झारखंड में इंटर एडमिशन को लेकर बढ़ी चिंता, कॉलेजों में बंद हुई पढ़ाई, अब प्लस टू स्कूलों पर 4.23 लाख छात्रों का दबाव

    झारखंड में इस साल मैट्रिक परीक्षा दे चुके करीब 4.23 लाख छात्रों के सामने इंटर (11वीं) में नामांकन एक बड़ी चुनौती बनकर उभर रहा है. राज्य सरकार ने 62 अंगीभूत कॉलेजों में इंटर की पढ़ाई पूरी तरह बंद कर दी है और इसे प्लस टू स्कूलों में स्थानांतरित कर दिया है. इस फैसले के बाद अब सभी छात्रों को इन्हीं स्कूलों पर निर्भर रहना होगा, जिससे सीटों को लेकर प्रतिस्पर्धा और तेज होने की संभावना है.

    झारखंड में इंटर एडमिशन को लेकर बढ़ी चिंता, कॉलेजों में बंद हुई पढ़ाई, अब प्लस टू स्कूलों पर 4.23 लाख छात्रों का दबाव

    टीएनपी डेस्क (TNP DESK): झारखंड में इस साल मैट्रिक परीक्षा दे चुके करीब 4.23 लाख छात्रों के सामने इंटर (11वीं) में नामांकन एक बड़ी चुनौती बनकर उभर रहा है. राज्य सरकार ने 62 अंगीभूत कॉलेजों में इंटर की पढ़ाई पूरी तरह बंद कर दी है और इसे प्लस टू स्कूलों में स्थानांतरित कर दिया है. इस फैसले के बाद अब सभी छात्रों को इन्हीं स्कूलों पर निर्भर रहना होगा, जिससे सीटों को लेकर प्रतिस्पर्धा और तेज होने की संभावना है.

    सरकार का कहना है कि राज्य में सीटों की कोई कमी नहीं है, क्योंकि प्लस टू स्कूलों की संख्या बढ़कर 642 हो चुकी है. इसके अलावा 300 से अधिक विशेष श्रेणी के विद्यालय भी संचालित हैं. हालांकि जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है. खासकर बड़े शहरों में बेहतर स्कूलों में एडमिशन के लिए छात्रों के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा देखने को मिल सकती है.

    पहले रांची वीमेंस कॉलेज, मारवाड़ी कॉलेज और डोरंडा कॉलेज जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में हर साल हजारों छात्र इंटर में नामांकन लेते थे. अनुमान के मुताबिक इन कॉलेजों में करीब 90 हजार सीटें थीं, जो अब खत्म हो चुकी हैं. ऐसे में इन छात्रों का दबाव अब प्लस टू स्कूलों पर बढ़ेगा.

    राज्य में हर साल बड़ी संख्या में छात्र बेहतर शिक्षा और सुविधाओं की तलाश में बाहर का रुख करते हैं. अनुमान है कि 80 हजार से 1 लाख तक छात्र हर साल बिहार, राजस्थान, दिल्ली और ओडिशा जैसे राज्यों में पढ़ाई के लिए जाते हैं. इसका मुख्य कारण यहां शिक्षकों की कमी, प्रयोगशालाओं का अभाव और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए पर्याप्त माहौल का न होना है.

    चुनौतियां यहीं खत्म नहीं होतीं. कई स्कूलों में सीमित शिक्षक ही पूरे इंटर सेक्शन को संभाल रहे हैं. वहीं, ग्रामीण इलाकों में सीटें खाली रह जाती हैं, जबकि शहरों में एक-एक सीट के लिए कड़ी होड़ होती है. ऐसे में इस साल इंटर एडमिशन प्रक्रिया छात्रों और अभिभावकों दोनों के लिए काफी अहम और चुनौतीपूर्ण साबित हो सकती है.


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