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"ये दुनिया गद्दारों का है साहब यहां हुनर नहीं चापलूसी के सिक्के चलते है " मंत्री पद की बेचैनी या विधायक इरफान को ‘वैलेंटाइन डे’ पर याद आया पुराना किस्सा

BY -
Devendra Kumar CW
Devendra Kumar CW
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 14, 2026, 4:25:50 AM

Ranchi-अक्सर अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर भाजपा को निशाने पर लेते रहे जामताड़ा विधायक इरफान ने इस बार वैलेंटाइन डे के अवसर पर अपने अंदर की पीड़ा को बेहद ही खूबसूरत अल्फाजों में इजहार किया है, उन्होंने लिखा है कि “ये दुनिया-बाजार गद्दारों का है साहब, यहाँ हुनर के नहीं, चापलूसी के सिक्के चलते है” जैसे ही सोशल मीडिया पर यह ट्वीट आया, उनकी इस बेबसी, पीड़ा और दर्द को एक साथ कई चश्मों से  पढ़ने- समझने की कोशिश शुरु हो गयी. किसी ने सियासी चश्में के साथ इस पीड़ा को समझने का प्रयास किया, तो किसी ने  वैलेंटाइन डे से जोड़ते हुए इस दर्द को पढ़ने की कोशिश की. सवाल खड़ा किया गया कि जब आज पूरी दुनिया "वैलेंटाइन डे" की खुशियों में सराबोर है. उस हालत में डाक्टर इरफान का यह लिखना कि "ये दुनिया-बाजार गद्दारों का है, साहब यहाँ हुनर नहीं चापलूसी के सिक्के चलते है" के आशय क्या है, आखिर इस पीड़ा का इजहार के लिए वैलेंटाइन डे को ही क्यों चुना गया? क्या उनके सीने के अंदर भी किसी अधूरे प्यार दर्द का सिमटा है? और क्या यह तंज अपनी नाकाम मुहब्बत पर मारा गया एक ताना था, यह बताने की कोशिश थी कि हमने तो अपनी हर कुर्बानी तेरे नाम की, यह तो तुम ही थी जो बेवफा निकली.

मंत्री पद नहीं मिलने की निराशा                       अब इसका सही जवाब तो डाक्टर इरफान के पास ही होगा, वैसे भी वह डाक्टर है. इस दर्द की बेहतरीन दवा तो उन्ही के पास होगी, लेकिन कई लोग इस दर्द को राज्य के वर्तमान सियासी हालात से भी जोड़कर देखने की कोशिश करने लगे, उनका मानना है कि डाक्टर इरफान के सीने में अधूरे प्यार की कोई दास्तान नहीं, अधूरी राजनीति का दर्द छुपा है, जो हर मंत्रिमंडल विस्तार के साथ उनके सीने में उफान मारता है, और हर बार निराशा ही हाथ लगती है. इस बार भी उनकी कोशिश किसी भी तरीके से मंत्रिमंडल में अपना जुगाड़ बिठाने की थी, लेकिन झारखंड प्रदेश प्रभारी गुलाम अहमद मीर और कांग्रेस अध्यक्ष राजेश ठाकुर इस बार भी एन वक्त पर लंगड़ी मार गए,  उनकी इस  पुरानी मुराद के सामने दीवार बन कर खड़े हो गयें, हेमंत के साथ अपनी नजदीकियों का बखान और अपने आप को हनुमान बताने के बावजूद एक अदद मंत्री पद का जुगाड नहीं हो सका। और तो और जिस तरीके से अपने को हेमंत का हनुमान बताया, उसके बाद कांग्रेस के अंदर से ही संदेह की नजर से देखा जाने लगा, आलाकमान को लगा कि यह तो पार्टी  के बजाय हेमंत की तरफदारी में जुटे हैं, इस हालत में इनको मंत्री बनाने का मतलब  प्रकारान्तर से झामुमो के ही किसी नेता को मंत्री बनाना, इस हालत में हमारे कार्यकर्ताओं की चाहत का क्या होगा? झारखंड में कांग्रेस की जमीन मजबूत करने के सपने का क्या होगा. और कहा जाता है कि इस बयान के बाद मीर ने डाक्टर इरफान को किनारा करने का मन बना लिया, इस प्रकार उनके सामने मंत्री पद की कुर्सी एक बार फिर से खिसक गयी, और उसके बाद इरफान इस दर्द को बयां करते फिर रहे हैं. लेकिन यह तो कांग्रेस है, और भी झारखंड कांग्रेस, यहां भला सुनने सुनाने की परंपरा ही कब रही है, और यदि रहा होता, तो राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा का यह हस्र होता, इनके रणनीतिकार तो हवा हवाई सपने में जीने वाले लोग है, सामाजिक समीकरण और जमीनी हकीकत से इनका लेना क्या और देना क्या, बस चापलूसी की आरती उतारो और आगे बढ़ो, यही कांग्रेस की परिपाटी कल भी थी आज भी है। रही बात इरफान की, तो लगता नहीं की पंजे की यह सवारी लंबी चलने वाली है, इरफान के सपनों को पंख आजसू से लेकर जेएमएम में भी मिल सकता है।आखिर जब कांग्रेस उनके सपनों को ढोने को तैयार नहीं तो इरफान कांग्रेस का सपना अपनी पीठ पर लेकर क्यों घूमते रहें।

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