दुर्गा पंडाल में मां के चरणों के नीचे कौन दबा है? जानें पौराणिक रहस्य

  • October 14, 2026 7:57 pm
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दुर्गा पूजा के पंडालों में मां दुर्गा की भव्य प्रतिमा के चरणों के पास एक असुर दिखाई देता है. कभी वह भैंसे के रूप में नजर आता है, तो कभी मानव रूप में, आखिर यह कौन है और मां दुर्गा के पैरों के नीचे इसे क्यों दिखाया जाता है? इसके पीछे एक रोचक पौराणिक कथा है, जो शक्ति, साहस और बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देती है.

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दुर्गा पूजा के पंडालों में मां दुर्गा की प्रतिमा के चरणों के पास एक असुर दिखाई देता है. यह कोई साधारण पात्र नहीं, बल्कि महिषासुर है, प्रतिमा में मां दुर्गा को उसके साथ युद्ध करते और उसका वध करते हुए दिखाया जाता है. यह दृश्य देवी की शक्ति, साहस और विजय का प्रतीक है. इसी पौराणिक प्रसंग के कारण दुर्गा पूजा में मां दुर्गा के इस स्वरूप की विशेष महत्ता मानी जाती है,

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पौराणिक कथाओं के अनुसार, महिषासुर एक शक्तिशाली असुर था. उसका नाम महिष यानी भैंसे से जुड़ा है. मान्यता है कि वह अपनी इच्छा के अनुसार अलग-अलग रूप धारण कर सकता था. अपनी शक्ति के घमंड में उसने देवताओं को पराजित कर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया था. उसके अत्याचारों से परेशान होकर देवताओं ने उससे मुक्ति पाने का उपाय खोजा. इसी प्रसंग से मां दुर्गा के प्राकट्य और महिषासुर के वध की कथा जुड़ी है.

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पौराणिक मान्यता के अनुसार, महिषासुर के अत्याचारों से परेशान देवताओं ने अपनी शक्तियों को एकत्र किया. देवताओं के तेज से देवी दुर्गा का प्राकट्य हुआ. उन्हें असाधारण शक्ति और दिव्य स्वरूप प्राप्त हुआ. मां दुर्गा को विभिन्न देवताओं ने अपने अस्त्र-शस्त्र भी प्रदान किए. इस तरह देवी महिषासुर से युद्ध करने के लिए तैयार हुईं. उनकी उत्पत्ति की यह कथा बताती है कि जब अन्याय बढ़ता है, तो उसका सामना करने के लिए शक्ति एकजुट होती है.

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दिव्य अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित मां दुर्गा ने महिषासुर को युद्ध के लिए चुनौती दी. पौराणिक कथा के अनुसार, दोनों के बीच भयंकर युद्ध हुआ. महिषासुर ने अपनी शक्ति का इस्तेमाल करते हुए कई रूप धारण किए, लेकिन देवी ने हार नहीं मानी. अपने सिंह पर सवार मां दुर्गा ने उसके हर रूप का सामना किया. यह प्रसंग देवी के अदम्य साहस, धैर्य और शक्ति को दर्शाता है, जिसे आज भी दुर्गा पूजा में श्रद्धा से याद किया जाता है.

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दुर्गा पूजा की प्रतिमाओं में महिषासुर को कभी भैंसे के रूप में, तो कभी भैंसे से निकलते मानव रूप में दिखाया जाता है. इसका संबंध उसकी रूप बदलने की पौराणिक कथा से है. महिषासुर का भैंसे से जुड़ा स्वरूप उसकी पहचान का अहम हिस्सा है.कलाकार प्रतिमा में इसी युद्ध के निर्णायक क्षण को दर्शाते हैं, जब मां दुर्गा असुर को पराजित कर रही होती हैं. अलग-अलग प्रतिमाओं में इस दृश्य को प्रस्तुत करने की शैली भी अलग हो सकती है.

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मां दुर्गा को महिषासुरमर्दिनी इसलिए कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने महिषासुर का वध कर उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाई थी। महिषासुरमर्दिनी का अर्थ है महिषासुर का मर्दन या संहार करने वाली देवी. यह नाम देवी के पराक्रम और दुष्ट शक्तियों पर उनकी विजय को दर्शाता है. मंदिरों, धार्मिक चित्रों और दुर्गा पूजा की प्रतिमाओं में देवी का यह स्वरूप विशेष रूप से दिखाई देता है. भक्त इस रूप में मां की शक्ति और रक्षक स्वरूप का स्मरण करते हैं.

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मां दुर्गा और महिषासुर का दृश्य केवल एक पौराणिक युद्ध का चित्रण नहीं है, बल्कि इसका गहरा प्रतीकात्मक अर्थ भी है. इसे बुराई पर अच्छाई, अन्याय पर न्याय और अहंकार पर शक्ति की जीत के रूप में देखा जाता है. यह दृश्य संदेश देता है कि गलत शक्तियां कितनी भी प्रभावशाली क्यों न हों, उनका सामना साहस और दृढ़ संकल्प से किया जा सकता है. इसी वजह से मां दुर्गा का यह स्वरूप भक्तों के लिए आस्था और प्रेरणा का केंद्र है.

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दुर्गा पूजा में मां दुर्गा की आराधना के साथ महिषासुर पर उनकी विजय का उत्सव भी मनाया जाता है. पंडालों में स्थापित प्रतिमाएं इसी पौराणिक कथा को जीवंत करती हैं. मां के चरणों के पास दिखाई देने वाला महिषासुर हमें याद दिलाता है कि शक्ति का उद्देश्य अन्याय का अंत करना और धर्म की रक्षा करना है. भक्त मां दुर्गा से साहस, शक्ति और सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा मांगते हैं. यही इस उत्सव का प्रमुख आध्यात्मिक संदेश है.