क्या पर्व त्यौहार के दिन मृत्यु होने से मिल जाता है मोक्ष, पढ़े आखिर क्यों भीष्म पितामह ने मरने के लिए किया था मकर संक्रांति का इंतज़ार


टीएनपी डेस्क(TNP DESK):जीवन या मृत्यु किसी के हाथ में नहीं है जिसे जब जन्म लेना है वह लेगा और जिसे जब मरना है वह मरेगा, लेकिन फिर भी मृत्यु को लेकर लोगों के मन में कई तरह की भ्रमिक सोच है.कुछ लोगों का मानना है कि अगर त्योहारों के दिन किसी की मृत्यु हो जाती है तो स्वर्ग उसको प्राप्त होता है या मोक्ष मिल जाता है.वही बात अगर मकर संक्रांति की आती है तो इसे लेकर लोगों के मन में कई तरह की भ्रम की स्थिति देखी जाती है कई लोगों का मानना है कि मकर संक्रांति के दिन मरे हुए व्यक्ति को मोक्ष प्राप्त प्राप्त होता है वह स्वर्ग में चला जाता है.
आध्यात्मिक दृष्टि से विशेष है मकर संक्रांति
आपको बता दें कि 14 जनवरी को सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश कर जायेंगे.इस दिन मकर संक्रांति का पर्व पुरे देश में मनाया जायेगा.वैसे तो मकर संक्रांति तील, गुड़, दान पुण्य आदि का प्रतीक माना जाता है लेकिन यदि आध्यात्मिक दृष्टि से इसे देखा जाए तो यह काफी ज्यादा विशेष है क्योंकि मकर राशि में सूर्य उत्तरायण हो जाते है, वहीं इसको देवी देवताओं का काल माना जाता है.शास्त्रों के अनुसार जब सूर्य मकर राशि में उत्तरायण होते हैं तो स्वर्ग के द्वार खुल जाते है.इस दिन यदि किसी की भी मृत्यु होती है तो मरने वाले को मोक्ष की प्राप्ति होती है जबकी दक्षिणायन में मृत्यु होने पर जन्म मरन के चक्र से गुजरना पड़ता है.
पर्व त्यौहार के दिन मरने से क्या होता है ?
आपको बताये कि यदि पर्व त्योहारों के दिन किसी की मृत्यु होती है तो लोगों के मन में कई तरह की भ्रम की स्थिति देखी जाती है. लोगों के मन में यह सवाल उठता है यदि मकर संक्रांति के दिन किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है, तो इसके क्या धार्मिक मान्याएं है.व्यक्ति को नरक, नसीब होगा या स्वर्ग चलिए जानते है.
इसका दिन खुल जाते है स्वर्ग के द्वार
आपको बता दें कि जब सूर्य देव मकर राशि में उत्तरायण होते है तो स्वर्ग के द्वार खुले होते है इसलिए मकर संक्रांति के दिन यदि किसी की मृत्यु होती है तो व्यक्ति की आत्मा को सीधे स्वर्ग का रास्ता मिल जाता है, उसे जीवन मरण के चक्र से मुक्ति मिलती है और वह मोक्ष को प्राप्त करता है.सूर्य के मकर राशि में उत्तरायण होने को भगवान और देवी देवताओं का समय माना जाता है इसलिए इस दिन मृत्यु के बाद आत्मा भगवान के चरणों में जाती है.
भीष्म पितामह ने मरने के लिए किया था मकर संक्रांति का इंतज़ार
आपको बता दें कि महाभारत में इस बात का प्रमाण मिलता है. महाभारत के भीष्म पितामह की कहानी हमें बताती है कि मकर संक्रांति के दिन अगर किसी की मृत्यु होती है तो मोक्ष की प्राप्ति होती है दरअसल भीष्म पितामह को इच्छा मृत्यु का वरदान मिला हुआ था. इसका मतलब यह होता है कि वह व्यक्ति जब चाहे तो अपनी इच्छा के अनुरूप मर सकता है. जब महाभारत के दसवें दिन भीष्म पितामह के शरीर में अर्जुन ने बाण से पूरी तरह छलनी कर दीया था तो भीष्म पितामह पूरी तरह से घायल होकर जमीन पर गिर पड़े थे, लेकिन प्राण नहीं त्यागा था क्योंकि वह सूर्यदेव के दक्षिणायन में थे.सूर्यदेव के मकर राशि में उत्तरायण होने का इंतजार किया और मकर संक्रांति के दिन ही अपने शरीर को त्यागा.
दक्षिणायन का काल है अशुभ
शास्त्र के अनुसार प्राण त्यागने के लिए दक्षिणायन का काल सही नहीं माना जाता है इसलिए भीष्म पितामह ने सूर्य के उत्तरायण होने का इंतजार किया था.अब बता दे कि महाभारत के भीष्म पितामह बुद्धि बल और कौशल से परिपूर्ण थे जानता थे कि यदि वह दक्षिणायन काल में प्राण त्यागते है तो उन्हें जीवन मरण के चक्र से दोबारा गुजरना पड़ेगा और उनके आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति नहीं होगी.
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