क्या आपको पता है? झारखंड में बसा है 108 मंदिरों वाला गांव, जानिए मलूटी की अनोखी कहानी

  • September 15, 2026 6:45 pm
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झारखंड के दुमका जिले में बसा मलूटी गांव अपनी अनोखी ऐतिहासिक और धार्मिक विरासत के लिए देशभर में अलग पहचान रखता है. कभी यह छोटा-सा गांव 108 प्राचीन मंदिरों से सजा हुआ था, जिनमें से आज करीब 72 मंदिर ही बचे हैं. सदियों पुराने इन मंदिरों की दीवारों पर बनी खूबसूरत टेराकोटा कलाकृतियां रामायण, देवी-देवताओं और तत्कालीन सामाजिक जीवन की कहानियां बयां करती हैं. मां मौलिक्षा मंदिर से लेकर प्राचीन शिव मंदिरों तक, मलूटी में कदम-कदम पर इतिहास और आस्था का संगम देखने को मिलता है. यही वजह है कि इसे झारखंड की महत्वपूर्ण सांस्कृतिक विरासत और एक अनोखे हेरिटेज टूरिज्म डेस्टिनेशन के रूप में देखा जाता है.

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झारखंड के दुमका जिले में बसा मलूटी ऐसा ऐतिहासिक गांव है, जिसे कभी 108 मंदिरों की नगरी के रूप में जाना जाता था. झारखंड पर्यटन के अनुसार, यहां मूल रूप से 108 मंदिर थे, जिनमें से अब करीब 72 मंदिर अस्तित्व में हैं. छोटे से गांव में इतने प्राचीन मंदिरों का एक साथ होना इसे देश के अनोखे विरासत स्थलों में शामिल करता है. मंदिरों की दीवारों पर बनी टेराकोटा कलाकृतियां रामायण, धार्मिक कथाओं और तत्कालीन जीवन की झलक दिखाती हैं. यही वजह है कि मलूटी को सिर्फ धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि इतिहास, कला और वास्तुकला के अनोखे संगम के रूप में देखा जाता है.

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मलूटी झारखंड के दुमका जिले के शिकारीपाड़ा क्षेत्र में, झारखंड और पश्चिम बंगाल की सीमा के करीब स्थित है. झारखंड पर्यटन के मुताबिक यह दुमका शहर से लगभग 55 किलोमीटर दूर है और चीला नदी के किनारे बसा है. यहां पहुंचने वालों को गांव के आसपास हरियाली, छोटे पहाड़ी क्षेत्र और ग्रामीण परिवेश के बीच प्राचीन मंदिर दिखाई देते हैं. नजदीकी प्रमुख रेलवे स्टेशन रामपुरहाट है, जो पश्चिम बंगाल में स्थित है. मलूटी को स्थानीय पर्यटन के साथ-साथ झारखंड की सांस्कृतिक विरासत को समझने के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है. सड़क मार्ग से दुमका और रामपुरहाट की ओर से यहां पहुंचा जा सकता है.

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मलूटी की सबसे बड़ी पहचान उसके प्राचीन मंदिरों का समूह है. ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार यहां कभी 108 मंदिरों का विशाल समूह था. समय के साथ प्राकृतिक क्षरण, देखरेख की कमी और संरचनात्मक नुकसान के कारण कई मंदिर नष्ट हो गए. आज करीब 72 मंदिर बचे हैं. एक हालिया अकादमिक अध्ययन भी मलूटी के 72 मौजूदा टेराकोटा मंदिरों को 17वीं-18वीं शताब्दी से जोड़ता है और बताता है कि मूल संख्या 108 थी. इसलिए मलूटी की कहानी केवल मंदिरों की संख्या की नहीं, बल्कि सदियों पुरानी विरासत को बचाने की भी कहानी है.

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मलूटी के मंदिरों की कहानी बाज बसंत राजवंश से जुड़ी बताई जाती है. प्रचलित कथा के अनुसार, बसंत राय ने बंगाल के सुल्तान अलाउद्दीन हुसैन शाह के बाज को खोजकर वापस किया था. इसके बाद उन्हें इस क्षेत्र का अधिकार मिला और वे राजा बाज बसंत के नाम से प्रसिद्ध हुए. कहा जाता है कि धार्मिक प्रवृत्ति के कारण राजपरिवार ने भव्य महलों की जगह मंदिरों का निर्माण कराया. बाद में राजपरिवार की शाखाएं अलग हुईं और अलग-अलग समूहों ने मंदिर बनवाए. इसी वजह से छोटे से क्षेत्र में मंदिरों की बड़ी संख्या विकसित हुई और मलूटी धीरे-धीरे मंदिरों के गांव के रूप में प्रसिद्ध हो गया.

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मलूटी के मंदिरों की सबसे खूबसूरत विशेषताओं में से एक है उनकी टेराकोटा कला मंदिरों की बाहरी दीवारों और सजावटी हिस्सों पर मिट्टी से बनी बारीक आकृतियां दिखाई देती हैं. इनमें धार्मिक कथाओं, देवी-देवताओं, रामायण के प्रसंगों और तत्कालीन सामाजिक जीवन की झलक मिलती है. मंदिरों की वास्तुकला पर बंगाल क्षेत्र की शैली का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है. झारखंड पर्यटन के अनुसार, मलूटी के मंदिरों के निर्माण में बिष्णुपुर के कारीगरों की भूमिका रही थी. यही वजह है कि यहां की वास्तुकला झारखंड और बंगाल की सांस्कृतिक परंपराओं के मेल की कहानी कहती है.

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मलूटी की धार्मिक पहचान में मां मौलिक्षा मंदिर का विशेष स्थान है. इसे बाज बसंत राजपरिवार की कुलदेवी और मलूटी की प्रमुख देवी माना जाता है. मंदिर में देवी की पत्थर से बनी प्रतिमा का स्वरूप बेहद अनोखा है. झारखंड सरकार के विवरण के अनुसार, मौलिक्षा नाम को ‘मौली’ यानी सिर और ‘ईक्षा’ यानी दृष्टि से जोड़ा जाता है. देवी को सिंहवाहिनी दुर्गा के रूप में भी पूजा जाता है. मौलिक्षा मंदिर से जुड़ी कई स्थानीय मान्यताएं और कथाएं आज भी लोगों को आकर्षित करती हैं. मलूटी आने वाले पर्यटक प्राचीन मंदिरों के साथ इस मंदिर में दर्शन करना भी महत्वपूर्ण मानते हैं.

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मलूटी के मंदिरों को करीब से देखने पर उनकी दीवारें किसी पुराने कहानी-पन्ने जैसी नजर आती हैं. टेराकोटा पैनलों में देवी-देवताओं के साथ धार्मिक कथाओं और पुराने समय के सामाजिक जीवन से जुड़े दृश्य उकेरे गए हैं. कुछ मंदिरों की बाहरी दीवारों पर रामायण से जुड़े प्रसंग भी दिखाई देते हैं. इन कलाकृतियों की खासियत यह है कि वे उस दौर की कला, धार्मिक विश्वास और रोजमर्रा की जिंदगी के बारे में जानकारी देती हैं. यही कारण है कि मलूटी धार्मिक पर्यटन के साथ इतिहास और कला प्रेमियों के लिए भी खास जगह है. यहां घूमते हुए हर मंदिर अपनी अलग स्थापत्य शैली और कहानी से परिचित कराता है.

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मलूटी को आज केवल मंदिरों के गांव के रूप में नहीं, बल्कि विरासत संरक्षण की चुनौती के रूप में भी देखा जाता है. सदियों पुराने मंदिर मौसम, समय और क्षरण से प्रभावित हुए हैं. झारखंड सरकार के अनुसार, 2009 से Save Heritage and Environment तथा Global Heritage Fund जैसी संस्थाओं ने संरक्षण प्रयासों में भूमिका निभाई. एक अध्ययन में भी मंदिरों के सामने मौसम और क्षरण से जुड़ी चुनौतियों का उल्लेख किया गया है. आज यहां आने वाले पर्यटक प्राचीन वास्तुकला को करीब से देख सकते हैं, लेकिन इस विरासत की संवेदनशीलता को समझना भी जरूरी है. मंदिरों की दीवारों और कलाकृतियों को नुकसान पहुंचाए बिना इन्हें देखना जिम्मेदार पर्यटन का हिस्सा है.

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आज मलूटी में पर्यटक प्राचीन मंदिर समूह, टेराकोटा शिल्प, मां मौलिक्षा मंदिर और आसपास का ग्रामीण प्राकृतिक परिवेश देख सकते है. स्थानीय मानचित्र सेवाओं में मौलिक्षा मंदिर, मलूटी शिव मंदिर और मंदिर गांव जैसे प्रमुख स्थल दर्ज हैं. मौलिक्षा मन्दिर और मलूटी शिव मंदिर जैसे स्थान मलूटी की धार्मिक और ऐतिहासिक पहचान को समझने में मदद करते हैं. वर्तमान पर्यटन में यहां किसी बड़े शहरी पर्यटन केंद्र जैसी सुविधाओं की अपेक्षा करने के बजाय इसे शांत heritage village experience के रूप में देखना बेहतर है. मंदिरों को पैदल घूमकर देखने में गांव की वास्तुकला और स्थानीय माहौल को करीब से महसूस किया जा सकता है.

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मलूटी घूमने का सबसे अच्छा तरीका है कि इसे सिर्फ मंदिर-दर्शन नहीं, बल्कि heritage walk की तरह देखा जाए. मंदिरों की तस्वीरें लेते समय संरचनाओं और मूर्तियों को छूने या नुकसान पहुंचाने से बचें. गांव में ग्रामीण परिवेश होने के कारण स्थानीय लोगों और धार्मिक परंपराओं का सम्मान करना जरूरी है. दुमका से सड़क मार्ग और रामपुरहाट से कनेक्टिविटी के कारण यहां पहुंचना संभव है. झारखंड पर्यटन इसे दुमका से लगभग 55 किलोमीटर दूर बताता है. अक्टूबर से मार्च के बीच मौसम आमतौर पर पर्यटन के लिए अधिक आरामदायक माना जाता है, हालांकि यात्रा से पहले स्थानीय मौसम और रास्ते की स्थिति जांच लेना बेहतर है. मलूटी की असली खूबसूरती उसकी शांति, इतिहास और सदियों पुरानी कला में है.