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आदिवासियों में जहर घोलने की संघी साजिश डीलिस्टिंग! हर चुनाव के पहले आरएसएस खेलता है इस तरह का घिनौना खेल

BY -
Devendra Kumar CW
Devendra Kumar CW
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 17, 2026, 10:33:04 PM

Ranchi- जनजाति सुरक्षा मंच के बनैर तले डिलिस्टिंग की मांग को उछालने जाने पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए झारखंड कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष बंधु तिर्की ने इसे आदिवासी समाज में जहर घोलने का संघी साजिश करार दिया है. उन्होंने कहा है कि चुनाव के पहले आदिवासी समाज में इस जहर को घोल कर आरएसएस भाजपा के पक्ष में ध्रुवीकरण की सियासत कर रहा हैं, इसका आदिवासी समाज के कल्याण से कोई लेना देना नहीं है.

आरएसएस और जनजाति मंच जैसे संगठनों से सावधान रहे आदिवासी समाज

आदिवासी समाज को सचेत करते हुए बंधु तिर्की ने कहा कि जनजाति सुरक्षा मंच को  आदिवासी समाज में इस तरह का जहर घोलने से बाज आना चाहिए, यह आदिवासी समाज की संस्कृति और परंपरा के बिल्कूल खिलाफ है, यह हमारी खूबसुरती है कि गांव हो या शहर आदिवासी समाज अपने बीच के तमाम विभाजनों को भूल कर परस्पर सौहार्द के साथ निवास करता है, उनके बीच सरना ईसाई का कोई भेद नहीं है, दोनों एक दूसरे साथ सम्मान के साथ रहते हैं, एक दूसरे पर्व त्योहार में बढ़-चढ़ कर भाग लेते हैं. धार्मिक परंपरा भले ही अलग हो, लेकिन आदिवासी संस्कृति, भाषा समान है, झारखण्ड की इस मौलिक भावना से खिलवाड़ करने का अधिकार किसी भी संगठन को नहीं है और यदि यह कोशिश की गयी तो आदिवासी समाज इसका मुंहतोड़ जवाब देगा.

चुनाव के पहले समाज को बांटने की साजिश में जुट जाता है आरएसएस

बंधु तिर्की ने कहा कि जैसे ही चुनावी हवा बहती है, सामाजिक ध्रुवीकरण को तेज करने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसकी अनुषंगी इकाइयां मैदान में उतर जाती है. 24 दिसम्बर को राजधानी के मोरहाबादी मैदान में भी इसी साजिश के तहत इस मुद्दे को उठाया गया है. लेकिन झारखंड में इसका कोई महत्व नहीं है. हर व्यक्ति को हमारा संविधान अपना धर्म चुनने का अधिकार देता है, किसी दूसरे धर्म से प्रभावित होकर भले कोई व्यक्ति किसी अन्य धर्म में मतान्तरित हो जाये, लेकिन इससे बावजूद वह अपनी परंपरा और संस्कृति से नहीं कटता. सांस्कृतिक दृष्टिकोण से किसी भी धर्म में रहने के बावजूद एक आदिवासी आदिवासी ही होता है. आदिवासीयत ही उसकी असली पहली पहचान है, बाकि की बातें बाद में आती है. समय के साथ अनेक आदिवासियों ने ईसाई, मुस्लिम या फिर सनातन धर्म को अपनाया है और उन्हें इस बात का अधिकार है. लेकिन इससे उनकी संस्कृति में कोई बदलाव नहीं आता. यदि ईसाई धर्म पर बात होती है तो बाकी धर्म के मामले में भी जनजाति सुरक्षा मंच को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिये. जनजाति सुरक्षा मंच हम आदिवासियों को पाठ पढ़ाना बन्द करे.

आदिवासी जमीन लूट के खिलाफ जनजाति सुरक्षा मंच की चुप्पी क्यों?

जनजाति सुरक्षा मंच यदि आदिवासियों का इतना ही बड़ा पैरोकार है तो वह आदिवासी जमीन के लूट के खिलाफ अपनी आवाज बुंलद क्यों नहीं करता.  आदिवासियों की जमीन लूटनेवाले वैसे लोग हैं जो दूसरे प्रदेशों से झारखण्ड में आये हैं. जमीन की इस लूट के कारण आज आदिवासियों को राजधानी सहित दूसरे शहरों से उजाड़ा जा रहा है, लेकिन जनजातीय सुरक्षा मंच इस ज्वलंत मुद्दे पर एक साजिश तहत चुप्पी साध जाता है. उसे इस बात की फिक्र नहीं है कि आज पूरे झारखंड से वह पलायन को विवश हैं. उनके हितों को कुचला जा रहा है, लेकिन इन  मुद्दों पर जनजाति मंच अपना  मुंह खोलने को तैयार नहीं है, इससे यह स्पष्ट है कि जनजाति सुरक्षा मंच जुड़े नेताओं की मानसिकता क्या है. और उनको सामने कर किन लोगों के द्वारा राजनीति की जा रही है.

आठ बार सांसद रहने के बावजूद कड़िया मुंडा ने आदिवासी समाज के लिये क्या किया

कड़िया मुंडा पर सवाल खड़ा करते हुए बंधु तिर्की ने पूछा कि कड़िया मुंडा के इस बात का जवाब देना चाहिए कि आठ बार सांसद रहने के बावजूद उन्होंने आदिवासी समाज के लिये क्या किया. आज तो जनजातीय उप योजना की राशि में भी कटौती कर दी गयी, क्या इसका नुकसान कड़िया मुंडा को दिखलायी नहीं पड़ता, आखिर वह कौन सी बेबसी है, वह इस मुद्दे पर अपना कुछ भी बोलने को तैयार नहीं है.

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