हॉकी से लेकर तीरदांजी तक आदिवासी-मूलवासी बेटियों का परचम, बावजूद झारखंड राज्य एथलेटिक्स एसोसिएशन में कहां खड़ें हैं आदिवासी चेहरे

    हॉकी से लेकर तीरदांजी तक आदिवासी-मूलवासी बेटियों का परचम, बावजूद झारखंड राज्य एथलेटिक्स एसोसिएशन में कहां खड़ें हैं आदिवासी चेहरे

    रांची(RANCHI) दौड़ हो या हॉकी, तीरंदाजी हो एथलीट झारखंड की आदिवासी-मूलवासी बेटियों ने हर जगह कमाल दिखलाया, मेहनत और समर्पण के बल पर हमारी बेटियों ने देश और राज्य का नाम रोशन किया, बेहद सीमित संसाधनों के बल पर सफलता का परचम लहराया. लेकिन जब बात झारखंड राज्य एथलेटिक्स एसोसिएशन की आती है, तब इनकी भागीदारी किसी कोने में दुबकी नजर आती है.

    खेल संगठनों में आदिवासी-मूलवासियों की अपर्याप्त भागीदारी का सवाल मुद्दा क्यों नहीं बन पाता?

    हालांकि राजनीति में आदिवासी-मूलवासियों की भागीदारी के सवाल को प्रमुखता से उठाया जाता रहा है, और एक अर्से के बाद उसका परिणाम भी दिखने लगा, काफी जद्दोजहद के बाद अब उनकी भागीदारी और मुद्दों को सम्मान दिया जाने लगा है. उनके प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित किया जाने लगा, लेकिन खेल संगठनों में उनकी अपर्याप्त भागीदारी का सवाल मुद्दा क्यों नहीं बन पाता?

    39 खेल संघों में महज दो पर नजर आते हैं आदिवासी मूलवासी चेहरे

    यहां याद दिला दें कि झारखंड में फिलहाल 39 खेल संघ हैं. इसमें से 34 ओलंपिक एसोसियशन का हिस्सा हैं, लेकिन इन संगठनों के प्रशासनिक पदों पर कोई आदिवासी-मूलवासी चेहरा नजर नहीं आता, और तो और यहां वह बेटियां भी नजर नहीं आती जो बासी रोटी खा कर और लकड़ी चुनते हुए भी अपने जज्बे को दफन होने नहीं देती, और देश और विदेश में अपना कमाल दिखाती हैं. कम से कम इन खेल संगठनों में तो हमारी बेटियों को सम्मानजनक प्रतिनिधित्व मिलना ही चाहिए था. आज ले-देकर पूर्णिमा महतो और आश्रिता लकड़ा का नाम ही सामने आता है, इसमें पूर्णिमा महतो झारखंड तीरंदाजी संघ की सचिव हैं और आश्रिता लकड़ा हॉकी संघ की कोषाध्यक्ष है. लेकिन इसके आगे कोई नाम नजर नहीं आता.

    सवाल सिर्फ महिलाओं की भागीदारी का नहीं, आदिवासी मूलवासियों के प्रतिनिधित्व का है

    आज भी पश्चिमी सिंहभूम के कुमारडुंगी की रहने वाली बसंती कुमारी 28 जुलाई से 8 अगस्त के बीच चीन के चेंगदू में 10,000 मीटर दौड़ में भाग लेने की तैयारियों में जुटी हैं. सपना कुमारी, फ्लोरेंस बारला, आशा किरण, प्रियंका केरकेट्टा आदि ने विदेशी धरती झारखंड और भारत का सीना चौड़ा किया है, लेकिन इन बेटियों के हिस्से में कभी सचिव, अध्यक्ष या कोषाध्यक्ष का पद नहीं आया. यहां सवाल सिर्फ महिलाओं की भागीदारी का नहीं है, सवाल तो उस व्यवस्था है, जहां खेल में तो आदिवासी-मूलवासी चेहरे तो नजर आते हैं, लेकिन जब बात पदों की आती है तो उनकी भागीदारी नगण्य हो जाती है.

    खेल संघ का तर्क- महिलाओं में शादी पहली प्राथमिकता

    हालांकि झारखंड एथलेटिक्स एसोसिएशन के अध्यक्ष मधुकांत पाठक महिलाओं की भागीदारी के सवाल पर कुछ चिंतित नजर आते हैं, उनकी भागीदारी को बढ़ाने की बात करते हैं, लेकिन उनका कहना है कि अंतर्राष्ट्रीय ओलंपिक संघ ने वर्ष 2036 तक सभी खेल संघों में महिलाओं की भागीदारी को कम से कम 30 फीसदी करने का दिशा निर्देश दिया है, लेकिन सवाल यहां आदिवासी-मूलवासियों की भागीदारी का है. भले ही वह बेटियां हो या पुरुष, आज तो दोनों ही खेल संघों में हाशिये पर खड़े हैं, इसका क्या उपचार हैं, झारखंड जैसे राज्य में आदिवासी मूलवासियों की खेल संघों में अपर्याप्त भागीदारी कई गंभीर सवाल खड़े करता है.

    आदिवासी मूलवासियों की अपर्याप्त भागीदारी को छुपाने के लिए गढ़े गये तर्क

    एक सवाल के जवाब में पाठक कहते हैं कि खेल संघों में अध्यक्ष, सचिव और कोषाध्यक्ष जैसे पद काफी महत्वपूर्ण होते हैं, लेकिन महिलाओं की इसमें कोई खास रुचि नहीं देखी जाती, उनकी कोशिश शादी के बाद अपना घर बसाने की होती है, बाल बच्चों की परवरिश की होती है. लेकिन क्या आदिवासी मूलवासी पुरुषों की यही स्थिति है, या आदिवासी-मूलवासियों की अपर्याप्त भागीदारी को छुपाने के लिए इस तरह के तर्क इजाद किये जाते हैं.


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