कभी झारखंड में बजता था असुरों का डंका! खूंटी जिले के कारो और बनई नदी के संगम पर मिला प्राचीनतम अवशेष, सामने आ सकती है नई जानकारियां

    कभी झारखंड में बजता था असुरों का डंका! खूंटी जिले के कारो और बनई नदी के संगम पर मिला प्राचीनतम अवशेष, सामने आ सकती है नई जानकारियां

    Ranchi-राजधानी रांची से करीबन 60 किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित तोरपा प्रखंड के सिरही टोला में कारो और बनई नदी के तट पर विलुप्त प्राय: असुर जनजाति के द्वारा निर्मित एक प्राचीनतम पूजा स्थल मिला है. करीबन दो वर्ग फीट में फैले इस स्थल पर पत्थरों पर नक्काशी और ग्रेनाईट के स्तंभ मिले है.स्थायीय मान्यताओं के अनुसार यह असुर जनजाति का पूजा स्थल है. जहां हर वर्ष बरसात के पहले आज भी वहां के स्थानीय निवासियों के द्वारा पूजा-पाठ कर अच्छी बारिश की कामना की जाती है, मान्यता है कि यदि जिस वर्ष पूजा नहीं की जाती है तो उस वर्ष किसानों को अकाल का सामना करना पड़ता है, साथ ही दूसरी कई आपदा आ खड़ी होती है.

    एक ही दिन में किला बनाने का संकल्प

    दावा किया जाता है कि किसी जमाने में जब असुर झारखंड में अपने लिए किसी सुरक्षित स्थान की खोज में भटक रहे थें, तब उनकी नजर कारो और बनई नदी के संगम पर स्थित इस स्थल पर पड़ी. असुरों ने इस स्थल को अपने निवास के बेहतर माना, लेकिन अपना निवास बनाने के पहले उनके लिए अपने देवताओं का निवास बनाना जरुरी था, जिसके बाद असुरों ने यह संकल्प लिया था कि वह महज एक दिन में ही इस स्थल पर एक विशाल मंदिर की स्थापना कर देंगे, और यही वह इस संकल्प को पूरा नहीं कर पाते हैं, तो वह कभी यहां वापस नहीं लौटेंगे. लेकिन असुर जनजाति अपना वह संकल्प पूरा नहीं कर सकें, और अंत: इस स्थल को छोड़ किसी दूसरे सुरक्षित स्थल की खोज में निकल गयें. लेकिन वह एक दिन में कई मूर्तियां और प्रवेश द्वार स्तंभ को निर्मित कर दिया गया. कल्याण विभाग का दावा है कि इन नक्काशियों से इस बात के साक्ष्य मिल रहे हैं कि किसी जमाने में असुर काफी संपन्न और निर्माण कला में सिद्घहस्त थें, और इस प्रकार की नक्काशी और मूर्तियों का निर्माण उनके लिए आम था.

    करीबन छह सौ ईशा पूर्व झारखंड में हुआ था असुरों का आगवन

    ध्यान रहे कि झारखंड के साथ ही असुरों की एक बड़ आबादी पश्चिम बंगाल और ओडिशा में निवास करती है, झारखंड में ये गुमला, पलामू और लातेहार जिले में पाये जाते हैं. असुर जनजाति के तीन उपवर्ग हैं- बीर असुर, विरजिया असुर एवं अगरिया असुर. बीर उपजाति के विभिन्न नाम हैं, जैसे सोल्का, युथरा, कोल, इत्यादि. हालांकि बिरजिया एक अलग आदिम जनजाति के रूप में अधिसूचित है. अब तक दावा किया जाता है कि झारखंड में असुरों का आगवन करीबन 600 ईशा पूर्व हुआ था. मुण्डा जनजाति की लोकगाथा ‘सोसोबोंगा’ में भी असुरों का उल्लेख मिलता है. इन्हे प्रोटो-आस्ट्रेलाइड समूह के रखा जाता है. इतिहासकार बनर्जी  और शास्त्री ने असुरों की वीरता का उल्लेख करते  हुए दावा किया है कि वह पूर्व वैदिक काल सबसे शक्तिशाली समुदाय थें, उनका अपना राज हुआ करता था, जहां लोककल्याण की मजबूत गतिविधियां चलायी जाती थी, लेकिन बाद में आर्यों के आगवन के बाद इन्हे पराजित होना पड़ा और उनकी सामाजिक स्थिति बिगड़ने लगी. जिस सिन्धु सभ्यता की चर्चा आज जोरों पर हैं, और कई सामाजिक समूहों के द्वारा इस बात का दावा किया जाता है कि यह सभ्यता मूलत: उनके ही पूर्वजों के द्वारा बसाई गयी थी, और इसका भी विनाश आर्यों के आगवन के बाद हो गया, दावा किया जाता है कि उस सिन्धु सभ्यता को स्थापित करने वाले असुर जनजाति के ही लोग थें.

    असुर जनजाति के द्वारा निर्मित लोहे में कभी जंग नहीं लगती

    यहां यह भी ध्यान देने की जरुरत है कि असुरों को उन्हें ताम्र, कांस्य एवं लौह युग का सहयात्री माना जाता है, आज भी असुर जनजाति को लोहे के काम काज का उस्ताद माना जाता है, दावा किया जाता है कि असुरों के  द्वरा निर्मित लोहे में कभी जंग नहीं लगती है, और इसी तकनीक का इस्तेमाल आज बड़ी बड़ी कंपनियों के द्वारा किया जा रहा है. दरअसल पारंपरिक रूप से असुर जनजाति की आर्थिक व्यवस्था लोहा गलाने और उस लोहे से कृषि यंत्रों का निर्माण की थी, इतिहासका गुप्ता ने लिखा है कि नेतरहाट पठारी क्षेत्र में असुरों द्वारा तीन तरह के लौह अयस्कों की पहचान की गयी थी। पहला पीला, (मेग्नीटाइट), दूसरा बिच्छी (हिमेटाइट), तीसरा गोवा (लैटेराइट से प्राप्त हिमेटाइट). असुर अपने अनुभवों के आधार पर केवल देखकर इन अयस्कों की पहचान कर लिया करते थे तथा उन स्थानों को चिन्हित कर लेते थे.

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