दिवाली पर लक्ष्मी पूजा की शुरुआत कैसे हुई? जानिए सदियों पुरानी परंपरा की कहानी

  • November 1, 2026 1:37 pm
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दिवाली आते ही घरों में मां लक्ष्मी की पूजा की तैयारियां शुरू हो जाती हैं. लोग सुख, समृद्धि और खुशहाली के लिए दीप जलाते हैं और विधि-विधान से पूजा करते हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि दिवाली पर लक्ष्मी पूजा की शुरुआत आखिर किसने की थी? क्या इसके पीछे कोई पौराणिक कथा है या फिर यह सदियों पुरानी परंपरा है? आइए, आस्था और इतिहास के जरिए जानते हैं इसकी पूरी कहानी.

दिवाली पर लक्ष्मी पूजा की शुरुआत कैसे हुई? जानिए सदियों पुरानी परंपरा की कहानी
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दिवाली पर हर घर में मां लक्ष्मी की पूजा होती है. लोग सुख, शांति और समृद्धि की कामना करते हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर इस परंपरा की शुरुआत किसने की थी? क्या किसी राजा ने इसकी शुरुआत की या इसके पीछे कोई पौराणिक कथा है? दरअसल, लक्ष्मी पूजा की कहानी काफी पुरानी है, जिसमें आस्था, इतिहास और कई सदियों की परंपराएं जुड़ी हुई हैं.

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दिवाली पर लक्ष्मी पूजा की शुरुआत किसी एक व्यक्ति ने की थी, इसका कोई प्रमाणित ऐतिहासिक रिकॉर्ड नहीं मिलता. न ही किसी खास राजा या साल का नाम सामने आता है. माना जाता है कि यह परंपरा धीरे-धीरे विकसित हुई. अलग-अलग क्षेत्रों की धार्मिक मान्यताओं, लोककथाओं और रीति-रिवाजों ने इसे आज के दिवाली उत्सव का अहम हिस्सा बना दिया.

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लक्ष्मी पूजा से जुड़ी पुरानी परंपराओं का एक महत्वपूर्ण संकेत कश्मीर के 'नीलमत पुराण' में मिलता है. लगभग सातवीं-आठवीं शताब्दी से जुड़े इस ग्रंथ में 'सुखसुप्तिका' उत्सव का वर्णन है. इसमें सूर्यास्त के बाद देवी लक्ष्मी की पूजा करने, दीप जलाने और दुकानों को सजाने का जिक्र मिलता है. ये रीति-रिवाज दिवाली की मौजूदा परंपराओं से काफी मिलते-जुलते हैं

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नीलमत पुराण में लक्ष्मी पूजा का जिक्र जरूर मिलता है, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि पूजा की शुरुआत उसी समय हुई थी. किसी ग्रंथ में किसी परंपरा का उल्लेख मिलना और उसकी शुरुआत का साल पता चलना अलग-अलग बातें हैं. इसके अलावा 13वीं शताब्दी के विद्वान हेमाद्रि ने भी पुराणों के आधार पर शाम को लक्ष्मी पूजा और दीप जलाने की विधि का वर्णन किया था.

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पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, एक बार देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन किया था. इस मंथन से कई अनमोल चीजें निकलीं और इसी दौरान देवी लक्ष्मी भी प्रकट हुईं. मान्यता है कि इसके बाद मां लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को अपना पति चुना. इस कथा से देवी लक्ष्मी के प्राकट्य और उनके धार्मिक महत्व को जोड़ा जाता है. हालांकि, इसका दिवाली पर पूजा शुरू होने के साल से सीधा ऐतिहासिक संबंध साबित नहीं होता.

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देवी लक्ष्मी को हिंदू धर्म में धन, वैभव, सुख और समृद्धि की देवी माना जाता है. पुराने समय में दिवाली का त्योहार नई फसल और आर्थिक गतिविधियों से भी जुड़ा रहा है. किसान अच्छी पैदावार और परिवार की खुशहाली की कामना करते थे. धीरे-धीरे दिवाली के साथ मां लक्ष्मी की आराधना का संबंध मजबूत होता गया. आज भी लोग घर में सुख-समृद्धि और बरकत के लिए उनकी पूजा करते हैं.

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दिवाली का त्योहार व्यापारियों के लिए भी बहुत खास माना जाता है. इस दिन कई व्यापारी अपनी दुकानों और प्रतिष्ठानों की सफाई करते हैं. इसके बाद बहीखातों की पूजा करके नए खाते शुरू करते हैं. उनकी मान्यता है कि नए कारोबारी साल की शुरुआत मां लक्ष्मी के आशीर्वाद से करने पर व्यापार में तरक्की और बरकत बनी रहती है. हालांकि, लक्ष्मी पूजा की शुरुआत केवल व्यापारियों ने की थी, ऐसा कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है.

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उत्तर भारत में दिवाली की सबसे लोकप्रिय कथा भगवान राम से जुड़ी है. मान्यता है कि 14 साल का वनवास पूरा करने और रावण पर विजय पाने के बाद जब राम अयोध्या लौटे, तो लोगों ने दीप जलाकर उनका स्वागत किया. वहीं, लक्ष्मी पूजा धन और समृद्धि से जुड़ी धार्मिक परंपरा है. समय के साथ अलग-अलग कथाएं और रीति-रिवाज दिवाली का हिस्सा बन गए. इसलिए इस पर्व की शुरुआत को किसी एक घटना से जोड़ना मुश्किल है.