80 साल के हुए दिशोम गुरु: जानिए झारखंड आंदोलन के इस मुखिया को, जिसने जंगलों में रहकर महाजनों के खिलाफ छेड़ दी थी जंग

    80 साल के हुए दिशोम गुरु: जानिए झारखंड आंदोलन के इस मुखिया को, जिसने जंगलों में रहकर महाजनों के खिलाफ छेड़ दी थी जंग

    टीएनपी डेस्क(Tnp Desk):- झारखंड के वजूद में आए दो दशक बीत गये हैं. लेकिन एक नेता हैं, जो इसके लिए जीवन भर संघर्ष किया और अलग राज्य का अलख अपनी जवानी से बुढ़ापे तक जगाए रखा. कम उम्र में ही महजानों की साजिश से उसकी पिता की हत्या कर दी गई, उनके वर्चस्व को तोड़ने और आम आदिवासियों को उसके चंगुल से निकालने के लिए पहाड़ों-जंगलों में छुपकर लोहा लेते रहें. लेकिन, अपना मकसद और संघर्ष कभी नहीं भूला औ न ही छोड़ा. आज झारखंड में उन्हें बड़े अदब से दिशोम गुरु का दर्जा दिया जाता है. गुरुजी के नाम से पुकारा जाता और मौजूदा वक्त में राज्य की कमान उनके बेटे हेमंत सोरेन के हाथों में ही हैं. इन इशारों से ही मालूम हो गया होगा हम किसकी चर्चा कर रहें हैं. दरअसल, वो किसी पहचान के मोहताज नहीं है, बल्कि शिबू सोरेन उनका नाम है, जिन्हें जल, जंगल और जमीन के प्रदेश में लगभग सभी कोई जानते हैं.

    नेमरा गांव में हुआ था जन्म

    दिशोम गुरु शिबू सोरेन आज यानि 11 जनवरी को अपना 80 वां जन्मदिन मना रहे हैं. उनका जन्म वर्तमान में रामगढ़ जिसे के नेमरा गांव में 1944 में हुआ था. उस वक्त के हालात अच्छे नहीं थे, गांव में महाजनों-साहूकारों का आंतक था. जो जबरन आदिवासियों की जमीनों पर कब्जा कर जोता करते थे. इस दमन और शोषण का खामियाजा शिबू सोरेन के पिता सोबरन सोरेन ने भी भुगता. जिनकी महाजनों ने 27 नवंबर 1957 को हत्या कर दी थी. स्कूल में पढ़ रहे शिबू का मन दहल गया और इनके खिलाफ बगावत की ज्वाला भड़क गई. आदिवासी समाज को इनके चंगुल से आजाद कराने के लिए संकल्प लिया. 18 साल की उम्र में संथाल नवयुवक संघ का गठन किया. महाजनों-साहूकारो के खिलाफ जंगलों और पारसनाथ की पहाड़ियों में छुपकर भी उन्होंने संघर्ष किया. उनके इस हक की लड़ाई में आम आदावासी समाज उनके साथ जुड़ता गया. वो वक्त अविभाजित बिहार का था औऱ झारखंड के अलग राज्य की मांग भी तेज होने लगी थी. शिबू सोरेन पर लोगों को एतबार बढ़ने लगा था. 1972 में बंगाली मैक्सिस्ट ट्रेड यूनियन के नेता एके रॉय, कुर्मी-महतो नेता बिनोद बिहारी महतो और संताल नेता शिबू सोरेन ने झारखंड मुक्ति मोर्चा का गठन किया. सोरेन झामुमो के महासचिव बनें. झारखंड मुक्ति मोर्चा ने उस दौरान आदिवासियों की छीनी गई जमीन को वापस पाने के लिए आंदोलन चलाया. उन जमीनों पर जबरन कटाई भी शुरु कर दी . शिबू सोरेन ने जमींदारों और साहूकारों के खिलाफ कभी-कभी अपने अदालतें आयोजित करके इंसाफ देने के लिए जाने जाते थे. अलग राज्य झारखंड को लेकर भी आंदोलन अहिस्ते-अहिस्ते आगे बढ़ रहा था

    दुमका से बनें पहली बार सांसद

    1977 में पहली बार शिबू सोरेन ने लोकसभा चुनाव लड़ा था. लेकिन, उनको पराजय का सामना करना पड़ा .इसके बाद 1980 में दुमका से लोकसभा का चुनाव लड़ा और जीत गये . पहली बार उन्होंने दिल्ली दरबार में अपनी हाजिरी लगाई . इसके बाद वह 1989,1991 और 1996 में भी लोकसभा में चुने गये. 2002 में वह राज्यसभा के लिए चुने गये. उसी साल उपचुनाव में दुमका लोकसभा सीट जीती और अपनी राज्यसभा सीट से इस्तीफा दे दिया.

    जब निकला था गिरफ्तारी वारंट

    मनमोन सिंह सरकार के वक्त शिबू सोरेन केन्द्रीय कोयला मंत्री थे. उस वक्त तीस साल पुराने चिरुडीह मामले में उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट निकला था और इस्तीफा देने के लिए बोला गया था. दरअसल, 23 जनवरी 1975 को आदिवासियों और मुसलमानों के बीच झड़प में 10 लोगों की हत्या हुई थी. इसी मामले में उनका गिरप्तारी वारंट निकला था. इसके चलते शिबू सोरेन भूमिगत हो गये थे. हालांकि, 24 जुलाई 2004 को इस्तीफा दे दिया था. हालांकि, बाद में जमानत पर रिहा हो गये थे औऱ मंत्रीमंडल में शामिल हो गये थे.

    आजीवन कारावास और बरी

    राजनीतिक करियर में शिबू सोरेन को आजवीन कारवास की सजा भी सुनाई गई और बाद हाईकोर्ट ने बरी भी कर दिया था. दरअसल, यह मामला 28 नवंबर 2006 का है. जब सोरेन पर पूर्व निजी सचिव शशिनाथ झा के अपहरण और हत्या से जुड़े बारह साल पुराने मामले में दोषी पाया गया था. ऐसा दावा किया गया था कि 22 मई 1994 को दिल्ली के धौला कुआं इलाके से शशिनाथ झा का अपहरण किया गया था और रांची के पास पिस्का नगरी ले जाकर उनकी हत्या कर दी गई थी. सीबीआई के आरोप पत्र में बोला गया था कि जुलाई 1993 के अविश्वास प्रस्ताव के दौरान नरसिम्हा राव सरकार को बचाने के लिए कांग्रेस और झामुमो के बीच कथित सौदे के बारे में झा को जानकारी थी. इसे लेकर सोरेन से एक बड़ी राशि मांगी जा रही थी.भारत सरकार के किसी केन्द्रीय मंत्री का हत्या में शामिल होने का दोषी पाए जान का यह पहला मामला था. 5 जनवरी 2006 को शिबू सोरेन को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई. हालांकि, 23 अगस्त 2007 को दिल्ली हाई कोर्ट ने जिला न्यायालय के फैसले को खारिज कर दिया और सोरेन को बरी कर दिया. कोर्ट का मानना था कि ट्रायल कोर्ट का विश्लेषण ठोस और टिकाऊ नहीं है.

    जब मुख्यमंत्री बनें शिबू सोरेन

    अपनी सियासी सफर में कई उतार-चढ़ाव देखने वाले दिशोम गुरु का वो वक्त भी आया. जिसकी ख्वाहिश लंबे अरसे से रही . अलग झारखंड की मांग का आंदोलन तेज होने के बाद 15 नवंबर 2000 को झारखंड अलग राज्य का गठन हुआ. शिबू सोरेन राज्य के पहले मुख्यमंत्री तो नहीं बनें. लेकिन 2005 विधानसभा चुनाव के बाद 2 मार्च 2005 को पहली पर उनकी तमन्ना पुरी हुई. वैसे उनका सपना ज्यादा दिन तक स्थायी नहीं रहा. संख्या बल कम रहने के चलते उन्हें इस्तीफा देना पड़ा. दूसरी बार 27 अगस्त 2008 को गुरुजी मुख्यमंत्री बनें. उन्हें छह महीने के भीतर किसी भी सीट से विधायक बनना था. तमाड़ सीट से चुनाव लड़ते हुए 9 जनवरी 2009 को मुख्यमंत्री रहते चुनाव हार गये, जिसके चलते उन्हें इस्तीफा देना पड़ा . इसी साल फिर 30 दिसंबर को शिबू सोरेन को फिर से मुख्यमंत्री बनाया गया. लेकिन, 2010 में उनकी सरकार गिर गई. शिबू सोरेन कभी भी झारखंड के मुख्यमंत्री के तौर पर अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके. झारखंड आंदोलन के मुखिया शिबू सोरेन हमेशा जनता की पसंद बने रहे. इसका उदाहरण तब देखने को मिला जब 2014 में देश में मोदी लहर थी. उस लहर में भी शिबू सोरेन दुमका से सांसद बनें. 2019 में उनकी इस सीट से हार हुई. मौजूदा समय में गुरु जी झामुमो से राज्यसभा के सांसद हैं

    अपनी जिंदगी में संघर्ष करने वाले और राजनीतिक करियर में तमाम झंझावतों से जुझने वाले शिबू सोरेन ने काफी तजुर्बा बटोरा. जीवन के 80 साल पूरा कर चुके शिबू सोरेन के दूसरे बेटे हेमंत सोरेन मौजूदा समय में झारखंड के मुख्यमंत्री हैं. जबकि, उनके छोटे बेटे बसंत सोरेन दुमका से विधायक है, जबकि उनकी पुत्र वधु सीता सोरेन भी जामा विधानसभा से विधायक हैं.

    रिपोर्ट- शिवपूजन सिंह 


    the newspost app
    Thenewspost - Jharkhand
    50+
    Downloads

    4+

    Rated for 4+
    Install App

    Our latest news