JTET भाषा विवाद:बांग्ला और उर्दू को जगह लेकिन भोजपुरी से क्यों बैर,पलामू से शुरू हुआ विरोध

    JTET भाषा विवाद:बांग्ला और उर्दू को जगह लेकिन भोजपुरी से क्यों बैर,पलामू से शुरू हुआ विरोध

    पलामू(PALAMU): झारखंड एक ऐसा राज्य है जहां हर कदम पर भाषा बदल जाती है. यहां भोजपुरी से लेकर बंगाली और उडिया भाषा लोग समझते है. लेकिन AC कमरों में बैठने वाले अधिकारी इन सब से बेखबर है. तभी तो शिक्षक पात्रता परीक्षा JTET  से मगही,भोजपुरी और अंगिका को बाहर कर दिया. इसके जगह पर उरांव भाषा थोप दिया. अब इस भाषा को लेकर पलामू-गढ़वा में विरोध शुरू हो गया. पूर्व मंत्री कमलेश सिंह और युवा नेता सूर्या सिंह ने मोर्चा खोलते हुए. सख्त लहजे में पूछा है क्या मंत्री विधायक के बच्चे उरांव भाषा में परीक्षा देंगे. साथ ही सुधार नहीं होने पर आंदोलन की चेतवानी दी है.

    पूर्व मंत्री कमलेश सिंह एर युवा नेता सूर्या सिंह ने हुसैनाबाद स्थित अपने आवासीय कार्यालय में प्रेस वार्ता की. जहां हुसैनाबाद विधानसभा क्षेत्र के साथ पलामू प्रमंडल के हजारों बच्चे जो JTET परीक्षा देने वाले थे वह मौजूद रहे. सभी ने पूर्व मंत्री से गुहार लगाया की आखिर क्षेत्रीय भाषा को बाहर किया गया. ऐसे में वह परीक्षा कैसे देंगे. उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है. इसपर पूर्व मंत्री कमलेश सिंह और सूर्या ने साफ कहा है कि किसी कीमत पलामू के साथ खिलवाड़ नहीं होने देंगे. सड़क से कोर्ट तक इस लड़ाई को लड़ कर अपने हक को लेकर रहेंगे. सरकार अहंकार में डूबी है. जिसे युवा सबक सिखाने का काम करेगा.                    

    प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए कमलेश कुमार सिंह ने कहा कि यह निर्णय पलामू, गढ़वा और चतरा के युवाओं के साथ सीधा अन्याय है.  उन्होंने सरकार से इस फैसले पर तत्काल पुनर्विचार करने की मांग की और कहा कि क्षेत्रीय भाषाओं को नजरअंदाज कर युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ नहीं किया जा सकता.

    वहीं भाजपा युवा नेता सूर्या सोनल सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि जब झारखंड में क्षेत्रीय आधार पर भाषाओं को विकल्प दिया जाता है—जहां जरूरत है वहां उड़िया, बांग्ला और कई स्थानों पर उर्दू तक शामिल है—तो फिर पलामू प्रमंडल की प्रमुख भाषाओं को बाहर करना नीतिगत भेदभाव है।

    उन्होंने स्पष्ट कहा कि वे किसी भी भाषा के विरोध में नहीं हैं, लेकिन सभी क्षेत्रों के युवाओं को समान अवसर मिलना चाहिए.

    सूर्या सोनल सिंह ने मुख्यमंत्री Hemant Soren के उस बयान पर भी कड़ा प्रहार किया, जिसमें कथित रूप से यह कहा गया कि मगही, भोजपुरी और अंगिका बोलने वाले झारखंडी नहीं हैं.  उन्होंने कहा कि यह बयान न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है, बल्कि लाखों लोगों की पहचान और अस्मिता का अपमान है.

    उन्होंने तीखे शब्दों में कहा मुख्यमंत्री होते कौन हैं यह तय करने वाले कि कौन झारखंडी है और कौन नहीं? पलामू प्रमंडल का इतिहास, यहां की संस्कृति, यहां के लोगों का योगदान—सब कुछ झारखंड की मिट्टी से जुड़ा है. किसी को यह अधिकार नहीं है कि वह हमारी पहचान पर सवाल उठाए.

    दोनों नेताओं ने संयुक्त रूप से चेतावनी देते हुए कहा कि यदि इस निर्णय पर जल्द ही पुनर्विचार कर इसे वापस नहीं लिया गया, तो पूरे पलामू प्रमंडल में एक व्यापक और जोरदार जनआंदोलन शुरू किया जाएगा। उन्होंने कहा कि यह आंदोलन पूरी तरह लोकतांत्रिक होगा, लेकिन इतना प्रभावशाली होगा कि हेमंत सोरेन सरकार की नींव तक हिला देगा.

    प्रेस कॉन्फ्रेंस में उपस्थित युवाओं ने भी एक स्वर में इस फैसले का विरोध करते हुए इसे क्षेत्रीय भेदभाव करार दिया और कहा कि वे अपने अधिकार के लिए संघर्ष करने को तैयार हैं. नेताओं ने कहा कि यह लड़ाई राजनीति की नहीं, बल्कि पलामू के युवाओं के अधिकार, सम्मान और भविष्य की लड़ाई है, और इसे हर हाल में जारी रखा जाएगा.



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