झारखंड के लोगों को भा रहा मोमोज का स्वाद, गली,मुहल्लों और बजारों में खूब हो रही बिक्री, जानिए कैसे भारत पहुंचा ये फूड 

    झारखंड के लोगों को भा रहा मोमोज का स्वाद, गली,मुहल्लों और बजारों में खूब हो रही बिक्री, जानिए कैसे भारत पहुंचा ये फूड 

    टीएनपी डेस्क (Tnp desk):- पहाड़, जल,जंगल और जमीन के प्रदेश झारखंड में तो अलग-अलग तरह के पकवान, खान-पान है. इसके स्वाद के भई क्या कहने. लेकिन, इन दिनों शहरों और गांवों के होटलों, ठेलों में मोमोज भी खूब बिक रहा है. भांप से बनाया जा रहा ये व्यंजन इतना भा रहा है कि लोग इसे चटखारे लेकर खा रहें हैं. यहां लोगों के मन में सवाल उठ रहा है कि समोसा, आलू चोप, बड़ा, चोमिन के बाद अचानक मोमोज की इतनी लोकप्रियता कैसे बढ़ गई . आखिर ये कहां से आ गया और लोगो की फेवरेट डिश बन गया . आटे या फिर मैदे से बनने वाले इस व्यंजन के अंदर हरी सब्जियां या फिर चिकन, मटन भी डाला जाता है. इसके चलते इसे सभी लोग खा सकते हैं. 

    कब भारत में आया मोमोज 

    बताया जाता है कि भारत में मोमोज का आगमन 1960 के दशक में हुआ. इसके आने के पीछे तिब्बतियों को माना जा रहा है. जब चीन के अधिपत्य के बाद बहुत बड़ी संख्या में भारत में पलायन कर गये थे. उनके साथ ही मोमोज भी भारत आ गया था. शुरुआती समय में मोमोज का स्वाद भारत के पूर्व क्षेत्र सिक्किम, मेघालय, पश्चमि  बंगाल के दार्जिलिंग और कलिमपोंग के पहाड़ी इलाकों में पहुंचा. इसके बाद जैसे-जैसे इसका स्वाद लोगों की जबान को लगा. इसकी पॉपुलरिटी बढ़ते गई और इसकी बिक्री भी बढ़ती गई. धीरे-धीरे यह गांव, शहर और कस्बों से लेकर मेट्रो शहर तक में इसकी दस्तक हो गई. झारखंड में भी ऐसे ही मोमो पहुंचा, पिछले पांच साल में तो इसकी संख्या काफी बढ़ी है , औऱ अब तो ये पसंदिदा फूड यहां का बनता जा रहा है.  

    चाइनीज फूड नहीं है मोमो 

    आमूमन लोग इसे चाईनीज फूड मान लेते हैं, जबकि ये हकीकत से इसका फासला काफी दूर है. इसका नाम चाइनीज होने के चलते लोगों को भ्रम हो जाता है. मोमो चाईनीज शब्द है ये बिल्कुल सही, इसका अर्थ भांप से पकी हुई रोटी होती है. लेकिन, असलियत में यह नेपाल और तिब्बत का डिश है. इसका आकार देखने में पहाड़ जैसा बनता है. इसके बारे में बोला जाता है कि यह अरुणाचल प्रदेश के मोनपा और शेरदुकपेन जनजाति के खानपान का एक अहम हिस्सा है. यह जगह तिब्बत की सरहद से बिल्कुल लगी हुई है. यहां के लोग मोमोज को पोर्क, सरसों की पत्तियों और हरी सब्जियों  को भरकर तैयार करते हैं. 

    लोगों को मिल रहा रोजगार 

    मोमोज बेचकर लोग आज अच्छा खासा पैसे के साथ रोजगार अर्जीत कर रहें हैं. यह कम बजट में भी शुरुआत किया जा सकता है. जो ठेले के साथ-साथ रेस्तरां में भी बिकता है. इसकी कीमत वेज औऱ नॉन वेज के हिसाब से घटती-बढ़ती रहती है. 
    झारखंड में जो मोमोज मिलते हैं उनमे शाकाहारी लोग सब्जियां या फिर पनीर से भरे मोमोज खाते हैं. वही, जो लोग मांसाहारी होते हैं, वो चिकन, मटन से भरकर बनाए मोमोज पसंद करते हैं. अब तो इसकी वेरायटी भी बढ़ने लगी है, जिसमे तंदूरी मोमोज, अफगानी मोमोज, कुरकुरे मोमोज तक मिलने लगे हैं. 
    सबसे बड़ी बात तो ये है कि इसे घर में भी लोग बनाकर खा सकते हैं. इसके लिए ज्यादा खर्च भी नहीं होता. भारत में शायद ही ऐसा कोई क्षेत्र हो जहां मोमोज नहीं खाया जाता है.  दिन पर दिन खाने वालों की संख्या काफी बढ़ती ही जा रही है. झारखंड में भी  मोमोज लोगों का फेवरेट व्यंजन बन रहा है.


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