विश्व आदिवासी दिवस: झारखंड के 10 आदिवासी नायक, जिन्होंने देश-दुनिया में बनाई अपनी पहचान

  • August 9, 2026 2:23 pm
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आदिवासी समाज सिर्फ अपनी समृद्ध संस्कृति और परंपराओं के लिए ही नहीं, बल्कि साहस, संघर्ष और बदलाव की कहानियों के लिए भी जाना जाता है. झारखंड की धरती ने ऐसे कई महान व्यक्तित्वों को जन्म दिया, जिन्होंने अपने अधिकारों, जल-जंगल-जमीन, शिक्षा, पर्यावरण और देश की रक्षा के लिए पूरी जिंदगी समर्पित कर दी. किसी ने अंग्रेजों के खिलाफ आवाज उठाई, तो किसी ने आदिवासी समाज की पहचान और अधिकारों के लिए संघर्ष किया. किसी ने जंगल और पानी बचाने का बीड़ा उठाया, तो किसी ने देश की सीमा पर अपने प्राण न्योछावर कर दिए. विश्व आदिवासी दिवस के मौके पर आइए जानें झारखंड के ऐसे ही 10 प्रेरणादायक आदिवासी व्यक्तित्वों की कहानी, जिनका संघर्ष और योगदान आज भी लाखों लोगों को प्रेरणा देता है.

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भगवान बिरसा मुंडा झारखंड के सबसे महान आदिवासी नायकों में गिने जाते हैं. उन्हें प्यार से ‘धरती आबा’ कहा जाता है. उन्होंने अंग्रेजी शासन और शोषण के खिलाफ आदिवासी समाज को एकजुट किया. उनके नेतृत्व में उलगुलान यानी महाविद्रोह हुआ. बिरसा मुंडा ने जल, जंगल और जमीन के अधिकार के लिए संघर्ष किया. उनका जीवन आदिवासी समाज के लिए साहस और स्वाभिमान की मिसाल है. कम उम्र में ही उन्होंने लोगों के बीच जागरूकता पैदा की. आज भी झारखंड और देशभर में उनके योगदान को याद किया जाता है.

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जयपाल सिंह मुंडा झारखंड और आदिवासी समाज के बड़े नेताओं में शामिल रहे. उन्हें ‘मरांग गोमके’ के नाम से सम्मान मिला. वे पढ़ाई में बेहद प्रतिभाशाली थे और खेल के क्षेत्र में भी अपनी पहचान बनाई. वे 1928 के एम्स्टर्डम ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम से जुड़े रहे. बाद में उन्होंने संविधान सभा में आदिवासी समाज के अधिकारों और पहचान की मजबूत आवाज उठाई. झारखंड अलग राज्य की मांग को आगे बढ़ाने में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा. उनका जीवन शिक्षा, खेल, राजनीति और सामाजिक अधिकारों के संघर्ष का उदाहरण है.

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डॉ. रामदयाल मुंडा झारखंड के प्रसिद्ध शिक्षाविद, भाषाविद, संगीतकार और आदिवासी संस्कृति के जानकार थे. उन्होंने आदिवासी भाषाओं, लोकगीतों, संगीत और परंपराओं को पहचान दिलाने के लिए लंबे समय तक काम किया. उनका मानना था कि आदिवासी संस्कृति देश की समृद्ध विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है. उन्होंने आदिवासी समाज की समस्याओं और अधिकारों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाया. उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया. वे शिक्षा और संस्कृति के माध्यम से समाज को आगे बढ़ाने में विश्वास रखते थे. उनका जीवन बताता है कि अपनी भाषा, कला और परंपरा को बचाकर भी आधुनिक दुनिया में आगे बढ़ा जा सकता है.

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शिबू सोरेन झारखंड आंदोलन के प्रमुख नेताओं में रहे हैं. उन्हें ‘दिशोम गुरु’ के नाम से जाना जाता है. उन्होंने लंबे समय तक आदिवासी और ग्रामीण समाज के अधिकारों के लिए संघर्ष किया. जल, जंगल और जमीन से जुड़े मुद्दे उनके राजनीतिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे. झारखंड राज्य के गठन के आंदोलन में भी उनकी बड़ी भूमिका रही. उन्होंने केंद्र सरकार में मंत्री और झारखंड के मुख्यमंत्री के रूप में भी जिम्मेदारी संभाली. उनका राजनीतिक सफर संघर्ष और जनआंदोलन से जुड़ा रहा है. विश्व आदिवासी दिवस पर शिबू सोरेन की कहानी बताती है कि लगातार संघर्ष और नेतृत्व से समाज की आवाज को मजबूत बनाया जा सकता है.

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कार्तिक उरांव झारखंड के प्रमुख आदिवासी नेताओं और समाज सुधारकों में गिने जाते हैं. वे एक कुशल इंजीनियर थे और बाद में राजनीति में सक्रिय हुए. उन्होंने आदिवासी समाज की शिक्षा, विकास और अधिकारों के लिए काम किया. उनका मानना था कि शिक्षा समाज को मजबूत बनाने का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है. उन्होंने आदिवासी युवाओं को आगे बढ़ने और आधुनिक शिक्षा हासिल करने के लिए प्रेरित किया. वे लोकसभा सांसद भी रहे. अपने सार्वजनिक जीवन में उन्होंने आदिवासी समाज की समस्याओं को सामने रखा. उनका जीवन बताता है कि शिक्षा और सामाजिक जागरूकता के जरिए आदिवासी समुदाय के विकास की मजबूत नींव रखी जा सकती है.

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साइमन उरांव झारखंड में जल संरक्षण और पर्यावरण के लिए किए गए अपने काम के लिए प्रसिद्ध हैं. उन्हें अक्सर ‘झारखंड का वाटरमैन’ कहा जाता है. उन्होंने गांवों में पानी बचाने, तालाबों और जलस्रोतों को विकसित करने तथा खेती को बेहतर बनाने के लिए काम किया. उनका प्रयास रहा कि गांव के लोग अपने प्राकृतिक संसाधनों को बचाकर आत्मनिर्भर बनें. जल संरक्षण के क्षेत्र में उनके योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर भी सम्मान मिला और उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया. उनका जीवन बताता है कि बिना बड़े संसाधनों के भी लगातार मेहनत और सामूहिक प्रयास से पर्यावरण और गांवों की तस्वीर बदली जा सकती है.

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जमूना टुडू झारखंड की प्रसिद्ध पर्यावरण कार्यकर्ता हैं. उन्हें ‘लेडी टार्जन’ के नाम से भी जाना जाता है. उन्होंने पूर्वी सिंहभूम क्षेत्र में जंगलों को अवैध कटाई से बचाने के लिए लोगों को संगठित किया. उनका मानना है कि जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि गांवों और आदिवासी जीवन का आधार हैं. उन्होंने ग्रामीणों के साथ मिलकर पेड़ों की रक्षा और नए पौधे लगाने का काम किया. उनके प्रयासों ने पर्यावरण संरक्षण की दिशा में लोगों को जागरूक किया. जमना टुडू की कहानी विश्व आदिवासी दिवस पर यह संदेश देती है कि प्रकृति की रक्षा करना आने वाली पीढ़ियों की रक्षा करने के बराबर है.

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दयामणि बारला झारखंड की जानी-मानी पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं. उन्होंने आदिवासी समाज के अधिकारों, जमीन और विस्थापन से जुड़े मुद्दों को लगातार उठाया. ग्रामीण और आदिवासी लोगों की समस्याओं को उन्होंने अपनी पत्रकारिता के माध्यम से सामने रखा. भूमि अधिग्रहण और विस्थापन के सवालों पर उनकी सक्रियता ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई. वे मानती हैं कि विकास के साथ स्थानीय लोगों के अधिकारों और सहमति का भी सम्मान होना चाहिए. उनकी आवाज ने कई महत्वपूर्ण सामाजिक मुद्दों को चर्चा में लाया. विश्व आदिवासी दिवस पर दयामणि बारला की कहानी अधिकारों के लिए जागरूक रहने और अपनी बात मजबूती से रखने की प्रेरणा देती है.

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अल्बर्ट एक्का झारखंड के महान सैन्य नायकों में से एक थे. वे भारतीय सेना में सैनिक थे और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में अदम्य साहस दिखाया. युद्ध के दौरान उन्होंने बेहद कठिन परिस्थितियों में बहादुरी से मुकाबला किया. देश की रक्षा करते हुए वे शहीद हो गए. उनके असाधारण साहस और बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया. वे इस सर्वोच्च सैन्य सम्मान से सम्मानित होने वाले झारखंड के महान वीरों में शामिल हैं. अल्बर्ट एक्का का जीवन देशभक्ति, साहस और बलिदान की मिसाल है.

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तिलका मांझी आदिवासी इतिहास के महान स्वतंत्रता सेनानियों में गिने जाते हैं. उन्होंने ब्रिटिश शासन और शोषण के खिलाफ संघर्ष किया. उन्होंने अपने क्षेत्र के लोगों को एकजुट कर अंग्रेजी सत्ता का विरोध किया. उनका जीवन आदिवासी समाज के साहस और संघर्ष की कहानी है. तिलका मांझी ने अन्याय और अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाई और अपने लोगों के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी. उनका नाम आज भी आदिवासी वीरता और प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है. विश्व आदिवासी दिवस पर तिलका मांझी की कहानी हमें अपनी संस्कृति, अधिकारों और सम्मान की रक्षा के लिए हमेशा खड़े रहने की प्रेरणा देती है.