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जय और विजय भगवान विष्णु के परम भक्त और वैकुंठ धाम के द्वारपाल थे. दोनों हमेशा भगवान की सेवा में लगे रहते थे और वैकुंठ के मुख्य द्वार की रक्षा करते थे. उनका काम बिना अनुमति किसी को अंदर जाने से रोकना था. वे भगवान विष्णु के बेहद प्रिय थे, लेकिन एक गलती के कारण उन्हें ऐसा श्राप मिला, जिसके चलते तीन जन्मों तक भगवान से ही युद्ध करना पड़ा.
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एक दिन ब्रह्मा जी के चार मानस पुत्र सनक, सनंदन, सनातन और सनत्कुमार भगवान विष्णु के दर्शन करने वैकुंठ पहुंचे. ये चारों ऋषि दिखने में छोटे बच्चों जैसे थे, लेकिन बहुत ज्ञानी और तपस्वी थे. वे भगवान विष्णु के परम भक्त थे. जब वे वैकुंठ के मुख्य द्वार पर पहुंचे, तो वहां मौजूद जय और विजय ने उन्हें अंदर जाने से रोक दिया. यहीं से पूरी कथा की शुरुआत हुई.
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चारों ऋषियों ने जब वैकुंठ में प्रवेश करना चाहा, तो जय-विजय ने उन्हें रोक दिया. दोनों को लगा कि बच्चों जैसे दिखने वाले ये ऋषि भगवान से मिलने के योग्य नहीं हैं. उनके इस व्यवहार से चारों ऋषि नाराज हो गए. उन्होंने जय-विजय को श्राप दिया कि उन्हें वैकुंठ छोड़कर धरती पर जन्म लेना पड़ेगा. इतना ही नहीं, उन्हें तीन जन्मों तक राक्षसों के रूप में रहना होगा.
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जय-विजय को श्राप मिलने की जानकारी जब भगवान विष्णु को हुई, तो वे स्वयं वैकुंठ के द्वार पर पहुंचे. उन्होंने चारों ऋषियों का सम्मान किया और अपने द्वारपालों की गलती के लिए क्षमा मांगी. इसके बाद भगवान ने जय-विजय को दो विकल्प दिए. वे चाहें तो सात जन्मों तक भगवान के भक्त बनकर धरती पर रह सकते हैं या फिर तीन जन्मों तक भगवान के शत्रु बनकर उनसे युद्ध कर सकते हैं.
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जय-विजय भगवान विष्णु से ज्यादा समय तक दूर नहीं रहना चाहते थे. इसलिए उन्होंने सात जन्मों तक भक्त बनने के बजाय तीन जन्मों तक भगवान के शत्रु बनने का विकल्प चुना. उन्हें विश्वास था कि भगवान विष्णु के हाथों मृत्यु मिलने के बाद वे जल्दी वैकुंठ लौट सकेंगे. भगवान ने उनकी इच्छा स्वीकार कर ली. इस तरह दोनों को तीन अलग-अलग जन्मों में असुर और राक्षस के रूप में जन्म लेना पड़ा.
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अपने पहले जन्म में जय-विजय ने हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु के रूप में जन्म लिया. हिरण्याक्ष ने अपनी शक्ति के घमंड में पृथ्वी को समुद्र में छिपा दिया था. तब भगवान विष्णु ने वराह अवतार लेकर उसका वध किया. वहीं हिरण्यकशिपु खुद को सबसे शक्तिशाली मानता था और अपने भक्त पुत्र प्रह्लाद को परेशान करता था. अंत में भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार लेकर उसका अंत किया और प्रह्लाद की रक्षा की.
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दूसरे जन्म में जय-विजय ने रावण और कुंभकर्ण के रूप में जन्म लिया. रावण लंका का शक्तिशाली राजा था और कुंभकर्ण उसका विशालकाय भाई था. रावण ने माता सीता का अपहरण कर लिया, जिसके बाद भगवान श्रीराम और रावण के बीच भयंकर युद्ध हुआ. भगवान विष्णु ने श्रीराम के रूप में अवतार लेकर रावण का वध किया. इसी युद्ध में कुंभकर्ण भी मारा गया. इस तरह उनका दूसरा जन्म समाप्त हुआ.
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तीसरे और अंतिम जन्म में जय-विजय ने शिशुपाल और दंतवक्र के रूप में जन्म लिया. शिशुपाल भगवान श्रीकृष्ण से शत्रुता रखता था और बार-बार उनका अपमान करता था. श्रीकृष्ण ने उसकी सौ गलतियां माफ करने का वचन दिया था. लेकिन जब उसने सीमा पार कर दी, तो भगवान ने सुदर्शन चक्र से उसका वध कर दिया. वहीं दंतवक्र का भी भगवान श्रीकृष्ण ने युद्ध में अंत किया.
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जय-विजय के तीन जन्मों में भगवान विष्णु ने अलग-अलग रूपों में अवतार लिया. पहले जन्म में हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु का अंत करने के लिए वराह और नरसिंह अवतार लिया. दूसरे जन्म में रावण और कुंभकर्ण का वध श्रीराम के रूप में किया. वहीं तीसरे जन्म में शिशुपाल और दंतवक्र का अंत श्रीकृष्ण के रूप में किया. इस तरह हर जन्म में दोनों का सामना भगवान विष्णु से हुआ.
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तीन जन्मों तक भगवान विष्णु के हाथों मृत्यु प्राप्त करने के बाद जय-विजय का श्राप समाप्त हो गया. इसके बाद दोनों को फिर से वैकुंठ धाम लौटने का अवसर मिला. वे अपने पुराने स्थान पर वापस आ गए और भगवान विष्णु के द्वारपाल बनकर उनकी सेवा करने लगे. जय-विजय की यह कथा बताती है कि किस तरह भगवान की लीला में श्राप भी मुक्ति का रास्ता बन सकता है.