जहां ‘मूर्ख’ कालिदास को मिला ज्ञान का वरदान, जानें उच्चैठ भगवती की कहानी

  • July 29, 2026 10:13 pm
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बिहार के मधुबनी जिले में स्थित उच्चैठ भगवती स्थान सिर्फ आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि एक ऐसी प्रसिद्ध लोककथा से भी जुड़ा है, जिसमें एक साधारण और अल्पज्ञ माने जाने वाले कालिदास को माँ भगवती के आशीर्वाद से ज्ञान प्राप्त होने की बात कही जाती है. मंदिर की अनोखी प्रतिमा, उफनती नदी, रात में दीप जलाने की कहानी और देवी के वरदान से जुड़ी यह कथा आज भी लोगों को आकर्षित करती है. कहा जाता है कि यहीं से कालिदास के जीवन ने ऐसी दिशा बदली, जिसने उन्हें संस्कृत साहित्य के महान कवियों में शामिल कर दिया.

जहां ‘मूर्ख’ कालिदास को मिला ज्ञान का वरदान, जानें उच्चैठ भगवती की कहानी
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बिहार के मधुबनी जिले में स्थित उच्चैठ भगवती स्थान आस्था और रहस्य से जुड़ा एक प्रसिद्ध धाम है. मान्यता है कि इसी मंदिर में माँ भगवती के आशीर्वाद से कालिदास को ज्ञान प्राप्त हुआ था. यही वजह है कि यह स्थान आज भी श्रद्धालुओं के साथ-साथ इतिहास और लोककथाओं में रुचि रखने वालों को आकर्षित करता है.

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मंदिर में माँ भगवती की प्रतिमा बेहद अनोखी मानी जाती है. काले पत्थर पर बनी इस प्रतिमा में देवी को चार भुजाओं और सिंह पर कमलासन के रूप में दर्शाया गया है. प्रतिमा का सिर नहीं है, इसलिए स्थानीय मान्यता में उन्हें छिन्नमस्तिका भगवती कहा जाता है. इस अद्भुत स्वरूप के दर्शन के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं.

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उच्चैठ भगवती स्थान की सबसे चर्चित पहचान सिर्फ इसकी प्रतिमा नहीं, बल्कि कालिदास से जुड़ी लोककथा भी है. मान्यता है कि कभी यहां संस्कृत का गुरुकुल हुआ करता था. इसी परिसर के आसपास कालिदास एक साधारण सेवक के रूप में रहते थे. लोककथा में उन्हें कम ज्ञान वाला बताया गया है और कहा जाता है कि लोग उनकी बुद्धि का मजाक उड़ाते थे.

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कहानी के अनुसार मंदिर और गुरुकुल के बीच थुम्हानी नदी बहती थी. एक दिन लगातार बारिश के कारण नदी उफान पर थी. शाम होने लगी, लेकिन मंदिर में संध्या दीप जलाने के लिए कोई छात्र नदी पार करने को तैयार नहीं हुआ। तब यह जिम्मेदारी कालिदास को दी गई. उनके सामने एक तरफ तेज बहती नदी थी और दूसरी तरफ माँ के मंदिर में दीप जलाने का संकल्प.

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लोकमान्यता के अनुसार कालिदास बिना डरे उफनती नदी में उतर गए. किसी तरह नदी पार करके वे मंदिर पहुंचे और वहां संध्या दीप जलाया. वापस लौटते समय दीपक की कालिख अनजाने में माँ भगवती के मुख पर लग गई. यहीं से कहानी में एक चमत्कारिक मोड़ आता है और मान्यता के अनुसार माँ भगवती कालिदास के सामने प्रकट हुईं.

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किवदंती के मुताबिक माँ भगवती कालिदास की भक्ति से प्रसन्न हुईं. उन्होंने उनसे वरदान मांगने को कहा. कालिदास ने धन, वैभव या राजसी सम्मान की इच्छा नहीं जताई. उन्होंने सिर्फ ज्ञान का वरदान मांगा. मान्यता है कि उनकी सच्ची और निष्कपट भक्ति देखकर माँ भगवती ने उन्हें ज्ञान प्राप्ति का आशीर्वाद दिया.

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लोककथा के अनुसार माँ भगवती ने कालिदास को ऐसा आशीर्वाद दिया कि वे जिस पुस्तक को स्पर्श करेंगे, उसका ज्ञान उन्हें प्राप्त हो जाएगा. इसके बाद उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल गई. जो व्यक्ति कभी अपनी अल्प बुद्धि के कारण उपहास का पात्र माना जाता था, वही आगे चलकर संस्कृत साहित्य की महान प्रतिभाओं में गिने जाने लगे.

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कालिदास को संस्कृत साहित्य के महान कवियों और नाटककारों में गिना जाता है. अभिज्ञानशाकुंतलम्, मेघदूत और कुमारसंभव जैसी रचनाओं ने उन्हें साहित्य की दुनिया में अमर पहचान दी. हालांकि उच्चैठ मंदिर से जुड़ी कालिदास की ज्ञान-प्राप्ति की कहानी ऐतिहासिक तथ्य से अधिक एक प्रसिद्ध लोकमान्यता और धार्मिक परंपरा के रूप में जानी जाती है.

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उच्चैठ भगवती स्थान की कहानी सिर्फ एक मंदिर की कहानी नहीं है. यह आस्था, भक्ति और ज्ञान की तलाश से जुड़ी एक ऐसी लोककथा है, जो पीढ़ियों से लोगों को प्रेरित करती आई है. मधुबनी जाने पर इस धाम के दर्शन किए जा सकते हैं. यहां की मान्यताएं और देवी का अनोखा स्वरूप इस स्थान को बिहार के खास धार्मिक स्थलों में अलग पहचान देते हैं.