आदिवासी महिलाएं एक दिन के लिए क्यों त्याग देती हैं सिंदूर और चूड़ियां, क्या है यह अनोखी परंपरा, जानिए

    आदिवासी महिलाएं एक दिन के लिए क्यों त्याग देती हैं सिंदूर और चूड़ियां, क्या है यह अनोखी परंपरा, जानिए

    जमशेदपुर (JAMSHEDPUR): झारखंड समेत देश के कई आदिवासी बहुल क्षेत्रों में मनाया जाने वाला सेंदरा पर्व अपनी विशिष्ट परंपराओं और सांस्कृतिक महत्व के लिए जाना जाता है. इस पर्व के दौरान आदिवासी समाज में एक ऐसी परंपरा निभाई जाती है, जो पहली नजर में चौंकाने वाली लग सकती है. महिलाएं एक दिन के लिए अपने सुहाग के प्रतीक जैसे सिंदूर मिटा देती हैं और चूड़ियां तक तोड़ देती हैं. दरअसल, यह परंपरा किसी अशुभ संकेत का प्रतीक नहीं, बल्कि एक गहरे सामाजिक और सांस्कृतिक भाव को दर्शाती है. सेंदरा पर्व मुख्य रूप से शिकार से जुड़ा पर्व है. इसमें आदिवासी समाज के पुरुष जंगलों में सामूहिक शिकार के लिए निकलते हैं. शिकार पर्व केवल परंपरा नहीं, बल्कि सामुदायिक एकता, साहस और प्रकृति के साथ संबंध का प्रतीक माना जाता है. झारखंड के सरायकेला-खरसावां जिले में स्थित दलमा में प्रत्येक साल शिकार पर्व (सेंदरा) मनाया जाता है. इस साल 23 अप्रैल को यहां शिकार पर्व मनाया जाएगा. इस दिन आदिवासी पुरुष पारंपरिक हथियार के साथ दलमा में जाते है और शिकार खेलते है.

    पुरुषों के वापस लौटने पर करती है साज-श्रृंगार
    जब पुरुष शिकार के लिए जाते हैं, तब महिलाएं प्रतीकात्मक रूप से अपने श्रृंगार का त्याग कर देती है. पुरुष खुद अपनी पत्नियों का सिंदूर मिटाते है. यह एक तरह का प्रतीकात्मक व्रत है. इसमें महिलाएं अपने सुख-सौभाग्य के चिह्नों को त्यागकर प्रकृति और देवताओं से प्रार्थना करती हैं. मान्यता है कि शिकार के दौरान किसी अनहोनी से बचाव के लिए महिलाएं अपने स्तर पर यह त्याग करती हैं. जैसे ही पुरुष सकुशल लौट आते हैं, महिलाएं फिर से सिंदूर लगाती हैं और चूड़ियां पहनती हैं. इसके बाद पूरे गांव में उत्सव का माहौल बन जाता है. 

    पुरुषों की दिया जाता है शहीद का दर्जा
    शिकार पर जाने वाले पुरुष की शिकार खेलने के दौरान अगर मौत हो गई तो उन्हें शहीद का दर्जा दिया जाता है. मरने वाले पुरुष का शव भी गांव नहीं लाया जाता है. जंगल में ही उसका अंतिम संस्कार किया जाता है. दलमा राजा राकेश हेंब्रम ने बताया कि शिकार पर्व के दौरान आदिवासी समाज अपनी परंपरा का निर्वहन करता है. इस बार भी हजारों की संख्या में शिकारियों का जुटान दलमा में होगा. 

    23 अप्रैल को मनेगा सेंदरा
    दलमा बुरू दिसुआ सेंदरा समिति की ओर से इस बार दिसुआ सेंदरा 23 अप्रैल को मनाया जाएगा. दलमा की तलहटी में 22 अप्रैल को शिकारी जुटेंगे. दलमा राजा द्वारा पूजा करने के बाद शिकारी जंगल जाएंगे. इधर, वन विभाग ने शिकार पर्व की तैयारी शुरू कर दी है. वन विभाग यह प्रयास कर रहा है कि दलमा में जंगली जानवरों का शिकार ना हो. 


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