गरीबी भी नहीं रोक सकी सपनों की उड़ान, मेहनत के दम पर दुनिया में चमके डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम

  • October 15, 2026 8:34 pm
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गरीबी में बीता बचपन, पढ़ाई के लिए बेचे अखबार और मेहनत के दम पर हासिल किया देश का सर्वोच्च पद. डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की जिंदगी संघर्ष, लगन और बड़े सपने देखने की प्रेरणा देती है. भारत के ‘मिसाइल मैन’ के नाम से मशहूर कलाम ने विज्ञान और रक्षा के क्षेत्र में देश को नई पहचान दिलाई. 15 अक्टूबर को उनकी जयंती पर जानिए एक साधारण परिवार में जन्मे उस महान वैज्ञानिक की कहानी, जो देश के 11वें राष्ट्रपति बने और करोड़ों युवाओं के लिए प्रेरणा बन गए.

गरीबी भी नहीं रोक सकी सपनों की उड़ान, मेहनत के दम पर दुनिया में चमके डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम
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डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का जन्म 15 अक्टूबर 1931 को तमिलनाडु के रामेश्वरम में एक साधारण मुस्लिम परिवार में हुआ था. उनके पिता जैनुलाब्दीन नाव चलाने का काम करते थे, जबकि उनकी मां आशियम्मा गृहिणी थीं. परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, लेकिन कलाम बचपन से ही पढ़ाई के प्रति समर्पित थे. सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने कभी अपने सपनों से समझौता नहीं किया. यही संघर्ष आगे चलकर उनकी सफलता की सबसे बड़ी ताकत बना.

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कलाम का बचपन आर्थिक चुनौतियों के बीच बीता. परिवार की मदद करने और अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए उन्होंने कम उम्र में अखबार बांटने का काम किया. इसके बावजूद उन्होंने शिक्षा को हमेशा प्राथमिकता दी, उन्होंने सेंट जोसेफ कॉलेज, तिरुचिरापल्ली से भौतिक विज्ञान की पढ़ाई की और बाद में मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग की शिक्षा हासिल की. उनकी मेहनत और सीखने की ललक ने उन्हें विज्ञान की दुनिया में आगे बढ़ने का रास्ता दिखाया.

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अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद डॉ. कलाम ने 1958 में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) में काम शुरू किया. शुरुआती दौर में उन्होंने रक्षा तकनीक से जुड़ी परियोजनाओं पर काम किया. वर्ष 1969 में वह भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) से जुड़े. यहां उन्होंने भारत के पहले स्वदेशी उपग्रह प्रक्षेपण यान SLV-III के विकास में अहम भूमिका निभाई. वर्ष 1980 में इसी प्रक्षेपण यान ने रोहिणी उपग्रह को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया और भारत ने अंतरिक्ष क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की.

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डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने भारत के मिसाइल कार्यक्रम को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया. उनके नेतृत्व में अग्नि और पृथ्वी जैसी मिसाइलों के विकास को गति मिली. इसी योगदान के कारण उन्हें ‘मिसाइल मैन ऑफ इंडिया’ कहा जाने लगा. वर्ष 1992 से 1999 के बीच उन्होंने रक्षा मंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार और रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के सचिव के रूप में भी काम किया. वर्ष 1998 के पोखरण-II परमाणु परीक्षणों में भी उन्होंने प्रमुख वैज्ञानिक भूमिका निभाई, जिससे भारत की रक्षा क्षमता को नई पहचान मिली.

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विज्ञान के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने के बाद डॉ. कलाम ने देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक का सफर तय किया. वर्ष 2002 में वह भारत के 11वें राष्ट्रपति बने और 2007 तक इस पद पर रहे. उनकी सादगी, सहज व्यवहार और युवाओं से जुड़ाव के कारण उन्हें ‘पीपुल्स प्रेसिडेंट’ कहा गया. राष्ट्रपति रहते हुए भी उन्होंने विद्यार्थियों से संवाद करना और उन्हें बड़े सपने देखने के लिए प्रेरित करना जारी रखा. उनका मानना था कि देश का भविष्य युवाओं की मेहनत, शिक्षा और वैज्ञानिक सोच से बनेगा.

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डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को विज्ञान और देश के विकास में उनके योगदान के लिए कई प्रतिष्ठित सम्मान मिले. वर्ष 1981 में उन्हें पद्म भूषण, 1990 में पद्म विभूषण और 1997 में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया. राष्ट्रपति पद छोड़ने के बाद भी उन्होंने शिक्षण और युवाओं को प्रेरित करने का काम जारी रखा. 27 जुलाई 2015 को शिलांग में एक व्याख्यान के दौरान उनका निधन हो गया. उनकी जिंदगी आज भी सिखाती है कि मेहनत, ज्ञान और दृढ़ संकल्प से बड़े सपने पूरे किए जा सकते हैं.