एक्सीलेटर, लिफ्ट, बैटरी वैन, ट्रौली बैग....सुविधाओं ने आपकी जिंदगी की आसान, पर इनका रोजगार छीना


कोडरमा (KODARMA )- देश में जब से रेलवे की व्यवस्था शुरू हुई है, तब से कुलियों का जन्म हुआ है. विडंबना है कि रेलवे आज उन्नति के सभी द्वार पार कर चुका है, लेकिन दशकों से दुनिया का बोझ उठा रहे कुलियों की स्थिति आज भी बद से बदतर है. स्टेशन पर बैठे कुलियों के कान में जब ट्रेन की आवाज आती है तो वे आज भी इस आस में यात्रियों के पास भागते हैं कि उन्हें बैग उठाने का मौका मिलेगा. दो पैसे आएंगे और घर संसार आसानी से कटेगा. पर रेलवे और प्लेटफॉर्म की बढ़ती सुविधाओं ने इनके पेट पर लात मारी है.
ट्रॉली बैग ने रोजगार पर किया आघात
लेकिन वर्षोंं से अब रेल यात्री कुलियों का सहारा लेना छोड़ दिए हैं. धनबाद रेल मंडल अंतर्गत कोडरमा जंक्शन में तैनात कुलियों के अनुसार इसकी सबसे बड़ी वजह ट्रॉली बैग का चलन में आना है. जिससे यात्री खुद समान को लुढ़का कर ले जाते हैं. इसके अलावा स्टेशन पर एक्सीलेटर लगने, लिफ्ट लगने, सब वे, बैटरी वैन, कोच डिस्प्ले बोर्ड आदि सुविधा के कारण अब यात्री कुली को नहीं पूछते हैं. उपेक्षा भरी निगाहों का सामना करते हुए भी कुली यात्री हर यात्री के पास जाते हैं. गाहे बगाहे एक से दो यात्री के भी समान ढोने को मिल जाए तो भगवान का शुक्र मनाकर घर लौटते हैं. कोडरमा स्टेशन पर तैनात कुलियों के बीच अब आर्थिक संकट ने जगह ले ली है.
वर्दी भी खुद के पैसों से
महामारी के कारण 2 वर्ष रेलवे के बंद पड़ने से इनकी कमर टूट चुकी है. जिससे बच्चों को पढ़ाना लिखना तो दूर घर चलाने में भी आफत है. इन सब समस्याओं के साथ कोडरमा के कुलियों को वर्षोंं से विश्रामगृह भी नहीं मिले हैं. गर्मी, जाड़ा और बरसात जैसे मौसम झेलकर भी किसी तरह ईमानदारी से यात्रियों की सेवा में उपलब्ध होते हैं. वर्तमान में 36 में 20 कुली ही कार्यरत हैं जिन्हें 5 वर्षों से लाल वर्दी भी नहीं मिली है. अपने पैसे से ये वर्दी सिलवाकर किसी तरह अपनी पहचान बरकरार रखे हैं.
ये हैं कुली की मांग
- रेलवे में चौथे ग्रेड पर नियमित करने की मांग
- विश्रामगृह की कर रहे मांग
- 5 वर्षों से नहीं मिल रही वर्दी
रिपोर्ट : अमित कुमार, झुमरी तिलैया, (कोडरमा)
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