से वासुपूज्य तक, आस्था और इतिहास का अद्भुत संगम - Photo 1

बिहार के बांका जिले के बौंसी में मंदार पर्वत स्थित है. ऊंचा ग्रेनाइट का पहाड़ दूर से ही नजर आता है. इसकी तलहटी में पापहरणी सरोवर है, जिसके बीच लक्ष्मी-नारायण मंदिर बना है. मंदार सिर्फ अपनी सुंदरता के लिए ही नहीं, बल्कि धार्मिक मान्यताओं के लिए भी प्रसिद्ध है. हिंदू धर्म में इसे समुद्र मंथन से जोड़ा जाता है. वहीं जैन धर्म में यह भगवान वासुपूज्य स्वामी से जुड़ा पवित्र स्थान माना जाता है. यही वजह है कि मंदार पर्वत को बिहार की खास धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर माना जाता है.

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मंदार पर्वत बिहार के बांका जिले के बौंसी में स्थित है. चारों तरफ फैले मैदान के बीच यह बड़ा पहाड़ आसानी से दिखाई देता है. यह ग्रेनाइट की चट्टानों से बना है। पर्वत की तलहटी में पापहरणी सरोवर है. सरोवर के बीच बने लक्ष्मी-नारायण मंदिर का दृश्य बेहद सुंदर लगता है. यहां हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक पहुंचते हैं. पर्वत के आसपास का शांत वातावरण और प्राकृतिक सुंदरता लोगों को आकर्षित करती है. धार्मिक महत्व के साथ मंदार अपने इतिहास और प्राकृतिक खूबसूरती के कारण भी बिहार के प्रमुख दर्शनीय स्थलों में शामिल है.

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मंदार पर्वत का सबसे प्रसिद्ध संबंध समुद्र मंथन की कहानी से है. धार्मिक मान्यता के अनुसार देवताओं और असुरों ने अमृत पाने के लिए समुद्र मंथन किया था. इसके लिए मंदार पर्वत को मथानी और वासुकी नाग को रस्सी बनाया गया था. समुद्र मंथन से अमृत सहित कई खास चीजों के निकलने की कथा मिलती है. इसी वजह से मंदार पर्वत को हिंदू धर्म में खास स्थान मिला है. आज भी यहां आने वाले श्रद्धालु समुद्र मंथन से जुड़ी इस कहानी को याद करते हैं. मंदार की पहचान इसी पौराणिक कथा के कारण देशभर में बनी हुई है.

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मंदार पर्वत की चट्टानों पर कुछ घुमावदार निशान दिखाई देते हैं. स्थानीय मान्यता के अनुसार इन निशानों का संबंध वासुकी नाग से है. कहा जाता है कि समुद्र मंथन के समय वासुकी नाग को मंदार पर्वत के चारों ओर लपेटा गया था. बिहार पर्यटन के विवरण में भी इस मान्यता का जिक्र मिलता है. हालांकि इन निशानों को प्राकृतिक चट्टानी संरचना के रूप में भी देखा जाता है. यही कारण है कि मंदार पर आस्था और प्रकृति दोनों साथ दिखाई देते हैं. इन चट्टानों को देखने के लिए भी लोग पर्वत पर पहुंचते हैं और यहां की कहानी जानने में रुचि लेते हैं.

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मंदार पर्वत की चट्टानों पर कुछ घुमावदार निशान दिखाई देते हैं. स्थानीय मान्यता के अनुसार इन निशानों का संबंध वासुकी नाग से है. कहा जाता है कि समुद्र मंथन के समय वासुकी नाग को मंदार पर्वत के चारों ओर लपेटा गया था. बिहार पर्यटन के विवरण में भी इस मान्यता का जिक्र मिलता है. हालांकि इन निशानों को प्राकृतिक चट्टानी संरचना के रूप में भी देखा जाता है. यही कारण है कि मंदार पर आस्था और प्रकृति दोनों साथ दिखाई देते हैं. इन चट्टानों को देखने के लिए भी लोग पर्वत पर पहुंचते हैं और यहां की कहानी जानने में रुचि लेते हैं.

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दार पर्वत जैन धर्म के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है. जैन परंपरा में इसे मंदारगिरि सिद्ध क्षेत्र कहा जाता है. यह स्थान जैन धर्म के 12वें तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य स्वामी से जुड़ा हुआ माना जाता है. पर्वत के ऊपर दिगंबर जैन मंदिर भी स्थित है. यहां भगवान वासुपूज्य से जुड़े धार्मिक स्थलों के दर्शन करने के लिए जैन श्रद्धालु आते हैं. इस तरह मंदार केवल हिंदू धर्म का ही पवित्र स्थान नहीं है. यह जैन धर्म की आस्था का भी बड़ा केंद्र है. एक ही पर्वत से दो अलग धार्मिक परंपराओं का जुड़ना इसे और खास बनाता है.

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जैन धर्म में मंदारगिरि को भगवान वासुपूज्य स्वामी के तीन प्रमुख कल्याणकों से जुड़ा माना जाता है. इनमें दीक्षा या तप, केवलज्ञान और मोक्ष शामिल हैं. पर्वत पर इनसे जुड़ी धार्मिक यादों और चरणचिह्नों को श्रद्धा से पूजा जाता है. अलग-अलग जैन परंपराओं में इन स्थानों को लेकर कुछ अंतर भी मिल सकता है. लेकिन भगवान वासुपूज्य और मंदार का संबंध जैन धर्म में बहुत महत्वपूर्ण है. आज भी देश के अलग-अलग हिस्सों से जैन श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं. मंदिर और धार्मिक स्थल मंदार की पुरानी जैन परंपरा को आज भी आगे बढ़ा रहे हैं.

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मंदार पर्वत की पहचान सिर्फ धार्मिक कहानियों से नहीं है. यहां इतिहास से जुड़े प्रमाण भी मिले हैं. बांका जिला प्रशासन के अनुसार, यहां मिले आदित्यसेन के अभिलेख में नरसिंह या नरहरि मंदिर की स्थापना का उल्लेख मिलता है. पर्वत पर आज भी नरसिंह मंदिर और दिगंबर जैन तीर्थ मौजूद हैं. यानी मंदार पर कहानी, इतिहास और धर्म तीनों साथ दिखाई देते हैं. समुद्र मंथन की मान्यता हो या भगवान वासुपूज्य से जुड़ी जैन परंपरा, मंदार की अपनी अलग पहचान है. यही वजह है कि यह पर्वत बिहार की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का खास हिस्सा माना जाता है.