स्कूल ऑफ एक्सीलेंस के दावे के बीच कस्तूरबा विद्यालयों का हाल! आखिर क्यों देर रात सड़क पर निकल पड़ी छात्राएं

    स्कूल ऑफ एक्सीलेंस के दावे के बीच कस्तूरबा विद्यालयों का हाल! आखिर क्यों देर रात सड़क पर निकल पड़ी छात्राएं

    Ranchi- एक तरफ सरकार निजी स्कूलों के तर्ज पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के लिए स्कूल ऑफ एक्सीलेंस का निर्माण का दावा कर रही है, चरणवद्ध तरीके से 4 हजार 496 उत्कृष्ट विद्यालय खोले जाने की तैयारी है, इसमें से 80 विद्यालयों की शुरुआत भी हो चुकी है. स्कूल ऑफ एक्सीलेंस को टाईगर जगरनाथ महतो का ड्रीम प्रोजेक्ट और झारखंड की शिक्षा व्यवस्था में आमूलचुक बदलाव का हेमंत सरकार का मास्टर स्ट्रोक माना जा रहा है. दावा किया जा रहा है कि यदि यह योजना जमीन पर उतर गयी तो झारखंड भी दिल्ली की तरह शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति लाने वाले राज्यों में शामिल हो जायेगा. जिसका सीधा लाभ यहां के आदिवासी मूलवासी और दूसरे वंचित समुदायों को मिलेगा.

    अब तक की जानकारी के अनुसार प्रारम्भ किये गये सभी 80 विद्यालयों में बेहद खूबसूरती के साथ इसका संचालनि किया जा रहा है. निश्चित रुप से झारखंड जैसे पिछड़े राज्य के लिए यह एक बड़ा कदम है, लेकिन इसके उलट एक दूसरी कहानी भी है. जो इसी झारखंड से आ रही है, और यह कोई पहली घटना नहीं है, वर्तमान सरकार हो या पिछली तमाम सरकारें इस तरह की खबरें मीडिया की सुर्खियां बनती रही है.

    कस्तूरबा कन्या विद्यालय, मांडर

    दरअसल हम यहां बात मांडर स्थित कस्तूरबा कन्या विद्यालय की कर रहे हैं. खबर यह है कि शनिवार की देर शाम इस स्कूल की छात्राएं एक साथ पैदल रोते हुए रांची डीसी से मिलने के लिए निकल पड़ी. देर शाम इस तरह छात्रों  को एक साथ सड़क पर देख कर पुलिस भी हैरान रह गयी. और उन सभी को रोक कर पूछताछ की जाने लगी. जैसे ही इसकी जानकारी मांडर प्रखंड विकास पदाधिकारी सुलेमान मंडरी को हुई, वह दौड़ते हांफते थाना पहुंचे, उसके बाद की कहानी सुन कर वह प्रखंड विकास पदाधिकारी की आंखें भी फटी रह गयी.  

    छात्राओं का विलाप

    छात्राओं के आंसू बंद होने के नाम नहीं ले रहे थें, सबकी एक ही व्यथा थी कि स्कूल में पढ़ाई नहीं होती, और इसकी वजह यह है कि वहां शिक्षक नहीं है, सिर्फ दो शिक्षकों के बदौलत विद्यालय का संचालन किया जा रहा है. पढ़ाई लिखाई के साथ ही रहने खाने की व्यवस्था भी काफी घटिया है, नास्ता कब मिलेगा और खाना के लिए कब तक इंतजार करना होगा, इसकी जानकारी देने वाला कोई नहीं है और जब इसकी शिकायत की जाती है तो दंड में छात्राओं को चार चार घंटे धूप में खड़ा कर दिया जाता है, ताकि कोई विरोध की हिम्मत नहीं कर सके. सभी छात्रों की एक ही जिद थी कि उन्हे डीसी से फरियाद लगानी है. अपनी पीड़ा बतानी है. लेकिन देर रात यह संभव नहीं था, वीडीओ सहित थाना प्रभारी लगातार छात्राओं को समझाने की कोशिश करते रहें, अपने स्तर से उनकी समस्याओं का समाधान करने का भरोसा दिलाते रहें. आखिरकार बड़ी मुश्किल से छात्राएं स्कूल वापस लौटने को तैयार हुई.

    यह कहानी सिर्फ एक कस्तूरबा विद्यालय की नहीं है

    सवाल यह है कि एक तरफ सरकार स्कूल ऑफ एक्सीलेंस के माध्यम से शिक्षा में बड़े बदलाव की तैयारी कर रही है, दलित आदिवासी और पिछड़ें वर्ग के बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए विदेश भेज रही है, तो दूसरी ओर परंपरागत स्कूलों की स्थिति में सुधार क्यों नहीं आ रही है. उनकी सूध क्यों नहीं ली जा रही है. ठीक है इन स्कूलों की बिल्डिंगों को स्कूल ऑफ एक्सीलेंस तरह भव्य नहीं बनाया जा सकता, लेकिन कम से कम गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की गारंटी तो दी ही जा सकती है, शिक्षकों की बहाली तो की ही जा सकती है. छात्राओं को उचित समय पर भोजन देने की व्यवस्था तो की ही जा सकती है, फिर इन कस्तूरबा विद्यालयों की स्थिति इतनी दयनीय क्यों है. और यह कहानी सिर्फ एक कस्तूरबा विद्यालय की नहीं है, हर बार किसी ना किसी कस्तूरबा विद्यालय से यही कहानी सामने आती रहती है. सिर्फ उसका नाम बदलता रहता है, इस  बार यह खबर मांडर से सामने आयी है, अगली बार किसी और से आयेगा.  


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