2024 का आगाज! रथ ले निकल पड़े हेमंत, इधर सोशल मीडिया पर बाबूलाल का ट्विटर वार, कैसे होगा भाजपा का बेड़ा पार

    2024 का आगाज! रथ ले निकल पड़े हेमंत, इधर सोशल मीडिया पर बाबूलाल का ट्विटर वार, कैसे होगा भाजपा का बेड़ा पार

    Ranchi- तीन राज्यों में चुनावी शिकस्त के बाद जहां कांग्रेस अपने संगठन में लगातार ऑपेरशन कर रही है, पुराने मोहरों को किनारा कर नये चेहरों पर दांव लगाया जा रहा है, पार्टी के अंदर इस भारी फजीहत की समीक्षा की जा रही है, वहीं प्रदेश भाजपा फील गुड में डुबी दिखलायी पड़ने लगी है, एक तरफ जहां हेमंत सोरेन आपकी योजना, आपकी सरकार, आपके द्वारा के माध्यम से चुनावी रथ पर सवार होकर 2024 के महासंग्राम के लिए निकल पड़े हैं, इस संग्राम से पहले चार वर्षों के अपने शासन काल में किये गये कामों की जमीनी सच्चाई को देखने-परखने की कवायद कर रहे हैं, लोगों का फीड बैक प्राप्त कर रहे हैं और उस फीड बैक के आधार नयी रणनीति और नयी उर्जा के साथ अपने कार्यकर्ताओं को जमीन पर संघर्ष करने के लिए जोश का संचार कर रहे हैं.

    ईडी सीबीआई के बावजूद कायम है हेमंत का हौसला

    अपने कार्यकर्ताओं में इस बात का भरोसा दिलाने की कोशिश कर रहे हैं कि ईडी-सीबीआई और दूसरी केन्द्रीय एजेंसियों की साजिश के बावजूद उनका संकल्प डगमगाया नहीं है. वह आज भी अपने कार्यकर्ताओं के साथ कंधा से कंधा मिलाकर इस लड़ाई का नेतृत्व करने को तैयार हैं, तो दूसरी ओर भाजपा प्रदेश बाबूलाल की पूरी लड़ाई सोशल मीडिया पर सिमटी नजर आ रही है. वह जमीन पर उतरने के बजाय सोशल मीडिया पर अपनी धमाकेदार उपस्थिति दर्ज कर सरकार को उखाड़ फेंकने का संकल्प दुहरा रहे हैं.

    शहरी मतदाताओं में पीएम मोदी का जलबा तो आदिवासी-मूलवासियों से हेमंत को हिम्मत

    दरअसल खबर यह है कि सीएम हेमंत सोरेन ने यह स्वीकार कर लिया है कि शहरी मतदाताओं के बीच पीएम नरेन्द्र मोदी का एक जलबा है, और यह शहरी मतदाता ही आज के दिन भाजपा की ताकत हैं, लेकिन झारखंड की तीन चौथाई आबादी ग्रामीण इलाकों में निवास करती है, और यही वही इलाका जहां झामुमो का कोर वोटर निवास करता हैं, जिस आदिवासी-मूलवासियों के हक-हकूक के वह वकालत करते हैं, जिसकी उम्मीदों को वह जिंदा रखने का संकल्प दुहराते हैं, जिसकी हिस्सेदारी और सामाजिक भागीदारी के सवाल को सियासी विमर्श का हिस्सा बनाते हैं, उसकी बेचैनी और त्रासदी अलग है, इन सामाजिक समूहों के मुद्दे अलग है. वह आज भी सामाजिक रुप से अपनी पहचान की लड़ाई लड़ रहा है, राम मंदिर और हिन्दूत्व के नारों से दूर वह दो जून की रोटी के लिए जी तोड़ मेहनत कर रहा है, कहा जाता है कि इसी रणनीति के तहत झामुमो ने तात्कालिक रुप से अपना पूरा फोकस ग्रामीण इलाकों पर किया है,  और यही कारण है कि आपकी योजना आपकी सरकार आपके द्वारा के सारे कार्यक्रम लगभग जिला मुख्यालयों से दूर प्रखंड स्तर पर आयोजित किये जा रहे हैं, और खुद सीएम हेमंत इन कार्यक्रमों मे अपनी भागीदारी को सुनिश्चित कर रहे हैं.

    आदिवासी-मूलवासी मुद्दे को उछाल रिश्ता बनाने की कवायद

    यही कारण है कि हेमंत सोरेन अपनी रैलियों में इस बात को दुहराना नहीं भूलते कि आज के दिन ढिबरी जलाकर ढूढ़ने के बावजूद एक भी बुजुर्ग, विधवा और विकलांग गैर पेंशनधारी नहीं मिलेगा, हमारी सरकार ने हर जररुरतमंद को पेंशन दिया है, इसके साथ ही वह इस बात को दूहराना भी नहीं भूलते कि जब कोरोना की महामारी के बीच केन्द्र सरकार ने आवगमन के सारे साधन बंद कर दिये थें, तो यह आपकी सरकार ही थी जो अपने फेटहाल मजदूरों को हवाई जहाज में बैठा बैठा कर घर वापस ला रहा था. कूल मिलाकर वह ईडी-सीबीआई की ओर से लटकती तलवार के बीच जमीनी समीक्षा में जुटे हैं, और इसके साथ ही अपने कोर वोटर के बीच यह संदेश भी प्रसारित कर रहे हैं कि आपकी सरकार किसी भी कीमत पर ईडी सीबाईआई और भाजपा के दवाब में बाहरी लोगों के लिए झारखंड में नौकरियों का दरवाजा नहीं खोलेगी.

    भाजपा के इशारे पर काम कर रही ईडी-सीबीआई

    यही कारण है कि हमारी सरकार ने 1932 के खतियान को विधान सभा से पास किया, खतियान आधारित नियोजन नीति का निर्माण कर झारखंडी युवाओं के हकों की हिफाजत करने का संकल्प दुहराया, आदिवासी समुदाय की पुरानी मांग सरना धर्म कोड को विधान सभा के पटल से पास कर राजभवन भेजा, बाबूलाल ने जिस  पिछड़ी जाति के आरक्षण पर कैंची चलाया, हमारी सरकार ने एक बार फिर से 27 फीसदी करने का निर्णय लिया. लेकिन भाजपा को आदिवासी-मूलवासियों के लिए किये गये हमारी सरकार के काम स्वीकार नहीं है, और इसीलिए भाजपा के इशारे पर हमारे खिलाफ ईडी और सीबीआई छोड़ा गया है, ताकि हम आपकी लड़ाई में कमजोर पड़ जायें, हमारा ध्यान भटक जाये.

    बाबूलाल का ट्वीटर वार

    लेकिन इसके विपरीत यदि हम बाबूलाल के संकल्प को समझने की कोशिश करें तो उनकी पूरी लड़ाई सोशल मीडिया पर सिमटती नजर आ रही है, मानो तीन राज्यों में फतह के साथ ही भाजपा ने झारखंड का किला भी ध्वस्त कर दिया हो, अब सिर्फ चुनाव की औपचारिकता निभानी है. याद करें, कुछ यही हालात पड़ोसी राज्य में भूपेश बघेल की थी, वह भाजपा को कहीं भी मैदान में खड़ा नहीं पा रहे थें, अपनी एकतरफा जीत का दावा कर रहे थें, लेकिन चुनाव परिणामों ने साबित कर दिया वह एक आत्ममुग्धता का शिकार हो चुके थें, जहां से उन्हे हर तरफ सिर्फ पंजा ही पंजा दिखलायी पड़ता था.

    2024 का महासंग्राम में सिर्फ पीएम मोदी की किस्मत का फैसला नहीं

    ध्यान रहे कि 2024 का लोकसभा चुनाव सिर्फ भाजपा की अग्नि परीक्षा नहीं है, पीएम मोदी रहेंगे या उनकी विदाई होगी, सवाल सिर्फ इतना नहीं है, जिस आशा और विश्वास के लम्बे अर्से के बाद बाबूलाल की वापसी हुई है, और जिस रणनीति के साथ वापसी करवायी गयी है, यदि बाबूलाल उसमें नाकाम रहते हैं, आदिवासी-मूलवासी मतदाता जिसे झामुमो का कोर वोटर माना जाता है, यदि बाबूलाल उसमें सेंधमारी में नाकाम रहते हैं, झारखंड की सियासत में उनकी  प्रासंगिकता पर सवाल उठने लगेंगे. पार्टी का जो धड़ा आज केन्द्रीय नेतृत्व के दवाब में बाबूलाल को स्वीकार करने को मजबूर है, वह अपनी आवाज तेज कर सकता है.

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