मां दुर्गा की मूर्ति में क्यों इस्तेमाल होती है कोठे की मिट्टी? जानिए सदियों पुरानी परंपरा की कहानी

  • September 23, 2026 10:00 pm
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मां दुर्गा की प्रतिमा बनाने में मिट्टी का खास महत्व होता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि बंगाल की कुछ दुर्गा पूजा परंपराओं में कोठे के बाहर की मिट्टी को भी ‘पुण्य माटी’ मानने की मान्यता जुड़ी है? आखिर इस मिट्टी को प्रतिमा निर्माण से जोड़ने के पीछे क्या कहानी है? क्या इसका संबंध किसी धार्मिक मान्यता से है या फिर इसमें छिपा है समानता और सम्मान का सामाजिक संदेश? जानिए इस सदियों पुरानी लोकपरंपरा से जुड़ी मान्यताओं की पूरी कहानी.

मां दुर्गा की मूर्ति में क्यों इस्तेमाल होती है कोठे की मिट्टी? जानिए सदियों पुरानी परंपरा की कहानी
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मां दुर्गा की प्रतिमा बनाने की परंपरा केवल मिट्टी और कला तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके साथ कई धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताएं भी जुड़ी हैं. बंगाल की दुर्गा पूजा परंपरा में ऐसी ही एक मान्यता ‘पुण्य माटी’ से जुड़ी बताई जाती है. मान्यता के अनुसार, प्रतिमा निर्माण के लिए तैयार की जाने वाली मिट्टी में कुछ स्थानों पर वेश्यालय के बाहर या आंगन की मिट्टी भी प्रतीकात्मक रूप से शामिल की जाती है. यह परंपरा सुनने में भले ही अलग लगे, लेकिन इसके पीछे देवी दुर्गा को समाज के हर वर्ग की माता मानने की धार्मिक-सांस्कृतिक व्याख्या की जाती है.

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कोठे की मिट्टी से जुड़ी यह मान्यता मुख्य रूप से बंगाल की दुर्गा पूजा परंपराओं के संदर्भ में चर्चा में आती है. खासकर कोलकाता के कुमारटुली जैसे प्रसिद्ध मूर्तिकार इलाकों से जुड़ी कहानियों में इसका उल्लेख मिलता है. कुमारटुली में पीढ़ियों से कलाकार मिट्टी से देवी-देवताओं की प्रतिमाएं तैयार करते आए हैं. हालांकि, इस परंपरा का पालन हर मूर्तिकार या हर परिवार द्वारा किया जाता हो, ऐसा जरूरी नहीं है. अलग-अलग स्थानों और परिवारों में प्रतिमा निर्माण की विधियां और धार्मिक मान्यताएं अलग हो सकती हैं. इसलिए इसे बंगाल की एक सांस्कृतिक-धार्मिक मान्यता के रूप में समझना अधिक उचित है.

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दुर्गा प्रतिमा निर्माण से जुड़ी लोकमान्यताओं में ‘पुण्य माटी’ का विशेष उल्लेख मिलता है. मान्यता के अनुसार, वेश्यालय के बाहर से ली गई मिट्टी को कुछ परंपराओं में ‘पुण्य माटी’ कहा जाता है. इसके पीछे एक प्रतीकात्मक धार्मिक विचार बताया जाता है. लोकविश्वास के अनुसार, जब कोई व्यक्ति किसी स्थान पर जाता है तो अपने अच्छे कर्मों को वहां छोड़कर बाहर आता है, इसलिए उस स्थान की मिट्टी को पवित्र माना जाता है. हालांकि, यह व्याख्या धार्मिक और लोकपरंपरा से जुड़ी है और इसके अलग-अलग संस्करण भी मिलते हैं. इसे वैज्ञानिक तथ्य के बजाय सांस्कृतिक मान्यता के रूप में देखा जाता है.

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इस परंपरा को लेकर सबसे ज्यादा सवाल यही उठता है कि प्रतिमा बनाने के लिए ऐसी जगह की मिट्टी को ही क्यों चुना गया. इससे जुड़ी धार्मिक व्याख्या देवी दुर्गा की सर्वसमावेशी मातृत्व भावना पर केंद्रित है. मान्यता के अनुसार देवी किसी व्यक्ति के सामाजिक दर्जे, पेशे या परिस्थितियों के आधार पर भेदभाव नहीं करतीं. समाज में जिन लोगों को अक्सर हाशिये पर रखा जाता है, वे भी देवी की संतान हैं. इसलिए ऐसी जगह की मिट्टी को प्रतिमा निर्माण में शामिल करना प्रतीकात्मक रूप से समानता और स्वीकार्यता का संदेश माना जाता है. हालांकि, इस मान्यता की व्याख्या क्षेत्र और परंपरा के अनुसार अलग-अलग हो सकती है.

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हिंदू धार्मिक परंपराओं में देवी दुर्गा को शक्ति और मातृत्व का प्रतीक माना जाता है. कोठे की मिट्टी से जुड़ी मान्यता की एक प्रमुख व्याख्या यह है कि देवी सभी की माता हैं और उनके लिए समाज में कोई व्यक्ति ‘अछूत’ या कमतर नहीं है. इस दृष्टि से प्रतिमा निर्माण में ऐसी मिट्टी का प्रतीकात्मक इस्तेमाल सामाजिक सीमाओं को चुनौती देने वाली परंपरा के रूप में देखा जाता है. इसका संदेश यह माना जाता है कि पूजा और आस्था में हर व्यक्ति को सम्मान मिलना चाहिए. यही वजह है कि इस परंपरा को कई लोग धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक समानता के विचार से भी जोड़ते हैं.

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दुर्गा प्रतिमा बनाने की प्रक्रिया में मिट्टी का चयन और उसकी तैयारी महत्वपूर्ण चरण होते हैं. पारंपरिक रूप से गंगा या अन्य नदियों की मिट्टी, स्थानीय चिकनी मिट्टी, भूसी, पुआल और प्राकृतिक सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है. पहले पुआल और बांस से प्रतिमा का ढांचा तैयार किया जाता है. इसके बाद मिट्टी की अलग-अलग परतें लगाकर शरीर का आकार बनाया जाता है. मिट्टी सूखने के बाद चेहरे और अन्य बारीक हिस्सों को आकार दिया जाता है. कुछ परंपराओं में ‘पुण्य माटी’ को भी मिट्टी के मिश्रण में प्रतीकात्मक रूप से शामिल करने की बात कही जाती है, लेकिन यह हर जगह अनिवार्य नहीं है.

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कोठे की मिट्टी से जुड़ी मान्यता को केवल धार्मिक रस्म के रूप में देखने के बजाय कई लोग इसके सामाजिक संदेश पर भी जोर देते हैं. समाज में कुछ समुदायों और पेशों से जुड़े लोगों को लंबे समय तक अलग नजर से देखा जाता रहा है. ऐसे में देवी की प्रतिमा में उस स्थान की मिट्टी का प्रतीकात्मक समावेश इस विचार को सामने लाता है कि हर इंसान सम्मान का हकदार है. इस परंपरा को समानता, स्वीकार्यता और मानवीय गरिमा से जोड़कर देखा जाता है. हालांकि, इसके सामाजिक अर्थ की व्याख्या आधुनिक समय में अलग-अलग लोग अपने दृष्टिकोण के अनुसार करते हैं.

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दुर्गा पूजा से जुड़ी अनेक परंपराएं केवल धार्मिक ग्रंथों पर आधारित नहीं हैं, बल्कि उनमें स्थानीय लोकविश्वास और पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक मान्यताओं की भी भूमिका है. ‘पुण्य माटी’ से जुड़ी कथा भी इसी तरह की मान्यताओं में शामिल मानी जाती है. अलग-अलग क्षेत्रों और मूर्तिकार समुदायों में इसके बारे में अलग-अलग कहानियां और व्याख्याएं सुनने को मिलती हैं. इसलिए इस परंपरा को समझते समय इसे एक समान नियम के रूप में नहीं देखना चाहिए. यह बंगाल की समृद्ध दुर्गा पूजा संस्कृति में मौजूद लोकपरंपराओं और प्रतीकों में से एक है.

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बंगाल की दुर्गा पूजा में प्रतिमा निर्माण अपने आप में एक महत्वपूर्ण कला और सांस्कृतिक प्रक्रिया है. मूर्तिकार मिट्टी, पुआल, बांस और प्राकृतिक सामग्री से देवी की प्रतिमा तैयार करते हैं. प्रतिमा में केवल कलाकार की मेहनत ही नहीं, बल्कि स्थानीय संस्कृति और परंपराओं की झलक भी दिखाई देती है. मिट्टी से जुड़ी विभिन्न मान्यताएं इस पूरी प्रक्रिया को और अर्थपूर्ण बनाती हैं. ‘पुण्य माटी’ की परंपरा भी इसी सांस्कृतिक संदर्भ में चर्चा में आती है. यह दिखाती है कि दुर्गा पूजा में धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक विचार, लोकविश्वास और पीढ़ियों से चली आ रही कला परंपराएं भी जुड़ी हुई हैं.

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कोठे की मिट्टी से जुड़ी परंपरा को लेकर अलग-अलग धार्मिक और सांस्कृतिक व्याख्याएं मौजूद हैं. कुछ लोकमान्यताओं में इसे ‘पुण्य माटी’ कहा जाता है, जबकि इसके प्रतीकात्मक अर्थ को देवी दुर्गा की सर्वसमावेशी मातृत्व भावना से जोड़ा जाता है. यह मान्यता बताती है कि दुर्गा पूजा केवल पूजा-पाठ और भव्य प्रतिमाओं का उत्सव नहीं, बल्कि कला, संस्कृति, लोकविश्वास और सामाजिक संदेशों का भी संगम है. हालांकि, इस परंपरा का पालन हर जगह एक जैसा नहीं होता. इसलिए इसे बंगाल की कुछ दुर्गा पूजा परंपराओं से जुड़ी धार्मिक-सांस्कृतिक मान्यता के रूप में समझना चाहिए, न कि सार्वभौमिक धार्मिक नियम के रूप में.