शिक्षा का भविष्य या स्कूलों की सुरक्षा? असली प्राथमिकता क्या?

  • August 26, 2026 11:08 pm
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भारत AI, Quantum और Deep-Tech के दौर में तेजी से आगे बढ़ने का सपना देख रहा है, लेकिन देश के कई स्कूलों की जमीनी हकीकत अब भी चिंता बढ़ाती है. जर्जर इमारतें, गिरती छतें, शिक्षकों की कमी और बुनियादी सुविधाओं का अभाव बच्चों के भविष्य पर सवाल खड़े कर रहा है. बड़ा सवाल है—भविष्य की शिक्षा की तैयारी से पहले क्या आज के स्कूल सुरक्षित हैं?

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भारत शिक्षा को AI, Quantum, Research और Innovation से जोड़कर भविष्य की नई तस्वीर तैयार कर रहा है. लेकिन देश के कई स्कूलों की मौजूदा तस्वीर इससे बिल्कुल अलग है. कहीं जर्जर इमारतें हैं, कहीं गिरती छतें, तो कहीं बच्चों के लिए पर्याप्त Classroom और Toilets तक नहीं हैं. कुछ स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की कमी अब सिर्फ पढ़ाई की समस्या नहीं, बल्कि बच्चों की सुरक्षा का सवाल बन चुकी है. सवाल यह है कि जब स्कूल की इमारत ही सुरक्षित नहीं, तो आधुनिक शिक्षा का सपना कितना मजबूत होगा? भविष्य की शिक्षा से पहले क्या वर्तमान के स्कूल सुरक्षित हैं?

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25 अगस्त 2026, डूंगरपुर, राजस्थान, सरकारी स्कूल की जर्जर छत अचानक भरभराकर गिर गई. हादसे के वक्त करीब 120 बच्चे स्कूल में मौजूद थे. गनीमत रही कि जिस कमरे की छत गिरी, वह करीब एक साल से बंद था, वरना हादसा बेहद गंभीर हो सकता था. स्कूल के 10 कमरों में से 2 को जर्जर बताया गया था. खास बात यह है कि मरम्मत और नई छत के प्रस्ताव पहले ही भेजे जा चुके थे. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है—जब खतरे की जानकारी पहले से थी, तो बच्चों की सुरक्षा के लिए समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

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25 जुलाई 2025, झालावाड़, राजस्थान, सरकारी स्कूल की Classroom Ceiling गिरने से 7 बच्चों की मौत हो गई, जबकि कम-से-कम 21 बच्चे घायल हुए थे. इनमें 10 बच्चों की हालत गंभीर बताई गई थी. हादसे के बाद प्रधानाचार्य और चार शिक्षकों को निलंबित किया गया. यह घटना सिर्फ एक स्कूल की लापरवाही नहीं, बल्कि स्कूलों की सुरक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल बनकर सामने आई. अगर किसी इमारत में दरार, जर्जर छत या कमजोर ढांचा पहले से दिखाई दे रहा हो, तो बच्चों को उसी कमरे में बैठाना कितना सुरक्षित है? हादसे के बाद कार्रवाई से बेहतर है हादसे से पहले सुरक्षा.

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जयपुर, 2025-26, जर्जर स्कूल भवन को बच्चों की सुरक्षा के लिए खाली करा दिया गया, लेकिन इसके बाद बच्चों के लिए वैकल्पिक कक्षाओं की पर्याप्त व्यवस्था नहीं हो सकी. नतीजा यह हुआ कि बच्चों को Cattle Shed में पढ़ना पड़ा. ऊपर Tin Shed और आसपास पशुओं का चारा—यही उनकी पढ़ाई की जगह बन गई. ग्रामीण करीब डेढ़ साल से स्कूल की समस्या की शिकायत कर रहे थे. भवन निर्माण के लिए ₹12.50 लाख मंजूर होने की बात भी सामने आई, लेकिन काम शुरू नहीं हुआ. सवाल सिर्फ यह नहीं कि बच्चे कहाँ पढ़ रहे हैं, बल्कि यह है कि उन्हें सुरक्षित और सम्मानजनक Learning Environment कब मिलेगा?

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अलग-अलग राज्यों से सामने आई घटनाएँ स्कूल Infrastructure की गंभीर तस्वीर दिखाती हैं. 2025 में तिरुत्तनी, तमिलनाडु में सरकारी स्कूल की दीवार गिरने से Class 7 के एक छात्र की मौत हुई. 2026 में फरीदाबाद में निर्माणाधीन इमारत की दीवार स्कूल की छत पर गिरने से चार बच्चे घायल हुए. 2024 में आगरा में भारी बारिश के दौरान दो स्कूलों की छत और दीवारें गिर गई थीं, हालांकि कोई जनहानि नहीं हुई. घटनाएँ अलग-अलग हैं, लेकिन सवाल एक है—क्या देश के हर बच्चे को सुरक्षित स्कूल भवन मिलना उसकी बुनियादी जरूरत नहीं होनी चाहिए?

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2026, पोलावरम, आंध्र प्रदेश. कई Tribal Schools में छतों से पानी रिसने, Temporary Sheds में कक्षाएँ चलने और अधूरे भवनों जैसी समस्याएँ सामने आती हैं. कई जगह बच्चों के लिए पर्याप्त Desks और Benches तक उपलब्ध नहीं हैं. कुछ स्कूलों में करीब 200 छात्र Congested Classrooms में पढ़ने को मजबूर हैं. यानी समस्या सिर्फ जर्जर छतों तक सीमित नहीं है. स्कूल भवन, Classroom Space, Furniture, बिजली, इंटरनेट और अन्य बुनियादी सुविधाएँ भी शिक्षा की गुणवत्ता तय करती हैं. जब बच्चे भीड़भरे या अस्थायी कमरों में पढ़ते हैं, तो आधुनिक और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का लक्ष्य अपने आप कमजोर पड़ जाता है.

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देश में 1 लाख से अधिक शिक्षक पद खाली होने की बात सामने आती है, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में. करीब 1,04,125 स्कूलों में सिर्फ एक शिक्षक है और इनमें लगभग 89% स्कूल ग्रामीण क्षेत्रों में हैं. झारखंड में एक शिक्षक पर करीब 47 बच्चे होने का आंकड़ा भी सामने आता है. ऐसे स्कूलों में शिक्षक को अलग-अलग कक्षाओं और विषयों की जिम्मेदारी संभालनी पड़ सकती है. यानी बच्चों की शिक्षा की चुनौती सिर्फ सुरक्षित भवन तक सीमित नहीं है. अगर Classroom तो हो, लेकिन पर्याप्त शिक्षक नहीं हों, तो शिक्षा व्यवस्था की बुनियाद फिर भी अधूरी रहेगी.

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शिक्षा व्यवस्था में एक और चुनौती है—शिक्षकों का गैर-शैक्षणिक कामों में लगना. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 10-12% शिक्षक जरूरी Professional Qualification पूरी नहीं करते. एक अध्ययन में हर चार में से एक सरकारी शिक्षक के स्कूल से अनुपस्थित मिलने की बात सामने आई. इसके अलावा शिक्षकों को पढ़ाने के अलावा 23 से अधिक तरह के गैर-शैक्षणिक काम भी करने पड़ते हैं. इसका सीधा असर Classroom Teaching पर पड़ सकता है. सवाल यह है कि जब शिक्षक का समय प्रशासनिक और दूसरे कामों में बंटता रहेगा, तो बच्चों की Learning पर पूरा ध्यान कैसे दिया जाएगा?

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भारत AI, Quantum और Deep-Tech के क्षेत्र में आगे बढ़ने की तैयारी कर रहा है. शिक्षा का बजट ₹1.39 लाख करोड़ से अधिक है, फिर भी शिक्षा पर खर्च GDP के करीब 4-4.5% के आसपास है और NEP का 6% GDP लक्ष्य अभी दूर है. करीब 5% स्कूलों में बिजली नहीं, 32.6% में इंटरनेट नहीं और 41.8% स्कूल दिव्यांग-अनुकूल नहीं हैं. ऐसे में सवाल सिर्फ नई घोषणाओं का नहीं, मौजूदा स्कूलों की स्थिति का भी है. AI और Quantum का भविष्य तभी मजबूत होगा, जब आज के स्कूल सुरक्षित, सक्षम और शिक्षक-सम्पन्न होंगे. सवाल—नई घोषणाएँ पहले या सुरक्षित स्कूल पहले?