भारत की 10 जनजातीय चित्रकलाएं, जिनकी कला पर दुनिया करती है नाज़

  • July 17, 2026 6:33 pm
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भारत की जनजातीय चित्रकलाएं केवल रंगों और आकृतियों का मेल नहीं, बल्कि सदियों पुरानी संस्कृति, परंपराओं और प्रकृति से जुड़े जीवन का जीवंत दस्तावेज हैं. देश के अलग-अलग राज्यों में रहने वाली जनजातियों ने अपनी आस्था, रीति-रिवाज, त्योहार, लोककथाओं और दैनिक जीवन को चित्रों के माध्यम से संजोकर रखा है. मिट्टी, पत्थर, पेड़ों की छाल, फूलों और प्राकृतिक रंगों से बनाई जाने वाली ये कलाएं आज भी अपनी मौलिकता और खूबसूरती के लिए दुनिया भर में सराही जाती हैं. इन अनमोल कलाओं की विशिष्ट पहचान और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के लिए कई जनजातीय चित्रकलाओं को भौगोलिक संकेतक (GI Tag) भी प्रदान किया गया है. आइए जानते हैं भारत की ऐसी 10 प्रसिद्ध जनजातीय चित्रकलाओं के बारे में, जो अपनी अनूठी शैली, इतिहास और सांस्कृतिक महत्व के कारण देश ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में अपनी अलग पहचान बना चुकी हैं.

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झारखंड के हजारीबाग क्षेत्र की सोहराय चित्रकला भारत की सबसे प्राचीन आदिवासी भित्ति कलाओं में से एक मानी जाती है. यह चित्रकला मुख्य रूप से सोहराय पर्व, यानी फसल कटाई और पशुधन के सम्मान में मनाए जाने वाले त्योहार के दौरान घरों की दीवारों पर बनाई जाती है. संथाल, उरांव, मुंडा और कुरमी समुदाय की महिलाएं प्राकृतिक मिट्टी, कोयला, गेरू और सफेद पत्थर से बने रंगों का उपयोग करती हैं. इसमें बैल, गाय, हाथी, हिरण, मोर, पेड़-पौधे और प्रकृति के सुंदर दृश्य बनाए जाते हैं, जो समृद्धि, उर्वरता और प्रकृति के प्रति सम्मान का प्रतीक हैं. इसकी अनूठी शैली और सांस्कृतिक महत्व को देखते हुए वर्ष 2020 में झारखंड की सोहराय चित्रकला को GI टैग प्रदान किया गया, जिससे इसे अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली.

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झारखंड के हजारीबाग क्षेत्र की खोवर चित्रकला एक प्राचीन आदिवासी भित्ति कला है, जो विशेष रूप से विवाह के अवसर पर दुल्हन के घर की दीवारों पर बनाई जाती है. 'खोवर' शब्द का अर्थ विवाह कक्ष होता है. इस कला में बेल-बूटे, फूल, पेड़, पक्षी, मछलियां, मोर और ज्यामितीय आकृतियां उकेरी जाती हैं, जो प्रेम, उर्वरता, समृद्धि और नए जीवन का प्रतीक मानी जाती हैं. इसे पूरी तरह प्राकृतिक मिट्टी और खनिज रंगों से तैयार किया जाता है. इसकी सांस्कृतिक विरासत और अनूठी शैली को पहचान देते हुए वर्ष 2020 में खोवर चित्रकला को GI टैग प्रदान किया गया.

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महाराष्ट्र के पालघर, ठाणे और नासिक क्षेत्र की वारली चित्रकला वारली जनजाति की विश्व प्रसिद्ध लोक कला है. यह चित्रकला अपनी सादगी और अनोखी शैली के लिए जानी जाती है, जिसमें केवल वृत्त, त्रिकोण और सीधी रेखाओं के माध्यम से मानव जीवन, खेती, शिकार, नृत्य, विवाह और प्रकृति का चित्रण किया जाता है. लाल या मिट्टी के रंग की पृष्ठभूमि पर सफेद रंग से बनाए गए चित्र इसकी सबसे बड़ी पहचान हैं. आज यह कला भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में लोकप्रिय है। इसकी विशिष्ट पहचान के कारण वर्ष 2014 में वारली चित्रकला को GI टैग प्रदान किया गया.

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गोंड चित्रकला मध्य प्रदेश की गोंड जनजाति की पारंपरिक कला है, जिसका इतिहास सैकड़ों वर्षों पुराना है. इस चित्रकला में रंग-बिरंगे बिंदुओं, रेखाओं और आकर्षक पैटर्न के माध्यम से पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, देवी-देवता, लोककथाएं और प्रकृति को जीवंत रूप में दर्शाया जाता है. गोंड कलाकारों का मानना है कि प्रकृति की हर वस्तु में जीवन होता है, इसलिए उनके चित्र जीवंत दिखाई देते हैं. आज यह कला अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों और कला दीर्घाओं तक पहुंच चुकी है. इसकी विशिष्ट शैली को सम्मान देते हुए वर्ष 2023 में गोंड चित्रकला को GI टैग प्रदान किया गया

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पिथोरा चित्रकला गुजरात और मध्य प्रदेश की राठवा, भील और नायक जनजातियों की धार्मिक एवं सांस्कृतिक लोक कला है. यह चित्रकला किसी शुभ कार्य, मनोकामना पूरी होने या विशेष धार्मिक अनुष्ठान के अवसर पर घरों की दीवारों पर बनाई जाती है. इसमें घोड़े, देवता, सूर्य, चंद्रमा, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे और प्रकृति के विभिन्न दृश्य दर्शाए जाते हैं. पूरी चित्रकला प्राकृतिक रंगों से बनाई जाती है और इसे आदिवासी आस्था का महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है. इसकी विशिष्ट पहचान के कारण वर्ष 2021 में पिथोरा चित्रकला को GI टैग प्रदान किया गया.

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ओडिशा की सौरा चित्रकला सौरा जनजाति की सबसे प्राचीन पारंपरिक कलाओं में से एक है. इस चित्रकला में मानव जीवन, खेती, जंगल, शिकार, पूजा-पाठ, त्योहार और प्रकृति के विभिन्न पहलुओं को सरल रेखाओं और प्रतीकों के माध्यम से दर्शाया जाता है. इसे घरों की दीवारों पर प्राकृतिक रंगों से बनाया जाता है और धार्मिक अनुष्ठानों में इसका विशेष महत्व होता है. इसकी अनोखी शैली और सांस्कृतिक महत्व के कारण वर्ष 2024 में सौरा चित्रकला को GI टैग प्रदान किया गया.

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बिहार के मिथिला क्षेत्र की मधुबनी चित्रकला भारत की सबसे प्रसिद्ध लोक कलाओं में से एक है. इस चित्रकला में भगवान राम, कृष्ण, शिव, दुर्गा, सूर्य, चंद्रमा, विवाह, प्रकृति और लोक जीवन से जुड़े सुंदर चित्र बनाए जाते हैं. प्राकृतिक रंगों, बारीक रेखाओं और आकर्षक डिजाइनों के कारण यह कला पूरी दुनिया में अपनी अलग पहचान रखती है. इसे मुख्य रूप से महिलाएं हाथ से बनाती हैं और यह मिथिला संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है. इसकी ऐतिहासिक और कलात्मक पहचान को देखते हुए वर्ष 2007 में मधुबनी चित्रकला को GI टैग प्रदान किया गया.

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कलमकारी चित्रकला भारत की प्राचीन हस्तचित्र कला है, जिसका नाम 'कलम' अर्थात बांस की कलम और 'कारी' अर्थात कारीगरी से मिलकर बना है. इसमें प्राकृतिक रंगों की सहायता से कपड़े पर रामायण, महाभारत, भगवान कृष्ण, देवी-देवताओं और पौराणिक कथाओं का सुंदर चित्रण किया जाता है. इस कला की बारीक हस्तकला और पारंपरिक शैली इसे दुनिया भर में प्रसिद्ध बनाती है. इसकी ऐतिहासिक विरासत को सम्मान देते हुए वर्ष 2008 में कलमकारी चित्रकला को GI टैग प्रदान किया गया.

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राजस्थान की फड़ चित्रकला एक पारंपरिक स्क्रॉल पेंटिंग है, जिसे लंबे कपड़े पर हाथ से बनाया जाता है. इसमें लोकदेवता पाबूजी, देवनारायण और अन्य वीर नायकों की जीवन गाथाओं को रंगीन चित्रों के माध्यम से दर्शाया जाता है. यह चित्रकला केवल कला नहीं, बल्कि लोककथाओं और इतिहास को जीवित रखने का माध्यम भी है. इसकी सुंदर रंग योजना और पारंपरिक शैली इसे विशेष बनाती है. इस अनूठी विरासत को संरक्षित करने के लिए वर्ष 2023 में फड़ चित्रकला को GI टैग प्रदान किया गया

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ओडिशा की पट्टचित्र भारत की सबसे प्राचीन और प्रसिद्ध पारंपरिक चित्रकलाओं में से एक है. यह कला कपड़े, ताड़पत्र या विशेष कैनवास पर प्राकृतिक रंगों से बनाई जाती है. इसमें भगवान जगन्नाथ, श्रीकृष्ण, भगवान विष्णु, रामायण, महाभारत और अन्य पौराणिक कथाओं का अत्यंत बारीकी से चित्रण किया जाता है. इसकी आकर्षक रंग योजना, सूक्ष्म कारीगरी और पारंपरिक शैली इसे विश्वभर में प्रसिद्ध बनाती है. इस ऐतिहासिक कला को संरक्षण और वैश्विक पहचान देने के लिए वर्ष 2008 में पट्टचित्र को GI टैग प्रदान किया गया.