Independence Day Special; आजादी के वो 5 गुमनाम नायक, जिनके बलिदान ने लिखी भारत की वीरगाथा

  • August 14, 2026 3:14 pm
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आजादी की कहानी सिर्फ भगत सिंह, गांधी और सुभाष चंद्र बोस जैसे बड़े नामों तक सीमित नहीं है, देश की आजादी के लिए कई ऐसे वीरों ने भी अपना सब कुछ न्योछावर किया, जिनका नाम इतिहास की किताबों में बहुत कम दिखाई देता है. किसी ने भगत सिंह की जान बचाई, किसी ने गोलियां खाकर भी तिरंगा नहीं झुकने दिया, तो किसी ने कम उम्र में अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा संभाला. इस स्वतंत्रता दिवस पर जानिए ऐसे ही 5 गुमनाम नायकों की साहस और बलिदान से भरी कहानी.

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दुर्गावती देवी, जिन्हें प्यार से ‘दुर्गा भाभी’ कहा जाता था, भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की साहसी क्रांतिकारियों में शामिल थीं. वे हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) से जुड़ी थीं और क्रांतिकारियों की मदद करती थीं. 1928 में लाहौर में अंग्रेज अधिकारी जे.पी. सांडर्स की हत्या के बाद भगत सिंह को सुरक्षित बाहर निकालने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर भगत सिंह की पत्नी होने का नाटक किया और उनके साथ लाहौर से निकलीं. दुर्गा भाभी ने क्रांतिकारियों के लिए हथियार और धन जुटाने में भी सहयोग किया. उनका साहस आज भी प्रेरणा देता है.

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मातंगिनी हाजरा बंगाल की ऐसी वीर महिला थीं, जिन्होंने बुढ़ापे में भी अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन में हिस्सा लिया. उन्हें लोग प्यार से ‘गांधी बुरी’ यानी बुजुर्ग गांधीवादी महिला कहते थे. 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्होंने तमलुक में एक बड़े जुलूस का नेतृत्व किया. उनके हाथ में तिरंगा था और वे आगे बढ़ती रहीं. अंग्रेज पुलिस ने उन पर गोलियां चलाईं. गोली लगने के बाद भी उन्होंने तिरंगा जमीन पर नहीं गिरने दिया. वे लगातार ‘वंदे मातरम’ बोलती रहीं और वहीं शहीद हो गईं. उनका बलिदान स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की बहादुरी का प्रतीक बन गया.

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पीर अली खान का नाम 1857 की क्रांति के बिहार से जुड़े प्रमुख क्रांतिकारियों में लिया जाता है. वे पेशे से किताबों की जिल्द बांधने का काम करते थे, लेकिन उनकी दुकान धीरे-धीरे क्रांतिकारियों की गुप्त बैठकों का केंद्र बन गई. पटना में अंग्रेजी शासन के खिलाफ लोगों को संगठित करने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. जुलाई 1857 में विद्रोह के दौरान वे अंग्रेजों के निशाने पर आए. उन्हें गिरफ्तार कर कड़ी सजा दी गई और अंत में फांसी दे दी गई. अंग्रेजों ने उनसे उनके साथियों के बारे में जानकारी हासिल करने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने अपने साथियों के नाम नहीं बताए.

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रानी गाइदिनल्यू पूर्वोत्तर भारत की महान स्वतंत्रता सेनानी थीं. उन्होंने बहुत कम उम्र में अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष शुरू कर दिया था. करीब 13 वर्ष की उम्र में वे अपने चचेरे भाई हाइपौ जादोनांग के नेतृत्व वाले नागा आंदोलन से जुड़ीं और बाद में आंदोलन की कमान संभाली. अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर आजीवन कारावास की सजा दी और उन्होंने करीब 14 वर्ष जेल में बिताए. स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जवाहरलाल नेहरू उनसे प्रभावित हुए और उन्हें ‘रानी’ कहकर संबोधित किया. आजादी के बाद भी वे अपने समुदाय और संस्कृति के लिए काम करती रहीं. उनका जीवन साहस और संघर्ष की मिसाल है.

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तमिलनाडु के युवा स्वतंत्रता सेनानी तिरुप्पुर कुमारन ने देश की आजादी के लिए कम उम्र में ही संघर्ष शुरू कर दिया था. उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लिया और युवाओं को आंदोलन से जोड़ने का प्रयास किया. 1932 में एक विरोध जुलूस के दौरान पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया. कुमारन गंभीर रूप से घायल हो गए, लेकिन उनके हाथ में मौजूद राष्ट्रीय ध्वज जमीन पर नहीं गिरा. उन्होंने आखिरी सांस तक तिरंगे को मजबूती से पकड़े रखा. इसी कारण उन्हें ‘कोडी काथा कुमारन’, यानी ‘झंडे की रक्षा करने वाला कुमारन’ कहा गया. उनका बलिदान देशभक्ति की मिसाल बन गया.