बिहार की लोकगायिका मोहिनी देवी: जिनकी आवाज़ ने लोकसंगीत को दी नई पहचान

  • August 5, 2026 6:38 pm
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बिहार की लोकसंगीत परंपरा सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत का जीवंत स्वरूप है. इस विरासत को अपनी मधुर आवाज़ और समर्पण से नई पहचान देने वाली महान लोकगायिकाओं में मोहिनी देवी का नाम विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है. आरा की धरती से शुरू हुआ उनका संगीत सफर पटना आकाशवाणी, देश के प्रतिष्ठित मंचों और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुँचा. उन्होंने केवल लोकगीत नहीं गाए, बल्कि बिहार की संस्कृति, परंपरा और लोकधुनों को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का जीवनभर प्रयास किया. आइए जानते हैं बिहार की इस अनमोल लोकगायिका की प्रेरणादायक कहानी.

बिहार की लोकगायिका मोहिनी देवी: जिनकी आवाज़ ने लोकसंगीत को दी नई पहचान
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1 अक्टूबर 1935 को बिहार के आरा में जन्मीं मोहिनी देवी ने ऐसे समय में संगीत की दुनिया में कदम रखा, जब आरा शास्त्रीय और लोक संगीत का प्रमुख केंद्र माना जाता था. बचपन से ही संगीत उनके जीवन का हिस्सा बन गया. अपनी मेहनत, समर्पण और मधुर आवाज़ के दम पर उन्होंने बिहार के लोकसंगीत को नई पहचान दिलाई. उनका पूरा जीवन लोक संस्कृति के संरक्षण और प्रसार के लिए समर्पित रहा. आज भी उन्हें बिहार की महान लोकगायिकाओं में सम्मान के साथ याद किया जाता है.

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मोहिनी देवी ने संगीत की पहली शिक्षा अपने पिता श्री शिवधर जी से प्राप्त की. इसके बाद उन्होंने आरा के प्रसिद्ध पखावज वादक श्री शत्रुंजय प्रसाद (ललन जी) से शास्त्रीय और लोक संगीत की गहन तालीम ली. कठोर अभ्यास और गुरुजनों के मार्गदर्शन ने उनकी गायकी को नई ऊँचाई दी. यही मजबूत नींव आगे चलकर उनकी पहचान बनी और उन्होंने लोकसंगीत को अपना जीवन समर्पित कर दिया.

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1950 के दशक में मोहिनी देवी ने पटना आकाशवाणी से अपने गायन की शुरुआत की. उनकी मधुर आवाज़ और लोकधुनों की अनूठी प्रस्तुति ने उन्हें बिहार ही नहीं, पूरे देश में लोकप्रिय बना दिया. उनके गीत घर-घर तक पहुँचे और लाखों श्रोताओं के दिलों में बस गए. आज भी उनकी रिकॉर्डिंग आकाशवाणी के अभिलेखों में सुरक्षित हैं और समय-समय पर प्रसारित की जाती हैं.

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मोहिनी देवी ने बेतिया, मुज़फ्फरपुर, सोनपुर मेला, कोलकाता और वाराणसी जैसे प्रतिष्ठित मंचों पर अपनी प्रस्तुतियों से लोगों का दिल जीता. जहाँ भी उन्होंने गीत गाए, वहाँ बिहार की लोकसंस्कृति की अलग पहचान बनी. उनकी आवाज़ ने यह साबित किया कि लोकसंगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और परंपरा की जीवंत पहचान है.

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साल 1987 में मोहिनी देवी ने मॉरीशस में बिहार का प्रतिनिधित्व किया. अपने लोकगीतों के माध्यम से उन्होंने वहाँ बसे प्रवासी भारतीयों को अपनी मातृभूमि और संस्कृति से भावनात्मक रूप से जोड़ दिया. उनकी प्रस्तुति ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर बिहार की सांस्कृतिक विरासत का गौरव बढ़ाया. यह उनके जीवन की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक मानी जाती है.

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मोहिनी देवी ने झूमर, सोहर, कजरी, चैता, विवाह गीत और देवी गीत जैसी अनेक लोक विधाओं को अपनी आवाज़ से लोकप्रिय बनाया. उन्होंने पारंपरिक भोजपुरी और बिहारी लोकगीतों को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का महत्वपूर्ण कार्य किया. उनकी गायकी में बिहार की मिट्टी की खुशबू, लोकजीवन की सरलता और संस्कृति की आत्मा साफ दिखाई देती थी.

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मोहिनी देवी ने पद्मश्री विंध्यवासिनी देवी, पद्म विभूषण शारदा सिन्हा, पद्म विभूषण गिरिजा देवी, पद्मश्री शांति जैन, पद्मश्री भरत सिंह भारती, पद्म विभूषण उस्ताद अल्ला रखा ख़ाँ और पद्मश्री पंडित गुड़ई महाराज जैसे दिग्गज कलाकारों के साथ मंच साझा किया. यह उपलब्धि उनके कला जीवन की बड़ी पहचान बनी और उनके प्रतिभाशाली व्यक्तित्व को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान दिलाया.

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लोकसंगीत के संरक्षण और संवर्धन में उनके योगदान के लिए मोहिनी देवी को नटराज कला सम्मान 2010 से सम्मानित किया गया. उन्होंने केवल मंचों पर प्रस्तुति नहीं दी, बल्कि स्कूलों में बच्चों को लोकगीत, लोक परंपराएँ और सांस्कृतिक विरासत का प्रशिक्षण भी दिया. उनकी आवाज़ आज भी आकाशवाणी के अभिलेखों में सुरक्षित है. उन्होंने केवल गीत नहीं गाए, बल्कि बिहार की संस्कृति और लोकपरंपरा को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने का अमूल्य कार्य किया.