जेल में हेमंत सोरेन की पहली रात, रोटी दूध खाकर लंबे समय के बाद पूरी नींद में सोए पूर्व मुख्यमंत्री

    जेल में हेमंत सोरेन की पहली रात,  रोटी दूध खाकर लंबे समय के बाद पूरी नींद में सोए पूर्व मुख्यमंत्री

    Ranchi-कल जैसे ही पूर्व सीएम हेमंत को ज्यूडिशियल कस्टडी में बिरसा मुंडा केन्द्रीय कारा भेजने का आदेश जारी हुआ, चाहने वालों के बीच खुशी की लहर दौड़ती दिखी. समर्थकों ने राहत की सांस ली, इस बात का इत्मिनान होता नजर आया कि कम से कम अब उन्हे ईडी के उन उलझे और अनबूझे सवालों का सामना तो नहीं करना पड़ेगा, उसकी मर्जी के अनुरुप सोना और उठना तो नहीं पड़ेगा. जिस तहखाने में कभी सूरज की रोशनी नहीं आती, ताजी हवा के झोंके नहीं आते, दूर आसमान में टिमटिमाता तारा नजर नहीं आता और आता है तो कहीं दूर से सिर्फ एक कर्कस आवाज की प्रतिध्वनी. एक ऐसी प्रति छाया जिससे मन के किसी कोने में एक अपशकुन का ख्याल आता है, जिसकी हर परछायी में एक विचित्र, लेकिन अनचाहा चेहरा नजर आता है.

    राजधानी की सड़कों पर अपने ही पोस्टर को निहारते नजर आये हेमंत

    लेकिन यह हर्ष सिर्फ समर्थकों के चेहरों पर ही नहीं थी, बिरसा मुंडा केन्द्रीय कारा की ओर प्रस्थान करते समय इसकी एक झलक सीएम हेमंत के चेहरे पर भी देखने को मिल रही थी. हर संकट में चेहरे पर खिला रहने वाला मुस्कान आज भी बदस्तूर कायम था, इसके साथ ही एक राहत  की सांस भी दिख रही थी. मानों वह कहने की कोशिश कर रहे हों कि भाई, बहुत हुई यह पूछताछ, बदलते चेहरों के बीच एक ही सवाल, मानो यह सवाल नहीं होकर एक संदेशा हो कि यदि मुक्ति पानी है, तो एक ही रास्ता है, बह रास्ता है, सवाल भी हमारा होगा और जवाब भी हमारा, लेकिन उस जवाब पर मुहर तुम्हारी होगी. कुछ कागज के टुकड़े होंगे और उन टुकडों पर एक खूबसूरत मजमून होगा और उस मजमून के नीचे एक हस्ताक्षर तुम्हारा होगा. बस इतना ही तो करना है. लेकिन यही तो मुश्किल थी, और इसी मुश्किल से निकलने का रास्ता था बिरसा मुंडा कारागार. जिस ओर आज वह बढ़ते हुए दिख रहे थें, और इसके साथ ही रांची की सड़कों पर अपनी उस पोस्टर को भी निहार रहे थें, जिसमें बड़े उत्साह और ओज के साथ लिखा गया था कि ‘झारखंड झुकेगा नहीं,’ जैसी ही उनकी नजर इस पोस्टर से टकरायी, अनायास आंखों में एक चमक सी पैदा होती दिखी।

    महाभारत सीरियल में दिखलाया गया एक दृश्य आंखों से गुजरने लगा

    मानों वह कहने की कोशिश कर रहे हों कि इन 13 दिनों में जिंदगी कितनी बदल गई, खिड़की से बाहर नजरे जमाये, यह चिंतन भी जारी था कि यह राजनीति भी गजब की चीज है भाई. यहां तो एक ही जुर्म की सजा अलग-अलग होती है, और इसके साथ ही विधान सभा में दिये गये अपने ही भाषण की चंद पंक्तियों को याद कर, उन पंक्तियों में ही इस सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश करते नजर आने लगे. मानो कोई पीछे से कान में यह कहने की कोशिश कर रहा हो, एक ही जुर्म की अलग-अलग सजा कोई नई बात तो नहीं है. यही तो दस्तूर है. इतिहास में यही तो होता रहा है. क्या सारा चारा लालू ने ही खाया था, उनकी पूर्ववर्ती सराकारों में सब रामराज्य था? लेकिन इसी रामराज्य से महाभारत सीरियल में दिखलाया गया एक दृश्य भी आंखों से गुजरने लगा. जब एक ही जुर्म की सजा अलग-अलग वर्णों के लिए अलग-अलग निर्धारित किया गया था, इस सोच से बाहर निकल भी नहीं पाए थे कि सामने बिरसा मुंडा केन्द्रीय कारागृह का विशाल दरवाजा नजर आया. लेकिनअपने इस नये आशियाने को देखकर चेहरे पर कोई खुशी नहीं दिखी.

    बिरसा ने हेमंत के कानों में क्या कहा

    वह तो बिरसा के संघर्षों की दुनिया में खोते चले गयें. मानों बिरसा खुद भी सामने आकर कंधे को थपथपाते हुए कह रहें हो कि बस इतनी सी पीड़ा और परेशान हो गया. इसी कालकोठरी में तो हमे जहर मिला था. और तुम, तुम्हारे पास तो यहां परेशान होने की कोई वजह भी नहीं है. सब कुछ तुम्हारा ही तो है और तुम इतने भोले भी मत बनो, जिस दुनिया में तुम रहते हो, वहां सिर्फ एक ही जुर्म की अलग-अलग सजा नहीं देती, एक ही दिलेरी के अलग-अलग बख्शीश भी देता है, नहीं तो लड़ाईयां तो हमने भी अंग्रेजों के खिलाफ ही लड़ी थी, लेकिन जरा देखो तो उस इतिहास में हम कहां खड़े है? कहां खड़ा है तुम्हारा तिलका मांझी? सवाल इसका नहीं है कि एक ही जुर्म की अलग-अलग सजा क्यों है? सवाल तो यह है कि यह सब कुछ तुम्हें अब क्यों दिखलाई दे रहा है? इसकी समझ तो तुम्हे बहुत पहले हो जानी चाहिए थी? लेकिन तब कहां खोये थे तुम, चलो, कोई बात नहीं,  जब जागे तब सवेरा.

    कैदियों के चेहरे पर अजीब सी मुस्कुराहट

    इस बीच वह कब अपने बैरक में पहुंच गये, इसका पत्ता भी नहीं लगा. हां कई कैदियों के चेहरे पर एक मुस्कुराहट जरुर देखी गयी. मानों कहने की कोशिश कर रहे हों कि भईया, यही तो इस लोकतंत्र की खूबसूरती है, राजा हो या रंक, यह काल सब पर मंडराता है, और ऐसा भी नहीं है कि तुम इस कतार में आखिरी हो? जिस दिन समय का पासा पलटेगा, यहां कोई और खड़ा नजर आयेगा. इस बीच रात काफी गुजर चुकी थी, मन पसंद दूध-रोटी सामने रखी थी. उन्होंने खाना शुरु किया. लेकिन इस बीच नींद कब आ गयी, पता ही नहीं लगा, सुबह सुबह जब कहीं दूर से सूरज की एक किरण बैरक में बिखरती नजर आयी, तब जाकर नींद टूटी.

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