बिहार के इस बेटे ने दवा की दुनिया में रचा इतिहास, संघर्ष से खड़ी की करोड़ों की कंपनी...

  • September 15, 2026 10:25 pm
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बिहार के एक छोटे से गांव से निकलकर दवा की दुनिया में अपनी पहचान बनाने वाले संप्रदा सिंह की कहानी किसी प्रेरणादायक फिल्म से कम नहीं है. डॉक्टर बनने का सपना देखने वाले इस किसान परिवार के बेटे ने 1953 में एक छोटी-सी मेडिकल स्टोर से शुरुआत की और आगे चलकर एल्केम लेबोरेटरीज जैसी बड़ी फार्मास्युटिकल कंपनी की नींव रखी. संघर्ष, मेहनत और दूरदृष्टि के दम पर उन्होंने न सिर्फ अपना कारोबार खड़ा किया, बल्कि भारतीय दवा उद्योग को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में भी अहम भूमिका निभाई.

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बिहार के जहानाबाद जिले के ओकरी गांव में जन्मे संप्रदा सिंह ने किसान परिवार से निकलकर फार्मा उद्योग में अपनी पहचान बनाई. डॉक्टर बनने का सपना था, लेकिन परिस्थितियों ने उन्हें कारोबार की राह दिखाई. उनकी कहानी बताती है कि सीमित संसाधनों के बावजूद मेहनत और दूरदृष्टि से बड़ी सफलता हासिल की जा सकती है.

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संप्रदा सिंह का जन्म 1925 में बिहार के ओकरी गांव में हुआ था. उनका परिवार खेती पर निर्भर था. वह डॉक्टर बनकर लोगों की सेवा करना चाहते थे, लेकिन यह सपना पूरा नहीं हो सका. उन्होंने पटना यूनिवर्सिटी से बीकॉम की पढ़ाई की और अपने गांव के शुरुआती स्नातकों में शामिल हुए. बाद में उन्होंने कारोबार की दुनिया में कदम रखा.

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संप्रदा सिंह ने 1953 में पटना में एक छोटी मेडिकल स्टोर खोलकर अपने कारोबारी सफर की शुरुआत की. यह कदम उनके लिए सिर्फ रोजगार नहीं, बल्कि स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़ने का अवसर था. दवाओं और ग्राहकों की जरूरतों को समझते हुए उन्होंने धीरे-धीरे अपने कारोबार का विस्तार किया. आगे चलकर यही अनुभव उनके फार्मा साम्राज्य की नींव बना.

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मेडिकल स्टोर के बाद संप्रदा सिंह ने दवा वितरण के क्षेत्र में कदम रखा. उन्होंने मैगध फार्मा के जरिए फार्मास्युटिकल कंपनियों और दवा बाजार के कामकाज को करीब से समझा. डॉक्टरों, वितरकों और दवा कंपनियों के साथ संबंध बनाए. करीब 16 वर्षों के वितरण अनुभव ने उन्हें यह समझने में मदद की कि दवा निर्माण के क्षेत्र में भी बड़ी संभावनाएं मौजूद हैं.

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दवा वितरण के कारोबार की सीमाओं को समझने के बाद संप्रदा सिंह ने फार्मास्युटिकल मैन्युफैक्चरिंग की ओर रुख किया. 1970 में उन्होंने अरिस्टो लैब्स के जरिए इस क्षेत्र में कदम रखा, लेकिन शुरुआती दौर में कई मुश्किलें और असफल साझेदारियां सामने आईं. इन चुनौतियों ने उन्हें रोका नहीं. उन्होंने अपने

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साल 1973 संप्रदा सिंह के जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ. उन्होंने अपने छोटे भाई बासुदेव नारायण सिंह के साथ मिलकर एल्केम लेबोरेटरीज की स्थापना की. कंपनी की शुरुआत आसान नहीं थी, लेकिन संप्रदा सिंह की मेहनत, कारोबारी समझ और भविष्य की सोच ने इसे आगे बढ़ाया. धीरे-धीरे एल्केम ने भारतीय दवा बाजार में अपनी मजबूत पहचान बनानी शुरू की.

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संप्रदा सिंह के नेतृत्व में एल्केम लेबोरेटरीज भारत की प्रमुख फार्मास्युटिकल कंपनियों में शामिल हुई. कंपनी दवाओं और न्यूट्रास्यूटिकल्स के विकास, निर्माण और विपणन का काम करती है. आज एल्केम का कारोबार भारत के अलावा अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका, एशिया-प्रशांत और दक्षिण अमेरिका तक फैला है. उनकी दूरदृष्टि ने कंपनी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई.

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संप्रदा सिंह का सफर 1953 की छोटी दवा दुकान से शुरू होकर एल्केम लेबोरेटरीज जैसे बड़े फार्मा कारोबार तक पहुंचा. उन्होंने दिखाया कि सफलता के लिए केवल बड़े संसाधन नहीं, बल्कि मेहनत, धैर्य और सही दिशा जरूरी है. 2019 में उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी बनाई विरासत आज भी फार्मा उद्योग और युवा उद्यमियों को प्रेरणा देती है.