राधा अष्टमी आज: 12 बजे क्यों किया जाता है राधारानी का पूजन? जानें पूजा का सही समय

  • September 19, 2026 11:15 pm
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आज 19 सितंबर 2026 को राधा अष्टमी का पावन पर्व पूरे देश में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जा रहा है. धार्मिक मान्यता के अनुसार इसी दिन राधा रानी का प्राकट्य हुआ था. इस अवसर पर मंदिरों और घरों में राधा-कृष्ण की विशेष पूजा, अभिषेक और श्रृंगार किया जाता है. भक्त दोपहर के समय लाडली जू का पूजन कर उन्हें भोग अर्पित करते हैं और आरती करते हैं. आइए जानते हैं राधा अष्टमी पर पूजा का शुभ समय, विधि, भोग और व्रत पारण से जुड़ी जरूरी बातें.

राधा अष्टमी आज: 12 बजे क्यों किया जाता है राधारानी का पूजन? जानें पूजा का सही समय
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आज शनिवार, 19 सितंबर 2026 को राधा अष्टमी का पावन पर्व मनाया जा रहा है। यह दिन राधा रानी के प्राकट्य पर्व के रूप में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है. इस अवसर पर मंदिरों और घरों में राधा-कृष्ण की विशेष पूजा, अभिषेक और श्रृंगार किया जाता है. भक्त राधा रानी को फूल, माला, चंदन और कुमकुम अर्पित करते हैं. ब्रज क्षेत्र में इस पर्व की विशेष धूम रहती है और राधा रानी के मंदिरों में भक्तों की भीड़ देखने को मिलती है.

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राधा अष्टमी पर राधा रानी की मुख्य पूजा दोपहर के समय करने की परंपरा बताई जाती है. धार्मिक मान्यता के अनुसार राधा रानी का प्राकट्य मध्याह्न काल में हुआ था, इसलिए इसी समय विशेष पूजा और अभिषेक किया जाता है. भक्त दोपहर 12 बजे के आसपास पूजा की तैयारी पूरी करके राधा-कृष्ण का पूजन कर सकते हैं. पूजा के दौरान राधा रानी को नए वस्त्र, फूल, माला और श्रृंगार सामग्री अर्पित कर श्रद्धा के साथ आरती और मंत्र जाप किया जाता है.

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राधा अष्टमी के दिन पूजा की तैयारी सुबह से ही शुरू कर दी जाती है. भक्त सूर्योदय के बाद स्नान करके साफ और स्वच्छ कपड़े पहनते हैं. इसके बाद पूजा स्थान की सफाई कर उसे फूलों और अन्य सजावटी सामग्री से सजाया जाता है. घर के मंदिर में राधा-कृष्ण की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करके पूजा सामग्री तैयार रखी जाती है. अभिषेक के लिए पंचामृत और गंगाजल, साथ ही फूल, चंदन, कुमकुम, धूप, दीप और भोग की सामग्री पहले से तैयार कर लेना शुभ माना जाता है.

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राधा अष्टमी के दिन राधा रानी के अभिषेक का विशेष महत्व माना जाता है. दोपहर के आसपास पूजा शुरू करके राधा रानी की प्रतिमा का पंचामृत और गंगाजल से अभिषेक किया जाता है. पंचामृत में दूध, दही, घी, शहद और शक्कर का इस्तेमाल परंपरा के अनुसार किया जाता है. अभिषेक के बाद प्रतिमा को साफ करके नए वस्त्र पहनाए जाते हैं. इसके बाद फूलों की माला, चंदन, कुमकुम और अन्य श्रृंगार सामग्री से राधा रानी का सुंदर श्रृंगार किया जाता है.

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पूजा और श्रृंगार के बाद राधा रानी और भगवान श्रीकृष्ण को भोग अर्पित किया जाता है. भक्त अपनी श्रद्धा और पारिवारिक परंपरा के अनुसार फल, मिठाई और अन्य सात्विक व्यंजन भोग में रखते हैं. भोग लगाने के बाद राधा-कृष्ण का मंत्र जाप और आरती की जाती है. कई स्थानों पर भक्त भजन-कीर्तन भी करते हैं. धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन राधा रानी की भक्ति और श्रीकृष्ण के नाम का स्मरण करने से मन को शांति और आध्यात्मिक आनंद मिलता है.

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धार्मिक मान्यता के अनुसार राधा रानी का प्राकट्य ब्रज क्षेत्र के रावल गांव में हुआ था. इसी कारण रावल में राधा अष्टमी का पर्व विशेष श्रद्धा के साथ मनाया जाता है. इसके अलावा बरसाना, वृंदावन और मथुरा में भी इस अवसर पर विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं. मंदिरों में राधा-कृष्ण का आकर्षक श्रृंगार किया जाता है और भक्त दर्शन के लिए पहुंचते हैं. ब्रज की गलियों में राधा रानी के जयकारे, भजन और कीर्तन इस पर्व के धार्मिक माहौल को और खास बना देते हैं.

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राधा अष्टमी के दिन श्रद्धालु अपनी क्षमता और धार्मिक परंपरा के अनुसार व्रत रखते हैं. कुछ भक्त निराहार व्रत रखते हैं, जबकि कई लोग निर्जल या फलाहार व्रत का पालन करते हैं. व्रत के दौरान राधा रानी और भगवान श्रीकृष्ण की पूजा, मंत्र जाप और भजन-कीर्तन किया जाता है. मुख्य पूजा मध्याह्न काल में करने की परंपरा बताई जाती है. व्रत रखने वाले लोगों को अपनी स्वास्थ्य स्थिति और क्षमता का ध्यान रखते हुए ही उपवास करना चाहिए.

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राधा अष्टमी का व्रत रखने वाले श्रद्धालु व्रत खोलने के लिए नवमी तिथि का इंतजार करते हैं. धार्मिक परंपराओं में राधा अष्टमी व्रत का पारण नवमी तिथि में करने की मान्यता बताई जाती है. हालांकि अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में व्रत पारण की परंपरा अलग हो सकती है. इसलिए स्थानीय पंचांग और अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार समय देखना उचित माना जाता है. राधा अष्टमी के दिन भक्त राधा रानी की पूजा कर सुख, शांति और समृद्धि की कामना करते हैं.