NEET विवाद से मंत्री के इस्तीफे तक, CJP आंदोलन की पूरी कहानी

  • July 25, 2026 6:22 pm
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एक परीक्षा से शुरू हुआ असंतोष धीरे-धीरे युवाओं के बड़े आंदोलन में बदल गया. NEET में पेपर लीक और अनियमितताओं के आरोपों ने छात्रों के भरोसे को झकझोर दिया. सोशल मीडिया पर उठी आवाज CJP (Cockroach Janta Party) के जरिए सड़कों तक पहुंची. अभिजीत दिपके के नेतृत्व में Gen-Z ने मीम, वीडियो और प्रदर्शन के जरिए जवाबदेही की मांग उठाई. जंतर-मंतर धरने, ‘चलो संसद’ मार्च और सोनम वांगचुक के सत्याग्रह ने आंदोलन को राष्ट्रीय चर्चा का विषय बना दिया. 25 जुलाई को धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद आंदोलन ने एक बड़ी राजनीतिक जीत दर्ज की, हालांकि कई मांगें अभी बाकी हैं.

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कहानी शुरू हुई NEET परीक्षा में पेपर लीक और अनियमितताओं के आरोपों से. जिन छात्रों ने वर्षों तक कोचिंग ली, परिवार से दूर रहकर पढ़ाई की और मेडिकल कॉलेज में दाखिले का सपना देखा, उन्हें लगा कि उनकी मेहनत किसी लीक हुए प्रश्नपत्र के सामने हार गई. मामला केवल कुछ गलत सवालों या परिणामों का नहीं था, छात्रों के लिए यह परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता का संकट था इसी नाराज़गी के बीच सोशल मीडिया पर वीडियो, मीम, पोस्ट और छोटे-छोटे विरोध सामने आने लगे. युवा पूछ रहे थे—यदि देश की सबसे महत्वपूर्ण प्रवेश परीक्षाएँ भी सुरक्षित नहीं हैं, तो मेहनत और योग्यता का मूल्य क्या रह जाता है? CJP ने इसी गुस्से को सरल और व्यंग्यात्मक भाषा में प्रस्तुत किया. “Cockroach” नाम भी व्यवस्था के सामने आम नागरिक की उपेक्षित स्थिति पर व्यंग्य था. धीरे-धीरे एक ऑनलाइन अभियान वास्तविक सड़कों के आंदोलन में बदलने लगा.

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इस आंदोलन को पहचान देने वाले प्रमुख चेहरों में अभिजीत दिपके शामिल थे, जिन्हें CJP का संस्थापक बताया गया. CJP पारंपरिक राजनीतिक दल की तरह शुरू नहीं हुआ था. इसकी ताकत थी—Gen-Z की भाषा, तेज़ वीडियो, व्यंग्य, मीम और सीधे सवाल. युवा लंबी राजनीतिक भाषणबाज़ी के बजाय पूछ रहे थे—पेपर कैसे लीक हुआ, जिम्मेदार कौन है और जवाबदेही कब तय होगी? अभिजीत और उनके साथियों ने मांगों को कुछ स्पष्ट बिंदुओं में बदल दिया: परीक्षा लीक की निष्पक्ष जांच, छात्रों के साथ न्याय, जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई और तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की राजनीतिक जवाबदेही. आंदोलन ने यह भी कहा कि केवल दोबारा परीक्षा करा देना पर्याप्त नहीं है, भविष्य में पेपर लीक रोकने के लिए परीक्षा प्रणाली में संरचनात्मक सुधार आवश्यक हैं. सोशल मीडिया ने उन्हें कुछ ही समय में राष्ट्रीय पहचान दी। जो अभियान फोन की स्क्रीन पर शुरू हुआ था, उसने युवाओं को दिल्ली के जंतर-मंतर तक पहुंचाना शुरू कर दिया.

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दिल्ली का जंतर-मंतर वर्षों से जन आंदोलनों का प्रमुख स्थल रहा है. CJP और NEET से जुड़े प्रदर्शनकारियों ने भी इसे अपना केंद्रीय विरोध स्थल बनाया. यहां छात्र तिरंगा, पोस्टर और “We Want Justice” जैसे नारे लेकर पहुंचे. कुछ युवा अकेले आए थे, जबकि कई अपने दोस्तों, छात्र समूहों और परिवारों के साथ पहुंचे.धरने को लंबे समय तक चलाने के लिए प्रदर्शनकारियों ने अपनी छोटी-सी व्यवस्था बनाई. लोग पानी, भोजन, दवाइयाँ, चादरें और फोन चार्ज करने की व्यवस्था लेकर आए. कुछ छात्र बारिश और उमस के बीच रात में भी वहीं रुके. एक छात्र ने पत्रकारों को बताया कि वह तकिया, चादर और टूथब्रश तक लेकर आया है और मांग पूरी होने तक वहीं रहने के लिए तैयार है. यहीं आंदोलन ने ऑनलाइन गुस्से से आगे बढ़कर मानवीय रूप लिया. मंच से भाषण हुए, छात्र अपनी कहानियां सुनाने लगे और जंतर-मंतर राष्ट्रीय असंतोष का प्रतीक बन गया.

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जब शिक्षाविद, पर्यावरण कार्यकर्ता और लद्दाख के सामाजिक आंदोलनकारी सोनम वांगचुक युवाओं के समर्थन में सामने आए, तो आंदोलन को एक नया नैतिक चेहरा मिला. वांगचुक पहले से शिक्षा सुधार, पर्यावरण और लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़े अभियानों के लिए जाने जाते थे. उन्होंने CJP के मुद्दे को केवल एक परीक्षा विवाद नहीं, बल्कि युवाओं के भरोसे और लोकतांत्रिक जवाबदेही का प्रश्न बताया. 28 जून को उन्होंने आंदोलन के समर्थन में भूख हड़ताल शुरू की. उनका संदेश था कि विरोध शांतिपूर्ण रहना चाहिए, लेकिन सरकार को युवाओं की पीड़ा को अनदेखा नहीं करना चाहिए. जैसे-जैसे उपवास लंबा चला, उनके स्वास्थ्य को लेकर चिंता बढ़ने लगी. फिर भी उन्होंने जवाबदेही और परीक्षा सुधार की मांग को दोहराया. सोनम वांगचुक की उपस्थिति से आंदोलन को अलग-अलग आयु वर्गों का समर्थन मिला. CJP जहां Gen-Z की डिजिटल और व्यंग्यात्मक आवाज थी, वहीं वांगचुक सत्याग्रह तथा अहिंसक विरोध का प्रतीक बनकर उभरे.

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संसद का मानसून सत्र शुरू होने पर CJP ने जंतर-मंतर से संसद की ओर “चलो संसद” मार्च का आह्वान किया. उद्देश्य था कि पेपर लीक और छात्रों की मांगें सीधे देश की संसद तक पहुंचें. लेकिन पुलिस ने सुरक्षा और निषेधाज्ञा का हवाला देते हुए संसद मार्च की अनुमति नहीं दी. केंद्रीय दिल्ली में अतिरिक्त पुलिस, बैरिकेड और रैपिड एक्शन फोर्स तैनात की गई. इसके बावजूद हजारों युवा जंतर-मंतर और आसपास के क्षेत्रों में पहुंचे. भीड़ ने संसद की ओर बढ़ने का प्रयास किया तो पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच धक्का-मुक्की शुरू हो गई. कुछ समूह बैरिकेड के आसपास फंस गए, जबकि कई युवा छोटी गलियों और अलग-अलग रास्तों से आगे बढ़ने लगे. प्रदर्शन एक स्थान पर नियंत्रित रहने के बजाय केंद्रीय दिल्ली के अलग-अलग हिस्सों में फैल गया. जंतर-मंतर से संसद तक कुछ किलोमीटर की दूरी उस दिन छात्रों और प्रशासन के बीच टकराव की सबसे बड़ी रेखा बन गई.

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मार्च के दौरान स्थिति अचानक बिगड़ गई. पुलिस ने भीड़ को पीछे हटाने के लिए लाठियों और आंसू गैस का प्रयोग किया. रिपोर्टों के अनुसार केरला हाउस लेन, पटेल चौक और जंतर-मंतर के आसपास धक्का-मुक्की तथा लाठीचार्ज हुआ. कई प्रदर्शनकारी घायल हुए और भीड़ अलग-अलग समूहों में बिखर गई. यहां दोनों पक्षों के दावे अलग थे. CJP ने पुलिस पर शांतिपूर्ण छात्रों के खिलाफ “क्रूर लाठीचार्ज” और पथराव करने का आरोप लगाया. दिल्ली पुलिस का कहना था कि भीड़ के एक हिस्से ने बैरिकेड तोड़ने की कोशिश की और पुलिसकर्मियों पर पत्थर फेंके, इसलिए व्यवस्था बनाए रखने के लिए बल प्रयोग किया गया. इन दावों की व्याख्या अलग-अलग वीडियो और समाचार रिपोर्टों में भिन्न रही. लाठीचार्ज रोकने के बजाय आंदोलन को और भावनात्मक बना गया. पोस्टरों पर लिखा गया—“वे न्याय लेने आए थे, उन्हें आंसू गैस और लाठियां मिलीं.”

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लगातार उपवास के कारण सोनम वांगचुक का स्वास्थ्य गिरने लगा. पुलिस उन्हें जंतर-मंतर के धरना स्थल से लेकर सरकारी अस्पताल पहुंची. प्रशासन ने कहा कि उनकी हालत को देखते हुए चिकित्सा सहायता आवश्यक थी. लेकिन उनकी पत्नी और आंदोलन समर्थकों ने आरोप लगाया कि अस्पताल में रखा जाना उपचार से अधिक हिरासत जैसा था.इसके बाद मामला दिल्ली हाई कोर्ट पहुंचा. वांगचुक के परिवार ने उन्हें उनकी पसंद के निजी अस्पताल में स्थानांतरित करने की अनुमति मांगी. अदालत ने उनकी स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं को गंभीर माना और उन्हें सरकारी अस्पताल से गुरुग्राम के निजी अस्पताल में ले जाने की अनुमति दी. इस घटना का आंदोलन पर बड़ा प्रभाव पड़ा. एक तरफ युवाओं में गुस्सा बढ़ा, दूसरी तरफ वांगचुक ने अस्पताल से भी शांतिपूर्ण बने रहने की अपील की. उन्होंने संकेत दिया कि छात्रों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई न करने और बातचीत का ठोस भरोसा मिलने पर वह उपवास समाप्त करने पर विचार कर सकते हैं.

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लाठीचार्ज के बाद मुद्दा केवल जंतर-मंतर तक सीमित नहीं रहा. दिल्ली के अतिरिक्त दूसरे शहरों और राज्यों में भी युवा विरोध के समर्थन में सामने आए. विपक्षी दलों ने संसद में मुद्दा उठाया और कुछ प्रमुख नेता प्रदर्शन में शामिल हुए या हिरासत में लिए गए. आंदोलन ने पेपर लीक के साथ बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार और संस्थाओं में घटते भरोसे जैसे बड़े सवाल भी उठाने शुरू कर दिए. सरकार और CJP प्रतिनिधियों के बीच बातचीत हुई. आंदोलन की मांग थी कि शिक्षा मंत्री की जवाबदेही तय हो, प्रदर्शनकारियों के खिलाफ मुकदमे वापस लिए जाएं और पेपर लीक से प्रभावित छात्रों तथा मृत छात्रों के परिवारों के लिए सहायता दी जाए. सरकार ने समाधान के लिए समय मांगा. 26 दिन के उपवास के बाद सोनम वांगचुक ने बातचीत में मिले आश्वासनों और देश में बढ़ती हिंसा की आशंका को देखते हुए अपना उपवास समाप्त किया. उन्होंने स्पष्ट किया कि उपवास समाप्त करना संघर्ष समाप्त करना नहीं है; आगे की लड़ाई शांतिपूर्ण और संस्थागत तरीके से जारी रहनी चाहिए.

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CJP आंदोलन की सबसे बड़ी सफलता यह थी कि उसने परीक्षा लीक के मुद्दे को कुछ छात्रों की शिकायत से निकालकर राष्ट्रीय जवाबदेही का प्रश्न बना दिया. सोशल मीडिया की रील, मीम और व्यंग्य ने युवाओं को जोड़ा; जंतर-मंतर के धरने ने आंदोलन को भौतिक स्थान दिया; सोनम वांगचुक के उपवास ने नैतिक दबाव बनाया; और “चलो संसद” मार्च ने इसे राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में पहुंचा दिया . 25 जुलाई को धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को आंदोलन की बड़ी राजनीतिक जीत के रूप में देखा गया. प्रदर्शनकारियों ने जंतर-मंतर पर इसका स्वागत किया, लेकिन अभिजीत दिपके ने कहा कि बाकी मांगें—छात्रों पर दर्ज मामलों और पीड़ित परिवारों से जुड़ी मांगों सहित—अब भी पूरी होनी बाकी हैं. आंदोलन की कहानी यह बताती है कि सफलता केवल भीड़ से नहीं मिली. स्पष्ट मांगें, लगातार प्रदर्शन, डिजिटल प्रचार, भोजन और मेडिकल सहायता जैसी सामुदायिक व्यवस्था, कानूनी हस्तक्षेप और शांतिपूर्ण दबाव—इन सभी ने मिलकर सरकार को प्रतिक्रिया देने के लिए मजबूर किया