कौन हैं नंदन नीलेकणि? PM मोदी ने दी परीक्षा सुधार की बड़ी जिम्मेदारी

  • July 27, 2026 8:47 pm
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NEET पेपर लीक और परीक्षा व्यवस्था में सामने आई गड़बड़ियों के बाद अब परीक्षा प्रणाली में बड़े सुधार की तैयारी है. इसी बीच टेक्नोलॉजी और डिजिटल सिस्टम के विशेषज्ञ नंदन नीलेकणि को लेकर चर्चा तेज है. आधार से लेकर भारत के डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर तक अहम भूमिका निभाने वाले नीलेकणि के अनुभव का इस्तेमाल परीक्षा व्यवस्था को ज्यादा सुरक्षित, पारदर्शी और तकनीक आधारित बनाने में किया जा सकता है. आखिर कौन हैं नंदन नीलेकणि, उन्हें ‘आधार का जनक’ क्यों कहा जाता है और परीक्षा सुधार में उनकी भूमिका क्या होगी?

कौन हैं नंदन नीलेकणि? PM मोदी ने दी परीक्षा सुधार की बड़ी जिम्मेदारी
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नंदन नीलेकणि भारत के जाने-माने टेक्नोलॉजी विशेषज्ञ, उद्यमी और डिजिटल बदलाव के प्रमुख चेहरों में शामिल हैं. उन्होंने भारत की डिजिटल व्यवस्था को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई है. इंफोसिस के सह-संस्थापक के रूप में उन्होंने देश के IT सेक्टर को नई पहचान दिलाने में योगदान दिया. बाद में आधार परियोजना से जुड़े और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने की दिशा में काम किया. अब परीक्षा व्यवस्था में सुधार की जिम्मेदारी मिलने से उनका नाम एक बार फिर चर्चा में है. सरकार का लक्ष्य तकनीक की मदद से परीक्षा प्रणाली को ज्यादा सुरक्षित, पारदर्शी और भरोसेमंद बनाना है.

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नंदन नीलेकणि का जन्म 2 जून 1955 को बेंगलुरु में हुआ था. उन्होंने अपनी शुरुआती शिक्षा के बाद IIT बॉम्बे से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की. तकनीक और मैनेजमेंट के क्षेत्र में उनकी गहरी समझ ने उन्हें आगे बढ़ने में मदद की. वर्ष 1981 में उन्होंने कुछ साथियों के साथ मिलकर इंफोसिस की स्थापना की. वे कंपनी के CEO और बाद में चेयरमैन भी रहे. IT सेक्टर में सफलता के बाद उन्होंने सार्वजनिक क्षेत्र में डिजिटल बदलाव से जुड़े कई महत्वपूर्ण कार्य किए. भारत की डिजिटल पहचान और तकनीकी व्यवस्था को मजबूत करने में उनका योगदान खास माना जाता है

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नंदन नीलेकणि ने भारत के IT उद्योग को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. वे इंफोसिस के सह-संस्थापकों में से एक हैं. कंपनी की शुरुआत 1981 में हुई और धीरे-धीरे यह दुनिया की प्रमुख IT कंपनियों में शामिल हुई. नीलेकणि ने CEO के रूप में कंपनी का नेतृत्व भी किया. उनके नेतृत्व में तकनीक, पारदर्शिता और प्रोफेशनल मैनेजमेंट को खास महत्व मिला. इंफोसिस में काम करने के दौरान उन्होंने बड़े स्तर पर टेक्नोलॉजी सिस्टम को संभालने और संस्थागत बदलावों का अनुभव हासिल किया. यही अनुभव आगे चलकर आधार और भारत के डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े काम में उपयोगी साबित हुआ.

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नंदन नीलेकणि को अक्सर 'आधार के जनक' के रूप में जाना जाता है. वर्ष 2009 में उन्हें UIDAI का पहला चेयरमैन नियुक्त किया गया था. उनके नेतृत्व में आधार परियोजना को आकार देने और देशभर में लागू करने की दिशा में महत्वपूर्ण काम हुआ. इसका उद्देश्य लोगों को एक यूनिक डिजिटल पहचान उपलब्ध कराना था. आधार ने सरकारी सेवाओं, पहचान सत्यापन और डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर यानी DBT को डिजिटल बनाने में अहम भूमिका निभाई. करोड़ों भारतीयों को इससे जोड़ा गया. भारत में इतने बड़े पैमाने पर डिजिटल पहचान प्रणाली तैयार करना अपने आप में एक बड़ी तकनीकी और प्रशासनिक चुनौती थी.

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नंदन नीलेकणि को अक्सर 'आधार के जनक' के रूप में जाना जाता है. वर्ष 2009 में उन्हें UIDAI का पहला चेयरमैन नियुक्त किया गया था. उनके नेतृत्व में आधार परियोजना को आकार देने और देशभर में लागू करने की दिशा में महत्वपूर्ण काम हुआ. इसका उद्देश्य लोगों को एक यूनिक डिजिटल पहचान उपलब्ध कराना था. आधार ने सरकारी सेवाओं, पहचान सत्यापन और डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर यानी DBT को डिजिटल बनाने में अहम भूमिका निभाई. करोड़ों भारतीयों को इससे जोड़ा गया. भारत में इतने बड़े पैमाने पर डिजिटल पहचान प्रणाली तैयार करना अपने आप में एक बड़ी तकनीकी और प्रशासनिक चुनौती थी.

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NEET पेपर लीक और परीक्षाओं में गड़बड़ी की चिंताओं के बीच परीक्षा प्रणाली में सुधार की जरूरत बढ़ी है. ऐसे समय में नंदन नीलेकणि का तकनीकी और बड़े डिजिटल सिस्टम का अनुभव महत्वपूर्ण माना जा रहा है. उन्होंने आधार जैसी विशाल डिजिटल पहचान परियोजना के निर्माण में नेतृत्व किया है. बड़े पैमाने पर सुरक्षित टेक्नोलॉजी सिस्टम तैयार करने का उनका अनुभव परीक्षा व्यवस्था में भी उपयोगी हो सकता है. सरकार का फोकस ऐसी व्यवस्था बनाने पर है, जिसमें पेपर लीक, नकल और धांधली की गुंजाइश कम हो और छात्रों को परीक्षा प्रक्रिया पर ज्यादा भरोसा हो.

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परीक्षा सुधार से जुड़ी जिम्मेदारी के तहत सबसे बड़ी चुनौती परीक्षा प्रणाली को पेपर लीक, नकल और धांधली से सुरक्षित बनाना होगी. इसके लिए तकनीक के बेहतर इस्तेमाल, डेटा सुरक्षा और परीक्षा प्रक्रिया की निगरानी जैसे क्षेत्रों में सुधार की जरूरत हो सकती है. हाई पावर टास्क फोर्स का उद्देश्य परीक्षा व्यवस्था की मौजूदा चुनौतियों को समझना और उनके समाधान सुझाना है. इसमें डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाने के साथ-साथ सिस्टम को ज्यादा पारदर्शी और सुरक्षित बनाने पर जोर दिया जा सकता है. लक्ष्य ऐसी व्यवस्था तैयार करना है, जिस पर देशभर के छात्र और अभिभावक भरोसा कर सकें.

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नंदन नीलेकणि के अनुभव का इस्तेमाल परीक्षा व्यवस्था को आधुनिक और तकनीक आधारित बनाने में किया जा सकता है. भविष्य में परीक्षा प्रक्रिया में डिजिटल सुरक्षा, बेहतर डेटा प्रबंधन, मजबूत निगरानी और पारदर्शी सिस्टम पर जोर बढ़ सकता है. पेपर लीक जैसी घटनाओं को रोकने के लिए तकनीकी उपायों की सिफारिश भी की जा सकती है. हालांकि, सुधार सिर्फ तकनीक तक सीमित नहीं होंगे. परीक्षा व्यवस्था में प्रशासनिक जवाबदेही, सुरक्षित प्रश्नपत्र प्रबंधन और मजबूत निगरानी भी जरूरी है. अगर इन सभी पहलुओं पर प्रभावी तरीके से काम हुआ, तो छात्रों के लिए परीक्षा प्रणाली ज्यादा सुरक्षित, पारदर्शी और भरोसेमंद बन सकती है.