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अविनाश की विदाई के साथ ही राजेश ठाकुर पर भी मंडराया खतरा! 2024 के महासंग्राम के पहले किसी आदिवासी-मूलवासी पर कांग्रेस लगा सकती है दांव

BY -
Samiksha Singh
Samiksha Singh
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 15, 2026, 5:15:41 AM

Ranchi- तीन राज्यों में सियासी शिकस्त के बाद कांग्रेस के अंदर सांगठिक बदलाव की प्रक्रिया जारी है, एक बाद एक फैसले लिये जा रहे हैं, इसी क्रम में झारखंड कांग्रेस प्रदेश प्रभारी अविनाश पांडे को एक बड़े घटनाक्रम में प्रियंका गांधी के बदले यूपी का प्रभार सौंपा गया है. 2024 के महासंग्राम के ठीक पहले प्रियंका से यूपी कमान वापस लेकर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जून खड़गे ने साफ कर दिया है कि वह यूपी की सियासत को बेहद गंभीरता से ले रहे हैं, क्योंकि यदि कांग्रेस को सत्ता के आसपास भी पहुंचना है, तो उसे यूपी में अपनी पूरी ताकत झोंकनी होगी. और इसके साथ ही ऐसे चेहरे को भी आगे करना होगा जो सपा प्रमुख अखिलेश यादव  के साथ बेहतर तालमेल के साथ संगठन को धारदार बना सकें.

काफी अर्से से प्रियंका के हाथ में यूपी की कमान

यहां याद रहे कि यूपी की कमान काफी अर्से से प्रियंका गांधी के हाथ में थी, बावजूद इसके पार्टी जमीन पर संघर्ष करता नहीं दिख रहा था, हालांकि प्रियंका गांधी आज के दिन कांग्रेस का सबसे मजबूत चेहरा हैं, लेकिन यह भी एक हकीकत है कि प्रियंका यूपी में अपने आप को केन्द्रित नहीं कर पा रही थी, अब जब अविनाश पांडे को पार्टी की कमान सौंप दी गयी है, अजय राय और अविनाश पांडे की इस जोड़ी पर संगठन को धारदार बनाने की अहम जिम्मेदारी आ पड़ी है, हालांकि सामाजिक समीकरण के हिसाब से देखे तो दोनों ही सवर्ण चेहरे हैं, इस हालत में पिछड़ों और दलितों के बीच पार्टी का चेहरा कौन होगा एक अहम सवाल है? लेकिन इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि सवर्ण मतदाता जो हालिया दिनों में एकमुस्त रुप से भाजपा के साथ खड़ा था, पार्टी भाजपा के इस कोर वोटर में सेंधमारी करने का प्रयास कर सकती है. रही बात पिछड़े-दलित और अल्पसंख्यकों कि तो अखिलेश यादव के साथ इंडिया गठबंधन के दूसरे घटक दल इस कमी को दूर कर सकते हैं.

राजेश ठाकुर पर लटक सकती है तलवार

इधर झारखंड से अविनाश पांडेय की विदाई के साथ ही प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राजेश ठाकुर पर तलवार लटकता नजर आने लगा है. और इसका संकेत खुद नवोनित प्रदेश प्रभारी बनाये गये गुलाम अहमद मीर ने दे दिया है, पदभार ग्रहण करते ही मीर ने इस बात का एलान किया है कि जमीनी स्तर पर संघर्ष करने वाले नेताओं  के लिए संगठन के दरवाजे खोले जायेंगे. जमीनी कार्यकर्ताओं को संगठन में तरजीह देगी. दरअसल यूपी की तरह ही झारखंड में भी संगठन को सख्त ऑपरेशन की जरुरत है. भले ही आज सरकार में पार्टी की हिस्सेदारी हो, लेकिन यह एक कटू सच्चाई भी है कि संगठन के स्तर पर पार्टी कमजोर है. केन्द्रीय आलाकमान के द्वारा जो मुद्दे तय किये जाते हैं, आज के दिन संगठन इस हालत में नहीं है कि वह उन मुद्दों को जमीन तक उतार सके. इसका एक उदाहरण जातीय जनगणना की मांग है, जिसे पूरे भारत में जोर शोर से राहुल गांधी उठा रहे हैं, लेकिन सवाल यह है कि कांग्रेस की ओर से झारखंड में इस मुद्दे पर कितनी चर्चा हुई, क्या किसी भी कांग्रेसी नेता के द्वारा इस मुद्दे पर अपनी ही सरकार को घेरने की रणनीति बनाई गयी, ताकि दलित पिछड़ों के बीच यह व्यापक संदेश जाय कि कांग्रेस इस मुद्दे के प्रति बेहद गंभीर है, और राहुल गांधी सिर्फ हवा हवाई बात नहीं कर रहे हैं, बल्कि कांग्रेस इस मुद्दे को लेकर जमीन पर संघर्ष भी करती दिख रही है. इसका कारण यह है कि पार्टी के पास व्यापाक जनाधार वाले चेहरे का अभाव है.

आदिवासी मूलवासी का राग, लेकिन पार्टी में इन सामाजिक समूहों से आने वाले चेहरे का अभाव

आदिवासी-मूलवासी बहुल झारखंड में आज भी पार्टी के पास कोई ऐसा चेहरा नहीं है, जो जिसका इन सामाजिक समूहों में पकड़ हो, जिसके बूते पार्टी दलित,पिछड़ों और आदिवासी समुदाय को अपने साथ खड़ा कर सके, सिर्फ आदिवासी-मूलवासी का राग अलापने से ही इन सामाजिक समूहों का पार्टी से नहीं होगा, इन सामाजिक समूहों की ओर से पार्टी से लेकर संगठन तक में अपने चेहरे की तलाश होगी, जब वह देखेगा कि यह तो सिर्फ एक नारा है, लेकिन हालत यह है कि पार्टी से लेकर संगठन में उनके चेहरे नहीं है, तो वह इन नारों पर विश्वास क्यों करेगा. हालांकि बीच-बीच में झारखंड में चेहरा बदलने की चर्चा जरुर होती रही है, लेकिन तमाम चर्चाओं के बावजूद कोई निष्कर्ष तक नहीं पहुंचा गया.  यदि पार्टी को पैन झारखंड की पार्टी बननी है तो  उसे संगठन के अंदर से नये चेहरों को सामने लाना होगा, और खासकर इन सामाजिक समूहों से आने वाले युवाओं पर दांव लगाना  होगा. ऐसा भी नहीं है कि पार्टी के पास चेहरों की कमी है, जरुरत बस उन चेहरों को सामने लाकर उस पर विश्वास जताने की है. ताकि आम कार्यकर्ताओं तक यह संदेश जाय कि पार्टी उनकी आकांक्षाओं और हिस्सेदारी को लेकर फिक्रमंद है.  

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