National Handloom Day special: भारत की 10 सबसे प्रसिद्ध हैंडलूम बुनाइयाँ, जानिए क्यों हैं दुनिया भर में मशहूर

  • August 7, 2026 12:13 pm
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National Handloom Day 2026: भारत की हथकरघा परंपरा सदियों पुरानी है और हर राज्य की बुनाई अपनी अलग पहचान रखती है. बनारसी सिल्क से लेकर तसर सिल्क तक, ये हैंडलूम वीव्स देश की समृद्ध संस्कृति, कारीगरी और विरासत को दुनिया भर में पहचान दिलाती हैं. राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर जानिए भारत की 10 सबसे प्रसिद्ध हैंडलूम बुनाइयों की खासियत और उनका इतिहास.

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उत्तर प्रदेश के वाराणसी में बनने वाली बनारसी सिल्क भारत की सबसे प्रतिष्ठित हैंडलूम बुनाइयों में गिनी जाती है. इसकी पहचान सोने-चांदी की जरी, बूटेदार डिज़ाइन और शाही कारीगरी से होती है. एक असली बनारसी साड़ी को तैयार करने में कई हफ्तों से लेकर महीनों तक का समय लग सकता है. भारतीय शादियों में यह दुल्हनों की पहली पसंद मानी जाती है और इसे भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक माना जाता है.

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तमिलनाडु के कांचीपुरम शहर में बुनी जाने वाली कांजीवरम सिल्क अपनी मजबूती, चमकीले रंगों और चौड़े बॉर्डर के लिए प्रसिद्ध है. इसमें शुद्ध मुलबेरी रेशम और असली जरी का उपयोग किया जाता है. मंदिरों की वास्तुकला, पौराणिक आकृतियां और पारंपरिक मोटिफ इसकी खास पहचान हैं. यह साड़ी इतनी टिकाऊ होती है कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी विरासत के रूप में संभालकर रखी जाती है.

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मध्य प्रदेश के चंदेरी शहर की चंदेरी साड़ी अपनी हल्की, मुलायम और पारदर्शी बनावट के लिए जानी जाती है यह रेशम और सूती धागों के मिश्रण से तैयार की जाती है, जिससे इसका कपड़ा बेहद आरामदायक बनता है. इसके किनारों पर सुनहरी जरी और पारंपरिक डिज़ाइन इसे शाही लुक देते हैं. गर्मियों के मौसम में यह महिलाओं की सबसे पसंदीदा हैंडलूम साड़ियों में से एक है.

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महाराष्ट्र के पैठन शहर की पैठणी साड़ी अपनी रंगीन बुनाई और हाथ से बनाए गए मोर, कमल, तोता और बेल-बूटों के डिज़ाइन के लिए प्रसिद्ध है. इसे तैयार करने में महीनों का समय लग सकता है. इसकी हर साड़ी एक अनोखी कलाकृति होती है, इसलिए इसे महाराष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान और पारंपरिक विरासत का गौरव माना जाता है.

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गुजरात के पाटन में बनने वाली पटोला साड़ी दुनिया की सबसे जटिल हैंडलूम बुनाइयों में से एक है. इसमें डबल इकट तकनीक का इस्तेमाल होता है, जिसमें धागों को पहले रंगा जाता है और फिर हाथ से बुना जाता है. इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि साड़ी के दोनों तरफ एक जैसा डिज़ाइन दिखाई देता है. एक पटोला साड़ी तैयार करने में कई महीने से लेकर एक साल तक का समय लग सकता है.

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पश्चिम बंगाल की जामदानी बुनाई अपनी महीन मलमल और करघे पर सीधे बुने गए फूल-पत्तियों के डिज़ाइन के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है. यह कला बेहद धैर्य और कुशलता की मांग करती है. हल्की होने के बावजूद इसकी खूबसूरती और बारीक कारीगरी इसे भारत की सबसे खास हैंडलूम परंपराओं में शामिल करती है.

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तेलंगाना के भूदान पोचमपल्ली गांव की पोचमपल्ली इकट अपनी रंगीन ज्यामितीय आकृतियों और अनोखी बुनाई तकनीक के लिए मशहूर है. इसमें धागों को पहले बांधकर रंगा जाता है और फिर उनसे डिज़ाइन तैयार किए जाते हैं. यह कला भारत की पारंपरिक हैंडलूम विरासत का शानदार उदाहरण है और इसे जीआई टैग भी प्राप्त है.

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असम का मूगा सिल्क दुनिया का सबसे अनोखा प्राकृतिक सुनहरे रंग का रेशम माना जाता है. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि समय के साथ इसकी चमक और बढ़ती जाती है. यह बेहद मजबूत, टिकाऊ और शानदार गुणवत्ता वाला रेशम है, जिससे पारंपरिक मेखला-चादर और अन्य परिधान तैयार किए जाते हैं.

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झारखंड और बिहार का तसर सिल्क जंगली रेशम के कीड़ों से तैयार किया जाता है. इसकी प्राकृतिक सुनहरी चमक, खुरदुरी लेकिन आकर्षक बनावट और हाथ से की गई बुनाई इसे बेहद खास बनाती है. इस उद्योग से हजारों आदिवासी और ग्रामीण परिवार जुड़े हुए हैं, इसलिए तसर सिल्क केवल एक कपड़ा नहीं बल्कि लाखों लोगों की आजीविका का भी महत्वपूर्ण साधन है.

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राजस्थान के कोटा शहर की कोटा डोरिया बुनाई अपनी हल्की, हवा पार होने वाली बनावट और चौकोर 'खाट' (चेक) पैटर्न के लिए प्रसिद्ध है. इसे सूती और रेशमी धागों के मिश्रण से तैयार किया जाता है. गर्मियों में इसकी ठंडक और आरामदायक बनावट इसे महिलाओं की पसंदीदा हैंडलूम साड़ियों में शामिल करती है. इसकी सादगी और खूबसूरती इसे भारत ही नहीं, विदेशों में भी लोकप्रिय बनाती है.