गांव में रोजगार नहीं, पलायन को मजबूर ग्रामीण, साहब का दावा, जल्दी आएंगे अच्छे दिन

    गांव में रोजगार नहीं, पलायन को मजबूर ग्रामीण, साहब का दावा, जल्दी आएंगे अच्छे दिन

    गुमला (GUMLA) : गुमला जिला के ग्रामीण क्षेत्रों में इन दिनों लोगों के लिए बेरोजगारी एक बड़ी समस्या बनती जा रही है. ग्रामीणों को चिंता सता रही है कि आखिर वे क्या करें. उनका मानना है कि गांव में रोजगार है नहीं, वहीं बाहर जाकर काम करने से डर लगता है. प्रशासनिक पदाधिकारी सभी को विधिवत तरीके से रोजगार से जोड़ने की बात कह रहे हैं.

     ईंट-भट्ठों में काम करने के लिए जाने को मजबूर  

    बता दें कि गुमला जिला झारखंड का एक ऐसा जिला है, जो पूरी तरह से खेती पर आश्रित है. 12 ब्लॉक वाला यह जिला आज भी विकास के मामले में काफी पीछे है. जिले में रोजगार का कोई विकल्प नहीं होने के कारण लोग काफी आर्थिक दिक्क्त में चल रहे हैं. ग्रामीणों की मानें तो सरकार से लगातार वे रोजगार की मांग कर रहे हैं. लेकिन, व्यवस्था नहीं हो पा रही है. बहुत से लोग मजबूरी में ईंट-भट्ठों में काम करने के लिए जाने को मजबूर हो जाते हैं. बीजेपी नेता त्रिलोकी चौधरी कहते हैं कि विगत दिनों जब रघुवर दास की सरकार थी तो सरकार की रोजगार की विभिन्न योजनाओं के साथ ही विकास की काफी योजना चल रही थी. इससे रोजगार मिलता था. लेकिन, आज ऐसा कुछ नहीं हो रहा है जिससे गांव में बदहाली की स्थिति बनी हुई है. उन्होंने बताया कि इसे लेकर उनके सांसद सुदर्शन भगत ने भी कई बार आवाज उठाई है.

    रोजगार को लेकर बड़ी योजना है : उप विकास आयुक्त

    इस गंभीर मामले को लेकर जब जिला के उप विकास आयुक्त हेमन्त सती से बात किया गया तो उन्होंने कहा कि वे भी इस मामले को लेकर गंभीर हैं. इसे लेकर बड़ी योजना पर काम किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि सरकार की आइटीडीए विभाग की ओर से स्वरोजगार से जुड़ने के लिए 50 प्रतिशत अनुदान पर एसटी-एससी के लिए लोन की सुविधा उपलब्ध है. उसके लिए युवाओं की टीम बनाकर उन्हें ट्रेनिंग देकर रोजगार से जोड़ा जाएगा. ताकि, एक योजना से कई लोगों को रोजगार मिल सके. जिले में रोजगार के अभाव में लोग पलायन करने के बाद बड़े शहरों में किस तरह से परेशानी झेलते हैं, इससे जुड़ी कई ख़बरें लगातार आती है. लेकिन, बावजूद इसके सरकार ने गंभीरता से काम नहीं किया. लेकिन, एक बार उप विकास आयुक्त के कहने से लोगों मे उम्मीद जगी है. मगर, अब देखना है कि उनकी बातें कितनी हद तक जमीन पर उतर पाती है.

    रिपोर्ट : सुशील कुमार सिंह, गुमला


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