सोहराय पर्व में खूंटव माह का क्या है महत्व, कैसे मनाया जाता है खूंटव

    सोहराय पर्व में खूंटव माह का क्या है महत्व, कैसे मनाया जाता है खूंटव

    दुमका  (DUMKA) : इन दिनों दुमका ही नहीं संताल परगना प्रमंडल में हर जगह सोहराय पर्व की धूम मची है. शहर से लेकर गांव तक, गली मुहल्ले से लेकर चौक चौराहे तक परंपरागत परिधान पहने स्त्री पुरुष, वृद्ध बच्चे, युवक युवती एक साथ कदमताल करते नजर आ जायेंगे. सोहराय के गीत और परंपरागत वाद्ययंत्र से निकली मधुर धुन पर संताल समाज के लोग तमाम गम को भूलकर जमकर मस्ती करते नजर आते है.

    खूंटव माह में पशु की होती है पूजा

    सोहराय पर्व संताल समाज का सबसे बड़ा पर्व है. इसकी तुलना हाथी से की जाती है. प्रकृति पूजक संताल समाज के लोग सोहराय पर्व के बहाने पशु की पूजा करते है. साथ ही यह पर्व भाई बहन के अटूट स्नेह को दर्शाता है. सोहराय पर्व 5 दिनों का होता है. हर दिन का अलग अलग नाम और अपना महत्व है. सोहराय पर्व का तीसरा दिन खूंटव माह कहा जाता है. समाजसेवी सच्चिदानंद सोरेन बताते है कि खूंटव माह में पशु की प्रति कृतज्ञता जताते हुई उसकी पूजा की जाती है. मानना है कि कृषि कार्य में पशु का अहम योगदान होता है. उसके अथक मेहनत के बदौलत फसल तैयार होता है. सोहराय के तीसरे दिन ग्रामीण अपने घर के सामने खूंटा गाड़ते हैं. उसमें गाय, भैंस या बैल को बांधते हैं. उसके बाद विधिवत पशु की पूजा करते हैं. घर के सभी सदस्य पशु के सम्मान में डोबोह (जोहर) करते हैं. उसके बाद सभी सदस्य पशु के चारों ओर मंदार की थाप पर नाच गान करते हैं.

    समय के साथ लोग भूल रहे हैं अपनी सांस्कृतिक विरासत खूंटव माह को: सच्चिदानंद

    समाजसेवी सच्चिदानंद सोरेन बताते है कि समय के साथ साथ सोहराय पर्व में भी बदलाव आ रहा है. लोग सोहराय में नाच गान खूब करते है लेकिन खूंटव खूंटव माह नहीं मानते हैं. कई गांव में यह परंपरा बंद होने के कारण खूंटव विलुप्त हो रहा है.

    दूंदिया और धतिकबोना गांव में एक दशक बाद हुआ खूंटव माह

    दुमका प्रखंड के दूंदिया और धतिकबोना गांव में भी लगभग एक दशक से खूंटव माह का आयोजन नहीं हो रहा था. सरी धर्म अखड़ा, दिसोम मरांग बुरु युग जाहेर अखड़ा और दिसोम मरांग बुरु संताली आरीचली आर लेगचर अखड़ा के संयुक्त प्रयास से इस वर्ष दोनों गांव में ग्रामीणों ने सोहराय का खूंटव माह धूमधाम से मनाया. इस पर खुशी व्यक्त करते हुए सच्चिदानंद सोरेन कहते हैं कि अपनी सांस्कृतिक विरासत को कायम रखना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है.

    मौके पर रहे मौजूद

    इस मौके में सुरेश टुडू, सोम हांसदा, माने टुडू, सुलेमान मुर्मू, सुनील टुडू, सुजीत मुर्मू, सुमित हांसदा, पलटन किस्कु, नंदलाल सोरेन, अशोक मुर्मू, सुनील मरांडी, मंगल मरांडी, विनोद हेंब्रम, शीतल मरांडी, सूरज मरांडी, लुखीराम मुर्मू, मति हेंब्रम, सुनीता मुर्मू, मकलू हांसदा, निशा मरांडी, सनिया सोरेन, सोनी सोरेन,  नैनतारा हेंब्रम, पकलू मुर्मू, सुहागिनी हेंब्रम आदि मौजूद रहे.

    रिपोर्ट-पंचम झा


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