क्या मजदूरों का भी हो सकता है LinkedIn? बिहार के चंद्रशेखर ने बदली तस्वीर.....

  • September 6, 2026 10:29 pm
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बिहार के दरभंगा के एक छोटे से गांव से शुरू हुआ एक ऐसा सपना, जिसने उन मजदूरों के लिए उम्मीद की नई राह बनाई, जो हर सुबह काम की तलाश में चौक-चौराहों पर खड़े होते हैं. चंद्रशेखर मंडल ने तकनीक की मदद से मजदूरों और काम देने वालों को सीधे जोड़ने की पहल की. उनका Digital Labour Chowk सिर्फ रोजगार का प्लेटफॉर्म नहीं, बल्कि मजदूरों के हुनर, पहचान और सम्मान को डिजिटल दुनिया से जोड़ने की कोशिश है. कभी काम की तलाश में भटकने वाले मजदूरों को अब एक ऐसे मंच से जोड़ा जा रहा है, जहां उनका हुनर ही उनकी पहचान बन सकता है.

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क्या आपने कभी सोचा है कि मजदूरों के लिए भी ऐसा डिजिटल प्लेटफॉर्म हो सकता है, जहां उन्हें उनकी योग्यता के हिसाब से सीधे काम मिल सके? बिहार के दरभंगा के एक छोटे से गांव से निकले चंद्रशेखर मंडल ने इसी सोच को हकीकत में बदलने की कोशिश की, उन्होंने Digital Labour Chowk नाम का प्लेटफॉर्म शुरू किया, जो मजदूरों और काम देने वालों को सीधे जोड़ने का काम करता है. इसका मकसद उन मजदूरों की मदद करना है, जिन्हें रोज काम की तलाश में चौक-चौराहों पर खड़ा होना पड़ता है. यह पहल मजदूरों को काम के साथ डिजिटल पहचान देने की दिशा में एक अनोखी कोशिश है.

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बिहार के दरभंगा के एक छोटे से गांव से चंद्रशेखर मंडल ने अपने बड़े सपने की शुरुआत की. उन्होंने अपने आसपास देखा कि बड़ी संख्या में मजदूर हर दिन काम की तलाश में निकलते हैं. कई मजदूर घंटों चौक पर खड़े रहते हैं, लेकिन उन्हें काम मिलने की कोई गारंटी नहीं होती. कई बार उन्हें खाली हाथ घर लौटना पड़ता है. चंद्रशेखर को लगा कि तकनीक का इस्तेमाल करके इस समस्या को कुछ हद तक दूर किया जा सकता है. इसी सोच ने उन्हें एक ऐसे प्लेटफॉर्म की कल्पना करने के लिए प्रेरित किया, जहां मजदूर अपनी जानकारी दर्ज कर सकें और जरूरतमंद नियोक्ता सीधे उनसे संपर्क कर सकें.

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भारत के कई शहरों और कस्बों में मजदूर सुबह-सुबह चौक या बाजारों में काम की उम्मीद लेकर पहुंचते हैं. इनमें राजमिस्त्री, बढ़ई, पेंटर, प्लंबर, इलेक्ट्रिशियन और दूसरे हुनरमंद कामगार शामिल होते हैं. लेकिन समस्या यह है कि उन्हें यह पता नहीं होता कि उस दिन काम मिलेगा या नहीं. चंद्रशेखर मंडल ने भी मजदूरों की इसी परेशानी को करीब से समझा. उन्होंने देखा कि मजदूरों के पास हुनर होने के बावजूद काम खोजने का कोई व्यवस्थित डिजिटल माध्यम नहीं है. कई बार बिचौलियों की वजह से मजदूरों को कम मजदूरी मिलती है. इसी समस्या ने चंद्रशेखर को Digital Labour Chowk शुरू करने की प्रेरणा दी.

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साल 2020 में कोविड-19 महामारी ने मजदूरों की मुश्किलें और बढ़ा दीं. लॉकडाउन के दौरान लाखों मजदूरों के सामने रोजगार और रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया. इस दौर ने चंद्रशेखर मंडल को भी गहराई से प्रभावित किया. उन्होंने महसूस किया कि मजदूरों के लिए ऐसा सिस्टम होना चाहिए, जो उन्हें काम की तलाश में बार-बार चौक पर जाने की मजबूरी से बाहर निकाल सके. इसी विचार के साथ उन्होंने Digital Labour Chowk की शुरुआत की. उनका उद्देश्य था कि तकनीक के जरिए मजदूर और काम देने वाले सीधे जुड़ें. यानी काम की तलाश और काम देने की प्रक्रिया को आसान, तेज और ज्यादा पारदर्शी बनाया जा सके.

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Digital Labour Chowk का मुख्य उद्देश्य मजदूरों और काम देने वालों के बीच सीधा संपर्क बनाना है. प्लेटफॉर्म के जरिए मजदूर अपनी जानकारी और हुनर से जुड़ी जानकारी दर्ज कर सकते हैं. वहीं ठेकेदार या अन्य काम देने वाले अपनी जरूरत के अनुसार मजदूरों की तलाश कर सकते हैं. इस तरह दोनों पक्षों के बीच संपर्क का एक डिजिटल माध्यम तैयार होता है. चंद्रशेखर की कोशिश है कि मजदूरों को काम पाने के लिए सिर्फ बिचौलियों पर निर्भर न रहना पड़े. इससे उन्हें अपने हुनर के आधार पर काम तलाशने का मौका मिलता है. यह मॉडल उन कामगारों के लिए खास तौर पर उपयोगी हो सकता है, जो रोजाना असंगठित तरीके से काम खोजते हैं.

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चंद्रशेखर मंडल की पहल का उद्देश्य सिर्फ मजदूरों को काम दिलाना नहीं है. वह चाहते हैं कि मजदूरों को पहचान और सम्मान भी मिले. आमतौर पर मजदूरों की पहचान उनके काम की जगह या किसी ठेकेदार के जरिए होती है. डिजिटल प्लेटफॉर्म उन्हें अपने हुनर और अनुभव को एक जगह दर्ज करने का अवसर देता है. इससे एक तरह की डिजिटल प्रोफाइल तैयार हो सकती है, जिसे काम देने वाला व्यक्ति जरूरत के अनुसार देख सकता है. यही वजह है कि Digital Labour Chowk को कई लोग मजदूरों के लिए ‘LinkedIn’ जैसा प्लेटफॉर्म भी कह रहे हैं. यह पहल मजदूरों को डिजिटल दुनिया से जोड़ने और उनके हुनर को सामने लाने की कोशिश .

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चंद्रशेखर मंडल की यह पहल धीरे-धीरे एक बड़े प्लेटफॉर्म का रूप ले चुकी है. आपके दिए विवरण के अनुसार, Digital Labour Chowk के जरिए 1 लाख से ज्यादा मजदूरों को काम मिल चुका है. यह आंकड़ा बताता है कि मजदूरों के लिए डिजिटल रोजगार प्लेटफॉर्म की कितनी बड़ी जरूरत हो सकती है. जिन लोगों के लिए रोज काम तलाशना एक चुनौती थी, उनके लिए यह प्लेटफॉर्म नए अवसरों का माध्यम बना. मजदूरों को काम के साथ अपनी पहचान बनाने का अवसर भी मिल रहा है. चंद्रशेखर की कोशिश ने यह सवाल भी खड़ा किया है कि अगर तकनीक का सही इस्तेमाल हो, तो क्या असंगठित क्षेत्र के करोड़ों कामगारों को रोजगार से बेहतर तरीके से जोड़ा जा सकता है?

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Digital Labour Chowk को सिर्फ एक स्टार्टअप के रूप में देखना इस कहानी को छोटा कर देना होगा. इसके पीछे उन लाखों मजदूरों की जिंदगी और संघर्ष है, जो हर दिन काम की तलाश में निकलते हैं. चंद्रशेखर मंडल ने एक ऐसी समस्या को पहचाना, जिसे आमतौर पर नजरअंदाज कर दिया जाता है—मजदूर के पास हुनर है, लेकिन सही काम तक पहुंच नहीं. उन्होंने तकनीक के जरिए इस दूरी को कम करने की कोशिश की. दरभंगा के एक छोटे से गांव से शुरू हुआ यह सपना अब हजारों-लाखों कामगारों की उम्मीद से जुड़ चुका है. यह कहानी बताती है कि सही सोच और तकनीक मिलकर समाज की बड़ी समस्याओं के समाधान की शुरुआत कर सकती है