बिहार: जातीय समीकरण के अनुसार कैसे बदलती रही सीएम की कुर्सी, कब से कम हुआ सवर्णो का दबदबा?

    बिहार: जातीय समीकरण के अनुसार कैसे बदलती रही सीएम की कुर्सी, कब से कम हुआ सवर्णो का दबदबा?

    टीएनपी डेस्क (TNP DESK): बिहार के लोग समय के अनुसार मुख्यमंत्री का चेहरा बदलते रहे हैं. बिहार की खासियत कहीं जानी चाहिए कि हर तबके के लोगों ने बिहार का नेतृत्व किया. किसी का कार्यकाल छोटा तो किसी का बड़ा जरूर रहा. लेकिन शासन की बागडोर सबके हाथों में गई. बिहार में शासन करने वाले कुर्मी जाति से आने वाले नीतीश कुमार सबसे आगे रहे. वह अब  मुख्यमंत्री की कुर्सी से त्यागपत्र दे देंगे. इसके साथ ही बिहार में 19 साल से अधिक सीएम की कुर्सी पर रहने का रिकॉर्ड उनके नाम हो जाएगा. अगर थोड़ा पीछे लौटे तो आजादी के बाद के शुरुआती दशकों में बिहार की कुर्सी पर सवर्ण जातियों का दबदबा था. 1990 के बाद पिछड़े और दलित वर्ग का प्रतिनिधित्व बढ़ा, बिहार की राजनीति में अलग-अलग जातियों का प्रभाव अलग-अलग समय में बढ़ा और घटा.  

    सबसे बड़ा कार्यकाल कुर्मी समाज का रहा

    सबसे अधिक मुख्यमंत्री की कुर्सी कुर्मी और भूमिहार जाति के नाम रही. कुर्मी समाज से आने वाले नीतीश कुमार 19 साल से अधिक समय तक मुख्यमंत्री रहे. यह सबसे लंबा कार्यकाल कहा जाएगा. भूमिहार समाज से आने वाले श्रीकृष्णा सिंह 17 साल से अधिक समय तक मुख्यमंत्री की कुर्सी पर रहे. वैसे तो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बारी-बारी से सभी जातियों के लोग रहे, लेकिन सबसे अधिक कार्यकाल कुर्मी जाति का ही रहा. 
     
    ब्राह्मण समाज से पांच तो राजपूत जाति के चार सीएम हुए 
     
    ब्राह्मण समाज से बिंदेश्वरी दुबे, विनोदानंद  झा, केदार पांडे, भागवत झा आज़ाद और जगन्नाथ मिश्र मुख्यमंत्री बने. 1960 से लेकर 1980 के बीच कांग्रेस में ब्राह्मण जाति का प्रभाव था. राजपूत जाति से भी बिहार में चार मुख्यमंत्री बने, जिनमें चंद्रशेखर सिंह, सत्येंद्र नारायण सिंह, हरिहर सिंह और दीप नारायण सिंह के नाम गिनाये जाते हैं. हालांकि इनका कार्यकाल छोटा था.1990 के बाद बिहार की राजनीति में बदलाव आया. यादव समाज का प्रभाव तेजी से आगे गया. लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी ने मिलकर लगभग 14 साल तक बिहार की सत्ता संभाली, इसके अलावा दरोगा प्रसाद राय, बीपी मंडल भी यादव समाज से ही मुख्यमंत्री बने.  

    1990 के बाद 2005 तक का दौर परिवर्तन का रहा

    माना जाता है कि 1990 के बाद 2005 तक का दौरा परिवर्तन का दौर था. दलित समाज से भी बिहार के कई लोग मुख्यमंत्री बने. भोला पासवान शास्त्री, रामसुंदर दास, जीतन राम मांझी का नाम लिया जाता है.  हालांकि इनका कार्यकाल बहुत लंबा नहीं रहा. इसके अलावे कर्पूरी ठाकुर भी बिहार के मुख्यमंत्री बने. पिछड़े वर्ग की राजनीति को मजबूत करने में उनकी भी बड़ी भूमिका मानी जाती है. लालू प्रसाद के पहले कर्पूरी ठाकुर ने ही पिछड़े वर्ग को मजबूती देने का प्रयास किया था. आंकड़ों के हिसाब से अगर देखा जाए तो यह कहा जा सकता है कि बिहार में जाति की राजनीति समय और काल  के साथ बदलती रही. बिहार ने सभी जातियों के साथ यथासंभव "न्याय" किया. यह अलग बात है कि बिहार के इतिहास में कुर्मी जाति का शासन यानी नीतीश कुमार का शासन सबसे लंबा रहा. नीतीश कुमार के बाद अगला मुख्यमंत्री कौन होगा, वह किस जाति से होगा, इस पर टकटकी लगी हुई है. 

    रिपोर्ट - धनबाद ब्यूरो


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