जंग से पहले हार! गोपाल प्रसाद साहू और सौरव नारायण सिंह ने चाटा धूल तो क्या कर लेगी अम्बा! आरएसएस को कटघरे में खड़ा कर सियासी हवा तो नहीं बना रही कांग्रेस

    जंग से पहले हार! गोपाल प्रसाद साहू और सौरव नारायण सिंह ने चाटा धूल तो क्या कर लेगी अम्बा! आरएसएस को कटघरे में खड़ा कर सियासी हवा तो नहीं बना रही कांग्रेस

    Tnpdesk-ईडी की छापेमारी के बाद जिस तरीके से अम्बा प्रसाद ने आरोपों की बौछार की है. अपने को सांस्कृतिक गतिविधियों तक सीमित तक रखने का दावा करने वाले आरएसएस और संघ परिवार पर भाजपा की ओर से बैटिंग का गंभीर आरोप लगाया. इस बात का दावा ठोका है कि उस पर लोकसभा चुनाव में पंजा का साथ छोड़ कर कमल की सवारी का दवाब बनाया जा रहा था और इस पूरी कवायद के पीछे भाजपा नेताओं के साथ ही संघ परिवार के कार्यकर्ताओं की मिली भगत थी. उसके आवास पर हर दिन संघ परिवार के कार्यकर्ता जमघट लगता था, कभी चतरा तो कभी हजारीबाग से चुनाव लड़ने का ऑफर दिया जाता था. तरह तरह के सियासी प्रलोभन दिये जा रहे थें. जबकि उनकी ओर से यह साफ की कोशिश की जा रही थी कि उनके परिवार का कांग्रेस के साथ खून का रिश्ता है. बावजूद इसके, संघ अपनी हार मानने को तैयार नहीं था. कम से कम इस बात को स्वीकार करने को तो कतई तैयार नहीं था कि हजारीबाग के सियासी मैदान में अम्बा की इंट्री हो. भाजपा का वह किला जहां 1984 के बाद कांग्रेस सूखे का शिकार है. भाजपा किसी भी हालत में इस सूखे को खत्म होने नहीं देना चाहती थी. लेकिन जैसे ही यह खबर सामने आयी कि हजारीबाग के किले में अम्बा की इंट्री होने वाली है. अब बस उसकी औपचारिक घोषणा बाकी है. मनीष जायसवाल का संसद पहुंचने का सपना एक टेढ़ी खीर होने वाला है. ईडी की इंट्री हो गई. हमारे आवास से लेकर दूर के रिश्तेदारों के आवासों को खंगाला जाना लगा. हालत यह थी कि अभी मेरी नींद ही खूली थी, अभी बेड से बाहर भी नहीं निकली थी, अलसाई अवस्था में चाय का इंतजार ही कर रही थी कि ईडी अधिकारी हमारे बेड के पास खड़े थें और उसके बाद मैं जिस अवस्था में थी, उसी हालात में दिन भर उनके सवालों का जवाब देती रही. लेकिन यह सारे सवाल जवाब महज एक बहाना था, असली निशाना कुछ और था.

    क्या है कमल की सवारी और ईडी की छापेमारी के बीच का रिश्ता?

    हालांकि कमल की सवारी का दवाब और ईडी की इस छापेमारी के बीच कोई सीधा रिश्ता नजर नहीं आता. लेकिन जिस तरीके से अम्बा इन दोनों घटनाओं को आपस में जोड़ सियासी बैटिंग करती नजर आ रही हैं. लोकसभा चुनाव की डुगडुगी बजने के पहले भाजपा को बचाव की मुद्रा में लाकर खड़ा कर दिया है. उसके बाद सियासी गलियारों में इस पर बहस तेज हो चुकी है. अम्बा के दावों की पड़ताल शुरु हो गयी है. इस बात का आकलन किया जाने लगा है कि क्या वाकई अम्बा की इंट्री से मनीष जायसवाल का कांटा फंसने जा रहा है. क्या वाकई मनीष जायसवाल की डगर मुश्किल होने वाली थी. पक्ष विपक्ष के अपने-अपने दावे हैं. अम्बा के आरोपों को महज सियासी शगूफा मानने वालों का तर्क है कि हजारीबाग भाजपा का वह किला है. जहां कथित मोदी लहर के पहले ही भाजपा कांग्रेस को मैदान से करने का दम खम दिखला चुकी है, और 1984 के बाद आज भी वहां कांग्रेस अपनी वापसी के इंतजार में है. इस बीच एक से बढ़कर एक सियासी सूरमाओं को मैदान में उतारा गया. गोपाल प्रसाद साहू से लेकर सौरव नारायण सिंह की बैटिंग हुई, लेकिन भाजपा के इस किल में ये सारी सूरमा दम तोड़ गयें. फिर इस अम्बा में ऐसा क्या है, जिसके लिए संघ परिवार इस हद तक बिछा जा रहा था.

    लोकप्रियता की पहाड़ पर खड़ी है अम्बा

    लेकिन अम्बा के दावों समर्थकों का दावा है कि गोपाल प्रसाद साहू और सौरव नारायण सिंह की तुलना अम्बा प्रसाद से करना एक सियासी भूल है. अम्बा आज हजारीबाग में जिस लोकप्रियता की पहाड़ पर खड़ी है, युवाओं के बीच अम्बा का जो क्रेज है, किसी भी दौर में गोपाल प्रसाद साहू और सौरव नारायण उसके आसपास भी खड़े नहीं थें. अम्बा का ना सिर्फ चेहरा फोटोजेनिक है, बल्की उसकी भाषा और भाव भंगिमा भी युवाओं के बीच कहर ढाता है. इसके साथ ही अम्बा पिछड़ी जाति से आती है, जिसकी आबादी हजारीबाग संसदीय क्षेत्र में करीबन 50 फीसदी की है, और खास कर जिस तेली जाति से अम्बा खुद आती है, उसकी भी एक बड़ी आबादी हजारीबाग संसदीय सीट में हैं. रही बात सियासी समीकरण की तो हजारीबाग संसदीय क्षेत्र में आने वाले पांच विधान सभाओं में दो पर आज भी कांग्रेस का कब्जा है, बरही से उमाशंकर अकेला तो बरकागांव से खुद अम्बा प्रसाद विधायक हैं, यह वही बरकागांव विधान सभा है, जहां पिछले दो दशक से योगेन्द्र साव का सिक्का चलता है. जिसकी विरासत को आज अम्बा आगे बढ़ा रही है.

    भाजपा के किले में योगेन्द्र साव का जादू

    ध्य़ान रहे कि इसी बरकागांव विधान सभा से वर्ष 2009 में अम्बा के पिता योगेन्द्र साव ने अपने सियासी जीवन की शुरुआत की थी. उसके बाद आज तक योगेन्द्र साव ने भाजपा-आजसू को बरकागांव के इस किले में इंट्री का मौका नहीं दिया. इसके पीछे बरकागांव का सामाजिक समीकरण है. दलित आदिवासी, पिछड़ा और अल्पसंख्यकों का मजबूत गठजोड़ है. हालांकि इस बीच योगेन्द्र साव और उनके परिवार पर कई आरोप लगें, कानूनी मुश्किल भी आयी. लेकिन बड़कागांव की जनता ने योगेन्द्र साव का साथ नहीं छोड़ा. अम्बा को विश्वास है कि बड़कागांव की जनता इस बार भी साथ खड़ा नजर आयेगी. दलित, आदिवासी, पिछड़ा और अल्पसंख्यकों के जिस समीकरण के बूते योगेन्द्र साव ने बरकागांव का सुरक्षित किला तैयार किया है. अम्बा की योजना अब उस किले का विस्तार हजारीबाग संसदीय सीट तक करने की है. दावा किया जाता है कि इसी किलेबंदी के कारण संघ परिवार हैरान-परेशान था. उसे मनीष जायसवाल की गाड़ी वक्त से पहले डूबती नजर आने लगी थी, और वह किसी भी हालत में अम्बा को मैदान से बाहर करने पर आमदा था. और यह भी कोई छुपी सच्चाई नहीं है कि भाजपा उम्मीदवारों के चयन में संघ परिवार भूमिका क्या होती है? उम्मीवारों का एक संभावित लिस्ट संघ परिवार के द्वारा भी भाजपा मुख्यालय को भेजा जाता है. इस हालत में यदि अम्बा प्रसाद संघ परिवार को कटघरे में खड़ा कर रही है, तो इसे सिरे से नकारा कैसे जा सकता है?

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