गया का विष्णुपद मंदिर: जहां भगवान विष्णु के चरणों से मिली मोक्ष की राह

  • August 7, 2026 3:08 pm
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बिहार के गया में स्थित विष्णुपद मंदिर केवल एक प्राचीन मंदिर नहीं, बल्कि आस्था, इतिहास और पौराणिक मान्यताओं का अद्भुत संगम है. मान्यता है कि यहीं भगवान विष्णु के चरणों का पवित्र पदचिह्न अंकित है, जिसने गया को मोक्षधाम की पहचान दिलाई. गयासुर की कथा, पिंडदान की परंपरा और भगवान श्रीराम से जुड़ी मान्यताओं के कारण यह मंदिर आज भी लाखों श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है.

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बिहार के गया शहर में फल्गु नदी के तट पर स्थित विष्णुपद मंदिर देश के सबसे पवित्र वैष्णव तीर्थों में से एक माना जाता है. यह मंदिर केवल अपनी प्राचीन वास्तुकला के लिए ही नहीं, बल्कि भगवान विष्णु के दिव्य पदचिह्न के कारण भी विश्वभर में प्रसिद्ध है. मान्यता है कि यहीं भगवान विष्णु ने गयासुर को अपने चरणों से दबाया था. इसी कारण गया को मोक्षधाम कहा जाता है. हर वर्ष लाखों श्रद्धालु यहां दर्शन, पूजा और पिंडदान के लिए पहुंचते हैं.

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विष्णुपद मंदिर के गर्भगृह में काले बेसाल्ट पत्थर पर लगभग 40 सेंटीमीटर लंबा पदचिह्न सुरक्षित है. श्रद्धालु इसे भगवान विष्णु का वास्तविक चरणचिह्न मानकर श्रद्धापूर्वक पूजा करते हैं. जिस पवित्र चट्टान पर यह पदचिह्न अंकित है, उसे धर्मीशिला कहा जाता है. मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यही दिव्य पदचिह्न है, जिसके दर्शन के लिए देश-विदेश से श्रद्धालु आते हैं. माना जाता है कि इस स्थान पर भगवान विष्णु की दिव्य शक्ति आज भी विद्यमान है.

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पुराणों के अनुसार गयासुर एक अत्यंत शक्तिशाली असुर था, जिसने कठोर तपस्या कर अद्भुत आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त कर ली थी. उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर देवताओं ने उसे ऐसा वरदान दिया कि उसके दर्शन मात्र से लोगों को मोक्ष मिलने लगा. इससे यज्ञ, तप और अन्य धार्मिक कर्मों का महत्व कम होने लगा और सृष्टि का संतुलन बिगड़ने लगा। तब देवताओं ने भगवान विष्णु से सहायता मांगी ताकि धर्म व्यवस्था को फिर से स्थापित किया जा सके

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गयासुर की कथा के कई रूप मिलते हैं, लेकिन सभी कथाओं में एक बात समान है. भगवान विष्णु ने गयासुर को शांत करने और धर्म की रक्षा के लिए उसकी छाती पर अपना चरण रखा. मान्यता है कि उसी क्षण पत्थर पर भगवान विष्णु का पदचिह्न अंकित हो गया. गयासुर ने भगवान से प्रार्थना की कि यह स्थान सदैव पवित्र तीर्थ बना रहे. तभी से यह स्थान मोक्ष प्राप्ति और पूर्वजों के श्राद्ध का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है.

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ऐसी मान्यता है कि बिहार के गया शहर का नाम भी गयासुर के नाम पर पड़ा. भगवान विष्णु के चरणों के नीचे गयासुर का शरीर पवित्र भूमि में परिवर्तित हो गया. आगे चलकर यही स्थान पितरों के श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान का सबसे बड़ा केंद्र बन गया. आज भी लाखों श्रद्धालु अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और मोक्ष की कामना लेकर यहां आते हैं. इसलिए गया केवल एक शहर नहीं, बल्कि सनातन आस्था का महत्वपूर्ण तीर्थ माना जाता है.

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विष्णुपद मंदिर का मूल धार्मिक इतिहास अत्यंत प्राचीन माना जाता है, हालांकि इसकी सटीक स्थापना का समय ज्ञात नहीं है. वर्तमान भव्य मंदिर का निर्माण 1787 ईस्वी में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होलकर ने कराया था. उन्होंने देशभर के अनेक प्रसिद्ध मंदिरों का भी पुनर्निर्माण कराया था. विशाल पत्थरों से बना यह मंदिर अपनी अद्भुत वास्तुकला, ऊंचे शिखर और धार्मिक महत्व के कारण भारत की ऐतिहासिक धरोहरों में गिना जाता है.

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गया को पिंडदान के लिए सबसे पवित्र स्थान माना जाता है. यहां 48 प्रमुख पिंडदान स्थलों में विष्णुपद मंदिर, फल्गु नदी और अक्षयवट सबसे महत्वपूर्ण हैं. मान्यता है कि यहां पिंडदान करने से पूर्वजों की आत्मा को शांति और मोक्ष प्राप्त होता है. पौराणिक परंपरा के अनुसार भगवान श्रीराम और माता सीता भी अपने पिता राजा दशरथ के पिंडदान के लिए गया आए थे. इसी कारण यह स्थान रामायण से जुड़ी जीवित आस्था का भी केंद्र माना जाता है.

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विष्णुपद मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, इतिहास और आस्था का अनमोल प्रतीक है. यहां भगवान विष्णु के चरणचिह्न, गयासुर की कथा, महारानी अहिल्याबाई होलकर का योगदान और पिंडदान की सदियों पुरानी परंपरा एक साथ दिखाई देती है. हर वर्ष देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु यहां अपने पूर्वजों को श्रद्धांजलि देने और भगवान विष्णु का आशीर्वाद लेने पहुंचते हैं. यही कारण है कि गया आज भी मोक्ष की नगरी और सनातन परंपरा के सबसे पवित्र तीर्थों में गिना जाता है.