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“मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है” अशोक महतो का ललन सिंह को खुली चुनौती, जानिए क्या है मुंगेर का सामाजिक समीकरण और लालू ने क्यों खेला यह दांव?

BY -
Devendra Kumar CW
Devendra Kumar CW
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 16, 2026, 5:26:19 AM

Ranchi-“रैली से रैला”,“गरीब रैली” तो कभी “तेल पिलावन लाठी घुमावन रैली” के सहारे बिहार की सियासी डिक्शनरी में नये-नये देशज शब्द जोड़ते रहे लालू यादव काफी अर्से के बाद एक बार फिर से पूरे मिजाज नजर आ रहे हैं. लालू के इस मिजाज से ना सिर्फ भाजपा हैरान-परेशान है, बल्कि इंडिया गठबंधन का सबसे बड़ा घटक कांग्रेस भी हलकान है. लालू इस बार कोई कसर छोड़ने को तैयार नहीं है, हार की रत्ती भर भी गुंजाइश छोड़ना नहीं चाहते और  इसी सियासी प्रयोग में ललन सिंह के किले में मुंगेर से उस अशोक महतो को उतारने का एलान कर दिया, जिस अशोक महतो का कभी नवादा, नालंदा और शेखपुरा जिलों में अपराध का डंका बजता था. 17 वर्षों के बाद 10 दिसंबर 2023 को कालकोठरी से बाहर आते वक्त अशोक महतो ने कल्पना भी नहीं की होगी कि सामने सियासत दुनिया उसका इंतजार कर रही है.

ऊंची जातियों का डॉन तो दलित-पिछड़ों का रॉबिनहुड

दरअसल जिस अशोक महतो को भाजपा और जदयू खेमा एक डॉन के रुप में प्रचारित-प्रसारित करने की कोशिश कर रही है, पिछड़ी जातियों के बीच उसकी छवि रॉबिनहुड की है. दावा किया जाता है कि नवाद, गया, जहानाबाद, नालंदा और शेखपुरा जिले के साथ ही मगध में ऊंची जातियों के सामाजिक और सियासी वर्चस्व के खिलाफ अशोक महतो ने मोर्चा खोला था. उस दौर में वह पिछड़ी जातियों की आवाज बन कर सामने आया था. और इसके साथ ही कई मामले उसके साथ जुड़ते चले गयें. इसमें एक बड़ा मामला नवादा जेल ब्रेक कांड का था. साफ है कि अशोक महतो को लेकर अलग-अलग सामाजिक समूहों की अपनी दावेदारी और तर्क है, लेकिन इतना तय है कि अशोक महतो अपराध की दुनिया का कोई पहला चेहरा नहीं है, जिसकी सियासी इंट्री होने वाली है. इसका दूसरा सबसे बड़ा उदाहरण आनन्द मोहन हैं. दलित आईएएस अधिकारी कृष्णैया की हत्या में सजायाफ्ता  आनन्द मोहन भी आज जदयू के साथ खड़े हैं. पत्नी लवली आनन्द को शिवहर से चुनावी अखाड़े में है. यदि अपराधियों के सियासी इंट्री पर सवाल खड़ा किया जायेगा तो उसकी जद में आनन्द मोहन भी आयेंगे, और इसके साथ ही नीतीश कुमार की  मंशा पर भी सवाल खड़ा किया जायेगा. क्योंकि अशोक महतो तो अपनी सजा की मियाद पूरी कर ली है, लेकिन आनन्द मोहन की रिहाई के लिए तो नीतीश कुमार को बिहार जेल मैनुअल में ही बदलाव करना पड़ा. साफ है कि सियासी दलों के द्वारा  सियासत का अपराधीकरण का आरोप- प्रत्यारोप अपनी-अपनी सुविधा के अनुसार लगाया जाता है, इस मामले में भी यही हो रहा है.

लालू ने क्यों खेला यह दांव?  

लेकिन यहां सवाल यह है कि लालू यादव ने यह दांव क्यों खेला? तो इसका जवाब है कि मुंगेर लोक सभा में आने वाले मुंगेर, जमलापुर, सूर्यगढ़ा, लखीसराय, मोकमा और बाढ़ में से किसी भी विधान सभा में आज तीन पर भाजपा का कब्जा है, जबकि दो पर राजद और एक पर कांग्रेस का कब्जा है. मुंगेर से भाजपा के प्रणव कुमार यादव, जमालपुर से कांग्रेस के अजय कुमार सिंह, सुर्यगढ़ा से राजद के प्रह्लाद यादव, लखीसराय से भाजपा के विजय कुमार सिन्हा, मोकाम से राजद के नीलम देवी और बाढ़ से भाजपा के ज्ञानेन्द्र कुमार सिंह विधायक है. इस प्रकार मामला तीन तीन पर है, लेकिन बदले सियासी समीकरण में नीलम देवी अब भाजपा के साथ खड़ी है. दूसरी सच्चाई है कि इस सीट से राजद को अब तक महज दो बार सफलता मिली है, पहली सफलता 1998  में विजय कुमार यादव और दूसरी सफलता 2004 में जयप्रकाश नारायण यादव ने दिलवायी थी. 2004 के बाद से राजद को यहां लगातार हार का सामना करना पड़ा रहा है. हालांकि 2009 में राम बदन राय और 2014 में प्रगति मेहता को अखाड़े में उतारा गया, लेकिन सफलता नहीं मिली.

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क्या कहता है कि मुंगेर का सामाजिक समकीरण

अशोक महतो को आगे तक राजद इसी सूखे को समाप्त करना चाहता है, और अशोक महतो इसका बड़ा हथियार साबित हो सकते हैं, और उसका कारण है कि मुंगेर का सामाजिक समीकरण. एक आकलन के अनुसार मुंगेर लोकसभा में यादव-10 फीसदी, कुर्मी महतो-7 फीसदी, पासवान-6 फीसदी और अल्पसंख्यक-5 फीसदी है. लालू यादव की रणनीति इस बार कुर्मी पर दांव लगाकर 10 फीसदी यादव,पांच फीसदी अल्पसंख्यक और दूसरी पिछड़ी जातियों की गोलबंदी तैयार करने की है. हालांकि पिछड़ों और दलितों की गोलबंदी दूसरे किसी चेहरे के सहारे भी की जा सकती थी, लेकिन चूंकि अशोक महतो की छवि पिछड़ी जातियों के बीच एक रॉबिनहुड की है, जो ऊंची जातियों के वर्चस्व के खिलाफ बेबाकी से अपनी आवाज उठाता रहा है, दलित-पिछड़ी जातियों होते रहे जुल्म का प्रतिकार करता रहा है. लालू ने इस बार किसी यादव पर दांव दांव लगाने के बजाय अशोक महतो के सहारे कुर्मी मतदाताओं को अपने पाले में खड़ा करने की रणनीति तैयार की. बावजूद इसके छह फीसदी पासवान को साधना राजद की बड़ी चुनौती होगी. और देखना दिलचस्प होगा कि इस बार पासवान जाति किसके साथ खड़ा होता है, और शायद यही कारण है कि लालू और चिराग पासवान के चाचा पशुपति पारस के बीच गुपचुप मुलाकात की खबरें भी आ रही हैं.  हालांकि चिराग के सामने पशुपति कितना असरदार होंगे, यह एक बड़ा सवाल है. लेकिन इतना साफ है कि लालू यादव ने अपने सियासी तीर से मुंगेर की लड़ाई को दिलचस्प बना दिया है, पूरी लड़ाई अब बैकवार्ड फोरवर्ड की होती नजर आ रही है और शायद यही कारण है कि अशोक महतो “मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है” का नारा उछाल ललन सिंह को पिछड़ा दलित विरोधी साबित करने की राह पर चलते नजर आ रहे हैं, यानि वोट पिछड़ों और दलितों और किला ललन सिंह का. इसका सियासी नतीजा जो भी हो, लेकिन इस जंग में अशोक महतो की शादी जरुर हो गयी, इधर मंगनी की रस्म पूरी हई और उधर पत्नी अनिता कुमारी महतो के हाथ में राजद का लालटेन था. 

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