टीएनपी डेस्क(TNP DESK):झारखंड आदिवासी समाज के लोगों की संस्कृति काफी गौरवशाली है, जहां पर्व-त्योहार से लेकर नाच-गाना तक सबकी अपनी ही अलग पहचान है. वहीं बात अगर शादी-विवाह की आती है तो इसकी भी रस्में काफी अलग तरह से निभाई जाती है. आज हम इसके बारे में ही बात कर रहे है.
शादी की अनोखी परंपराएं
आपको बताएं कि सरायकेला-खरसावां और आसपास के आदिवासी समाजों की शादी की परंपराएं बहुत ही अनोखी और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध होती है. यहां विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि पूरे समाज का सामूहिक उत्सव माना जाता है.इसी कारण यहां की कई रस्में अन्य समुदायों से अलग दिखाई देती है.इन्हीं परंपराओं में एक खास बात यह है कि आदिवासी समाज में दूल्हा घोड़ी पर सवार नहीं होता.इस परंपरा के पीछे सबसे बड़ा कारण सादगी और समानता की भावना है.आदिवासी समाज में दिखावे, आडंबर और शाही परंपराओं को महत्व नहीं दिया जाता.
समाज में बराबरी की भावना को सर्वोपरि
घोड़ी पर बैठकर बारात निकालना एक तरह की राजसी या शाही परंपरा मानी जाती है, जो उनके जीवन दर्शन से मेल नहीं खाती.यहां जीवनशैली सरल होती है और समाज में बराबरी की भावना को सर्वोपरि रखा जाता है.इसके अलावा आदिवासी विवाह की सबसे बड़ी विशेषता सामूहिकता है.शादी को केवल दूल्हा-दुल्हन तक सीमित नहीं रखा जाता, बल्कि पूरा गांव इसमें शामिल होता है.बारात में लोग पारंपरिक वाद्य जैसे मांदर, ढोल, नगाड़ा के साथ नाचते-गाते हुए दुल्हन के घर तक जाते है.ऐसे में दूल्हा पैदल चलकर इस सामूहिक उत्सव का हिस्सा बनता है, जिससे समाज में एकता और भाईचारे का संदेश जाता है.
घोड़ी जैसी शाही सवारी का उपयोग उनकी परंपरागत जीवनशैली का हिस्सा
एक और महत्वपूर्ण कारण है प्रकृति और जमीन से जुड़ाव.आदिवासी समाज हमेशा से जंगल, जमीन और प्रकृति के साथ गहराई से जुड़ा रहा है.घोड़ी जैसी शाही सवारी का उपयोग उनकी परंपरागत जीवनशैली का हिस्सा नहीं रहा है. इसलिए वे अपनी सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखते हुए साधारण तरीके से विवाह करते है.इसके साथ ही, आदिवासी शादी में नृत्य और संगीत का विशेष महत्व होता है.बारात में शामिल लोग पारंपरिक गीतों और नृत्यों के साथ पूरे रास्ते को उत्सव में बदल देते है.यह माहौल घोड़ी या किसी शाही सवारी की बजाय सामूहिक भागीदारी को अधिक महत्व देता है.
समाज की यह परंपरा केवल एक रस्म नहीं
निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि सरायकेला और आसपास के आदिवासी समाज की यह परंपरा केवल एक रस्म नहीं, बल्कि उनकी जीवनशैली, सोच और सांस्कृतिक मूल्यों का प्रतिबिंब है दूल्हे का घोड़ी पर न चढ़ना इस बात का प्रतीक है कि यहां विवाह में दिखावे से ज्यादा समानता, सादगी और सामूहिकता को सर्वोच्च स्थान दिया जाता है.

