खतरों के खिलाड़ी सीएम हेमंत की मुश्किलें बढ़ी! नये साल का पहला सप्ताह झामुमो की सियासत का साबित हो सकता है टर्निंग प्वाइंट

    खतरों के खिलाड़ी सीएम हेमंत की मुश्किलें बढ़ी! नये साल का पहला सप्ताह झामुमो की सियासत का साबित हो सकता है टर्निंग प्वाइंट

    TNP DESK-बड़गाई अंचल राजस्व कर्मचारी भानू प्रताप के विरुद्ध दर्ज ईसीआईआर (RNZO-25/23)  मामले में ईडी ने सीएम हेमंत को सातवां समन भेज कर यह साफ कर दिया है कि नये साल यह उमंग और उत्साह झामुमो समर्थकों पर भारी पड़ने  वाला है. अपने सातवें समन ने ईडी ने सीएम हेमंत को उस स्थान और समय का चुनाव करने का विकल्प दिया है, जो खुद उनके और ईडी अधिकारियों के लिए भी मुफीद हो. साफ है कि ईडी ने सीएम हेमंत के सामने स्थान और समय चुनने का विकल्प देकर कठीन चुनौती पेश कर दी है, अब उनके सामने पूरे एक सप्ताह का समय है, और वह अपनी व्यस्ता का हवाला देकर इस समन से पीछा नहीं छोड़ा सकतें.  

    फिल्म सौदगार के डायलॉग की याद दिलाता है ईडी का यह समन

    दरअसल ईडी की यह भाषा फिल्म सौदगार के उस डायलॉग की याद दिलाती है कि, जिसमें राजेश्वर उर्फ राजकुमार डायलॉग किंग दिलीप कुमार के सामने डायलॉग मारता कि “हम तुम्हे मारेंगे, लेकिन वह बंदूक भी हमारी होगी और वक्त भी हमारा होगा” हालांकि यहां डायलॉग में थोड़ा बदलाव आया है, यहां ईडी ने सीएम हेमंत से अपनी मर्जी का वक्त मुकर्रर करने की चुनौती पेश कर दी है, तो क्या झारखंडी की सियासत में खतरों के खिलाड़ी के रुप में अपने आप को प्रतिस्थापित कर चुके सीएम हेमंत एक और खतरा मोल लेंगे? क्या वह इस आग से गुजर कर अपने सियासी जीवन की सबसे मुश्किल चुनौती से बाहर निकल पायेंगे? या फिर कहें कि इस आदिवासी-मूलवासी शेर को कैद करने की सारी तिकड़में तैयार हो चुकी है?

    सवाल किसी फिल्म के डॉयलाग का नहीं, झारखंड के बदलते सियासी रंग का है

    क्योंकि यहां सवाल किसी फिल्म के डॉयलाग का नहीं है, सवाल झारखंड की सियासत और इस पूछताछ के बाद उसके बदलते रंग का है. उसके संभावित परिणाम-दुष्परिणाम का है, क्या सीएम हेमंत ईडी की इस खुली चुनौती को स्वीकार करने वाले हैं. और क्या समन दर समन भेज कर इस ठंड में भी सियासी गर्मी का एहसास करवाती ईडी के पास इस समन को भी डस्टबिन के हवाले किये जाने के बाद कोई दूसरी प्लानिंग तैयार है? और यदि वह दूसरी प्लानिंग तैयार है, तो क्या (सीएम हेमंत की भाषा में) उसके पॉलिटिक्ल आका इस खतरे का सामना करने को तैयार है, इसके संभावित दुष्परिणाम को झेलने का मादा उनके पास है. क्या भाजपा 2024 के महासंग्राम के ठीक पहले झारखंड में एक नया संग्राम खड़ा कर आदिवासी-मूलवासी मतदाताओं का सामना करने का सियासी हौसला रखता है.

    क्या खतरों के खिलाड़ी के प्रचारित छवि से बाहर निकलेंगे हेमंत?

    हालांकि सवाल खुद सीएम हेमंत के लिए भी है. क्या खतरों के खिलाड़ी के जिस अवतरण में सीएम हेमंत ने अब तक छह-छह समन को डस्टबिन के हवाले किया है, क्या इस बार वह इस अपने मर्जी के स्थान पर समय पर उसके सवालों का जवाब पेश करने की चुनौती स्वीकार करेंगे. लेकिन इसमें खतरा यह है कि अब उनके समर्थक ही यह सवाल उठाने लगेंगे कि जब छह छह समन को अनसुनी की गयी कि तो इस सातवें समन का सामना करना का औचित्य क्या था? और बड़ा खतरा यह है कि यदि वाकई ईडी अपने कथित साक्ष्यों और सबूतों के आधार पर इस पूछताछ में सीएम हेमंत को गिरप्तार करने का फैसला लेती है तो उनके समर्थक समर्थक समूहों में जो प्रतिक्रिया होगी वह तो होगी, लेकिन झामुमो में इसकी वैकल्पिक व्यवस्था क्या है?

    क्या छत्तीसगढ़ में एक आदिवासी चेहरा सामने लाकर भाजपा ने सीएम हेमंत की गिरफ्तारी का रास्ता साफ कर दिया

    क्योंकि एक बार यदि गिरप्तारी हो जाती है तो बेल लेने की लम्बी प्रक्रिया होगी. उसकी अपनी न्यायिक और कानूनी प्रक्रिया है, जिससे उन्हे गुजरना होगा. तब उस हालत में बडा सवाल यह होता कि झामुमो का वह चेहरा कौन होगा जिसके सिर पर सीएम पद की जिम्मेवारी सौंपी जायेगी. क्या उस कठीन दौर में झामुमो कल्पना सोरेन के चेहरे पर दांव खेल कर आदिवासी मूलवासी मतदाताओं के बीच यह पैगाम देने का सामर्थ्य और जज्बा रखती है कि जमीन घोटला तो महज एक बहाना है, असली मकसद तो एक आदिवासी चेहरे को सीएम कुर्सी से हटाना है. क्योंकि इसके पहले सीएम हेमंत कई बार सार्वजनिक मंचों से इस बात का दावा कर चुके हैं कि चुंकि वह छठी अनुसूची के एकमात्र आदिवासी सीएम है, और भाजपा को किसी आदिवासी को सीएम की कुर्सी तक पहुंचना गंवारा नहीं है, हालांकि तीन राज्यों के चुनावी फतह के बाद तस्वीर काफी हद तक बदल चुकी है, अब भाजपा ने छत्तीसगढ़ में एक आदिवासी सीएम खड़ा कर सीएम हेमंत के इस दावे को भोथरा कर दिया है, तो क्या सिर्फ सीएम हेमंत की गिरफ्तारी के लिए ही भाजपा ने छत्तीसगढ़ में आदिवासी सीएम का दांव खेला है. और यदि यह दांव सिर्फ सीएम हेमंत की गिरफ्तारी के लिए ही खेला गया है तो निश्चित रुप से सीएम हेमंत की इस गिरफ्तारी का असर झारखंड के साथ ही छत्तीसगढ़ में भी अपना रंग दिखलायेगा.

    गिरफ्तारी या पूछताछ के बहाने सीएम हेमंत का चरित्र हनन का प्लानिंग 

    अब देखना होगा कि सीएम हेमंत कौन सा रास्ता अख्तियार करते हैं. लेकिन इतना तय है कि ईडी ने इस सातवें समन से झामुमो समर्थकों के नव वर्ष के उत्साह और उमंग पर पानी फेरने का काम किया है. हालांकि जानकारों का दावा है कि भाजपा के सियासतदान किसी भी कीमत पर 2024 के लोकसभा से पहले सीएम हेमंत को गिरफ्तार नहीं करने वालें. क्योंकि इस गिरफ्तारी से भाजपा को लाभ की तुलना में सियासी नुकसान कुछ ज्यादा ही होगा, यदि इस गिरफ्तारी के बाद सीएम हेमंत के पक्ष में सहानूभूति की लहर चल पड़ी तो झारखंड में कमल खिलना और खिलाना टेढ़ी खीर बन जायेगी, इसलिए गिरफ्तारी की संभावना तो दूर दूर तक नजर नहीं आती, हां इतना जरुर हो सकता है कि इस पूछताछ के बहाने हेमंत की छवि को इस कदर दागदार बनाया जाय कि अपने ही समर्थक समूहों के बीच उनकी छवि एक विलेन की बन जाए. सीएम हेमंत को इसी सियासत का काट ढूढ़ना है.   

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