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फील गुड का शिकार तो नहीं हो रहें हेमंत! गिरफ्तारी के बाद पार्टी में भी बढ़ सकती है उलझनें

फील गुड का शिकार तो नहीं हो रहें हेमंत! गिरफ्तारी के बाद पार्टी में भी बढ़ सकती है उलझनें

Ranchi-ईडी के छठे समन को अंगुठा दिखलाते हुए सीएम हेमंत आपकी योजना आपकी सरकार आपके द्वारा के साथ राज्य के दौरे पर निकल पड़े हैं. उनके तेवर, भाषा और भाव भंगिमा से इस बात का संकेत मिल रहा है कि वह अब इस लड़ाई को जनता की अदालत में ले जाने को उतारु हैं. उनकी कोशिश चार वर्षों की अपनी सरकार की कामयाबियों को जन-जन तक पहुंचाना और इन उपलब्धियों के आधार पर ही अपनी निर्दोषता का प्रमाण पत्र हासिल करना है.

सरना धर्म कोड, 1932 का खतियान और पिछड़ों का आरक्षण विस्तार हेमंत का मास्टर कार्ड

इन चार वर्षों में जिस तरीके से उनकी सरकार ने 1932 के खतियान पर आधारित स्थानीयता नीति और नियोजन नीति, आदिवासी समुदाय की पुरानी मांग सरना धर्म के साथ ही पिछड़ों के आरक्षण को 14 फीसदी से बढ़ाकर 27 फीसदी करने का बिल पारित किया. अपनी यात्रा में वह गिन गिन कर अपनी उपलब्धियों का खांचा खिंच रहे हैं, यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि हमारी सरकार ने बेहद विपरीत परिस्थितियों में अपने स्तर से अपने काम को अंजाम दिया, लेकिन बावजूद इसके ये सारे बिल आज के दिन राजभवन में पड़े हुए हैं, और यह सब कुछ भाजपा के इशारे पर हो रहा है. भाजपा किसी भी कीमत पर 1932 के आधार पर स्थानीयता का हक देने को तैयार नहीं है, उसकी साजिश है कि राज्य की चतुर्थ और तृतीय श्रेणी की नौकरियों के दरवाजे बाहरी लोगों के लिए खोल दिया जाय. और यदि ऐसा होता है कि यह आदिवासी मूलवासी समुदाय के युवाओं के आकांक्षाओं के साथ कुठाराघात होगा.

इसके साथ ही भाजपा आदिवासी समुदाय में धर्मांतरित और अधर्मांतरित का विभेद खड़ा कर सरना धर्म कोड को बाधित करना चाहती है, यही कारण है कि सरना धर्म कोड को पारित करने के बावजूद भी यह राजभवन में अटका पड़ा है, ठीक यही पिछड़ों के आरक्षण विस्तार का है, राज्य गठन के पहले तक पिछड़ों को 27 फीसदी का आरक्षण मिलता था, लेकिन यह बाबूलाल की सरकार थी, जिसने पिछड़ो के साथ हकमारी किया और उनके आरक्षण पर कैंची चलाते हुए उनके आरक्षण को 27 फीसदी से 14 फीसदी करने का निर्णय लिया, लेकिन हमारी सरकार ने पिछड़ों के इस दर्द को समझा और उनका आरक्षण एक बार फिर से 27 फीसदी करने का निर्णय लिया. लेकिन उस बिल का भी हश्र वही हुआ जो दूसरी तमाम बिलों का हुआ. भाजपा किसी भी बिल को उसके अंजाम तक पहुंचने देना नहीं चाहती. हेमंत सरकार की कोशिश अब इसी के आधार पर मतदाताओं से आशीर्वाद पाने की है.  

सर्वजन पेंशन पर भी टिकी है हेमंत सरकार की निगाहें

हेमंत सरकार सर्वजन पेंशन को भी एक बड़ा मुद्दा बना रही है, उसका दावा है कि उनकी पूर्ववर्ती सरकार में बोड़े भर भर कर आवदेन कार्यालयों में भेजे जाते थें, लेकिन तब जरुरतमदों को पेंशन नहीं मिलता था, लेकिन आज राज्य में कोई भी ऐसा बुजुर्ग और जरुरतमंद नहीं है, जिसे यह पेंशन नहीं मिल रहा हो. हमारी सरकार हर जरुरतमंद को पेंशन उपलब्ध करवा रही है. इसके साथ ही वह अबुआ आवास योजना को भी फ्लैगशिप योजना मान कर चल रही है.

उसका दावा है कि राज्य के बेघरों को आवास प्रदान करने में केन्द्र सरकार ने अपने हाथ खड़े कर लिए, उसके बाद हमारी सरकरा ने अपने संसाधनों के बल पर राज्य के 12  लाख बेघरों को तीन कमरों को आवास देने का निर्णय किया, इस योजना को कार्यान्वित होने के बाद राज्य में  कोई भी बेघर नहीं होगा, हर किसी के सिर पर छत होगा.

क्या इन योजनाओं के बूते वैतरणी पार हो जायेगी हेमंत सरकार

लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या ये मुद्दे चुनाव में हेमंत सरकार की वैतरणी पार करने की स्थिति में हैं, निश्चित रुप से हेमंत सरकार ने इस मोर्चे पर काम किया है, लेकिन इसके साथ ही रोजगार भी एक अहम मुद्दा है, और यह झामुमो की घोषणा पत्र का हिस्सा था, लेकिन बावजूद इसके इस मोर्चे पर यह सरकार पिछड़ती नजर आ रही है, हालांकि अभी भी विधान सभा चुनाव में करीबन एक वर्ष का समय अभी शेष है, लेकिन यहां मुख्य सवाल लोकसभा चुनाव का है, तब क्या मतदाता इन कामों के आधार पर हेमंत सरकार के पक्ष में अपनी मुहर लगायेगी, क्या वह हेमंत के चेहरे को देख कर ही लोकसभा के लिए अपना मतदान करेगी. क्योंकि लोकसभा के मुद्दे अलग होते हैं, तब हेमंत के सामने पीएम मोदी का चेहरा होगा, और इसके साथ ही राष्ट्रवाद और धार्मिक विभाजन के भड़काउ मुद्दे होंगे, जो भाजपा का अपना पिच है, और इस पिच पर अब तक वह शानदार बैटिंग करती रही है. कहने को तो सबका साथ सबका विकास का नारा चलता है, लेकिन इस सबका साथ में दलित-आदिवासी, पिछड़ों के साथ ही अल्पसंख्यक समाज के वास्तवित मुद्दे नेपथ्य में डाल दिया जाता है. हालांकि भाजपा इस हालत में खुद भी नहीं है कि रोजगार को मुद्दा बना सके, लेकिन भाजपा के धार्मिक ध्रुवीकरण का काट खोजना आज भी झामुमो के लिए बेहद मुश्किल चुनौती होगी.

आज भी आदिवासी मतदाताओं के बीच हेमंत सबसे बड़ा चेहरा

हालांकि पिछले विधान सभा चुनावों की बात करें तो आज के दिन झारखंड में आदिवासी समाज के लिए आरक्षित 28 में से 26 सीटों पर झामुमो और एक पर कांग्रेस का कब्जा है. ये आंकड़े इस बात के सबूत है कि आदिवासी मतदाताओं की बीच हेमंत सबसे बड़ा चेहरा हैं.

लेकिन यहां यह भी नहीं भूलना चाहिए कि राज्य में गैर आदिवासियों की भी एक बड़ी आबादी है, जिसका एक बड़ा हिस्सा भाजपा के साथ जा सकता है, और इसी की काट झामुमो को खोजनी है. इस हालत में 2024 की लड़ाई बहुत रोचक होने वाली है, और यह बहुत हद तक इंडिया गठबंधन की रणनीतियों और चुनावी एजेंडों पर निर्भर करता है. लेकिन इतना साफ है कि हेमंत सरकार को बेहद ही सतर्क रहना होगा, और समय रहते अपने घटक दलों के साथ बेहतर तालमेल के साथ प्रत्याशियों का चयन करना होगा, क्योंकि दक्षिण के राज्यों के सिमट चुकी भाजपा का अंतिम आशा हिन्दी भाषा-भाषी राज्यों पर ही टिकी है, वह इस बात को भली भांति जानती है कि जैसी ही उसकी हालत बिहार, झारखंड और यूपी में कमजोर होती है, दिल्ली एक हसीन ख्बाव बन कर रह जायेगा. लेकिन इससे साथ ही झामुमो के लिए बेहद जरुरी है कि वह अपने अंदर पनप रहे फील गुड से बाहर निकले, और ईडी के सवालों का तार्किक जवाब पेश करें, क्योंकि सियासी गलियारों में यह खबर तेजी से फैल रही कि अपने छठे समन के बाद अब ईडी इसके कानूनी पहलू पर विचार कर रही है, शायद उसकी कोशिश पीएमएलए कोर्ट से सीएम हेमंत के खिलाफ वारंट निर्गत करवाने की है, जिसके बाद सीएम हेमंत पर गिरफ्तारी की तलवार लटक सकती है, और यदि उनकी गिरफ्तारी हो जाती है, तो उस हालत में सीएम का चेहरा कौन होगा. इसकी काट भी झामुमो को तलाशना होगा, सवाल यह भी है कि क्या सीएम हेमंत की गिरफ्तारी के बाद पार्टी एकजूट होकर उसका मुकाबला कर पायेगी, क्या सीएम हेमंत की गैरमौजूदगी में वह इसे एक सियासी मुद्दा बनाने की हालत में होगी, निश्चित रुप से सीएम हेमंत की गिरफ्तारी के बाद आदिवासी मूलवासी वर्ग में एक आक्रोश का जन्म होगा, लेकिन बड़ा सवाल फिर वही है कि इस आक्रोश को उसकी मंजिल तक पहुंचाने वाला चेहरा कौन होगा?

पार्टी के अंदर के लोबिनों का क्या होगा?

और यही आकर झामुमो के बीच एक सन्नाटा पसरा नजर आता है, क्योंकि झामुमो में वर्तमान हालत में कोई सेकेंड लाइन नेतृत्व नजर नहीं आता, जो पूरे पार्टी को एकजूट रख सके. और इस हालत में पार्टी के विशुब्धों की गतिविधियां भी तेज हो सकती है, जो लोबिन आदिवासी मूलवासियों के सवाल पर लगातार अपनी ही सरकार को कटघरे में खड़ा करते रहते हैं, क्या वही लोबिन बदली हुई परिस्थितियों में भाजपा के साथ खड़ा होने का दुस्साहस नहीं करेंगे, यहां साफ कर दें कि यह लोबिन कोई भी हो सकता है, लोबिन तो महज एक प्रतीक हैं, लेकिन झामुमो में लोबिनों की कमी नहीं है, झामुमो को अपने फील गुड से बाहर निकल इन सवालों का जवाब जरुर तलाशना चाहिए.

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Published at:23 Dec 2023 01:54 PM (IST)
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