क्या भगवान राम ने खाया था लिट्टी-चोखा? जानिए बक्सर की 5 दिवसीय पंचकोशी यात्रा की कहानी

  • August 22, 2026 1:58 pm
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बक्सर की पंचकोशी यात्रा सिर्फ पांच दिनों की धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि आस्था, लोककथा और बिहार के पारंपरिक खान-पान से जुड़ी अनोखी परंपरा है. मान्यता है कि श्रीराम ने इन पांच ऋषि-आश्रमों की यात्रा की थी और वहां के स्थानीय भोजन को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया था. यही वजह है कि यहां हर पड़ाव की अपनी कथा और अपना खास प्रसाद है—और आखिरी दिन लिट्टी-चोखा सबसे खास आकर्षण बन जाता है.

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बिहार के बक्सर में होने वाली पंचकोशी यात्रा सिर्फ धार्मिक स्थलों के दर्शन की यात्रा नहीं है, बल्कि यह सदियों पुरानी लोक-परंपरा, आस्था और खान-पान का अनोखा संगम है. पांच दिनों तक चलने वाली इस यात्रा में श्रद्धालु पांच अलग-अलग पवित्र पड़ावों से गुजरते हैं. हर पड़ाव किसी न किसी ऋषि-आश्रम की परंपरा से जुड़ा माना जाता है और वहां एक खास पारंपरिक प्रसाद ग्रहण किया जाता है. यात्रा की शुरुआत रामरेखा घाट पर गंगा स्नान और पूजा के बाद होती है. खास बात यह है कि यहां रास्ते के साथ भोजन भी धार्मिक और सांस्कृतिक कहानी का हिस्सा बन जाता है.

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स्थानीय धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान राम और उनके भाई लक्ष्मण महर्षि विश्वामित्र के साथ सिद्धाश्रम आए थे. इसी दौरान उन्होंने बक्सर क्षेत्र में स्थित पांच ऋषि-आश्रमों की यात्रा की थी. मान्यता है कि श्रीराम ने प्रत्येक आश्रम में एक रात बिताई, ऋषियों का आशीर्वाद लिया और वहां उपलब्ध स्थानीय भोजन को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया. पंचकोशी यात्रा इसी धार्मिक स्मृति को आज भी जीवित रखती है. श्रद्धालु उन्हीं पांच पड़ावों की परिक्रमा करते हुए आगे बढ़ते हैं. इस यात्रा में धार्मिक कथाएं सिर्फ सुनी नहीं जातीं, बल्कि उन्हें रास्ते, पूजा और पारंपरिक भोजन के जरिए अनुभव किया जाता है.

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पंचकोशी यात्रा का पहला पड़ाव अहिरौली का अहिल्या धाम माना जाता है. धार्मिक परंपरा में इस स्थान को महर्षि गौतम के आश्रम और माता अहिल्या के उद्धार की कथा से जोड़ा जाता है. श्रद्धालु यहां पहुंचकर पूजा-अर्चना करते हैं और आशीर्वाद की कामना करते हैं. इस पड़ाव का पारंपरिक प्रसाद पुआ-पकवान है. घी या तेल में तैयार किए जाने वाले ये मीठे पकवान बिहार के पारंपरिक खान-पान का हिस्सा हैं. यात्रा की शुरुआत मिठास के साथ होती है. यहां धर्म और भोजन एक-दूसरे से जुड़ते दिखाई देते हैं. श्रद्धालुओं के लिए यह सिर्फ प्रसाद नहीं, बल्कि सदियों पुरानी लोक-स्मृति का हिस्सा है.

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यात्रा के दूसरे दिन श्रद्धालु नदांव स्थित नारद आश्रम पहुंचते हैं. यह पड़ाव देवर्षि नारद से जुड़ी धार्मिक परंपरा के लिए जाना जाता है. यहां सामूहिक रूप से खिचड़ी तैयार करने की परंपरा है. बड़े बर्तनों में खिचड़ी बनाई जाती है और भगवान को भोग लगाने के बाद इसे श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद के रूप में बांटा जाता है. साधारण चावल, दाल और मसालों से तैयार होने वाली खिचड़ी यहां सामुदायिक एकता का प्रतीक बन जाती है. अलग-अलग जगहों से आए लोग एक साथ बैठकर प्रसाद ग्रहण करते हैं. पंचकोशी यात्रा का यह पड़ाव बताता है कि सादगी भरा भोजन भी लोगों को जोड़ने की बड़ी ताकत रखता है.

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तीसरे दिन पंचकोशी यात्रा भभुअर पहुंचती है. इस स्थान को भार्गव ऋषि की तपोस्थली से जुड़ा माना जाता है. यहां श्रद्धालु पूजा-अर्चना करने के बाद चूड़ा-दही का प्रसाद ग्रहण करते हैं. चूड़ा और दही बिहार के ग्रामीण और घरेलू खान-पान में लंबे समय से शामिल रहे हैं. कोई शाही व्यंजन नहीं, कोई खास सजावट नहीं—फिर भी यही सादा भोजन यात्रा की धार्मिक परंपरा का हिस्सा बन जाता है. पंचकोशी यात्रा की खासियत भी यही है कि यहां स्थानीय भोजन को सम्मान मिलता है. मिट्टी से जुड़े साधारण व्यंजन श्रद्धालुओं को अपनी जड़ों, लोकजीवन और पुरानी परंपराओं से जोड़ते हैं.

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चौथे दिन श्रद्धालु बड़का नुआंव के उद्दालक आश्रम पहुंचते हैं. यहां अंजनी सरोवर के तट पर पूजा और परिक्रमा की धार्मिक परंपरा है. पूजा के बाद श्रद्धालु सत्तू और मूली का प्रसाद ग्रहण करते हैं. बिहार के ग्रामीण जीवन में सत्तू लंबे समय से पौष्टिक और आसानी से उपलब्ध भोजन के रूप में लोकप्रिय रहा है. यात्रा में यही साधारण भोजन धार्मिक प्रसाद का रूप ले लेता है. सत्तू और मूली का यह मेल बिहार की मिट्टी, मौसम और ग्रामीण जीवन की झलक दिखाता है. पंचकोशी यात्रा में भोजन सिर्फ पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि स्थानीय संस्कृति और जीवनशैली की पहचान भी है.

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पंचकोशी यात्रा का अंतिम पड़ाव चरित्रवन है, जिसे स्थानीय धार्मिक मान्यता में महर्षि विश्वामित्र के आश्रम से जोड़ा जाता है. इस दिन लिट्टी-चोखा पारंपरिक प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है. श्रद्धालु उपलों की आंच पर लिट्टी सेंकते हैं और आलू-बैंगन का चोखा तैयार करते हैं. कई जगह लोग मिलकर भोजन बनाते और एक-दूसरे के साथ साझा करते हैं. स्थानीय मान्यता और लोककथाओं में इस भोजन को श्रीराम की यात्रा से भी जोड़ा जाता है. इसी कारण लिट्टी-चोखा पंचकोशी यात्रा की सबसे चर्चित पहचान बन गया है. पांच दिनों की यात्रा का समापन लोकभोजन और सामूहिक प्रसाद के साथ होता है.

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पंचकोशी यात्रा की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां धर्म और लोकजीवन एक-दूसरे से अलग नहीं हैं. पांच दिन, पांच आश्रम और पांच अलग-अलग प्रसाद—हर पड़ाव अपनी एक कहानी कहता है. पुआ-पकवान से लेकर खिचड़ी, चूड़ा-दही, सत्तू-मूली और लिट्टी-चोखा तक, इन व्यंजनों में बिहार के घरों, खेतों और ग्रामीण जीवन की झलक मिलती है. श्रद्धालु रामकथा को केवल सुनते नहीं, बल्कि उन्हीं रास्तों पर चलते हैं, सामूहिक रूप से भोजन बनाते हैं और प्रसाद साझा करते हैं. यही वजह है कि पंचकोशी यात्रा धार्मिक आस्था के साथ बिहार की FOOD HERITAGE और सामुदायिक संस्कृति को भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रखती है.