धनबाद (DHANBAD): कोयले के वैध-अवैध कारोबार की वजह से धनबाद कोयलांचल में अपराध की जड़ें समय के अनुसार फैलती और सिकुड़ती गई. कोयला उद्योग के राष्ट्रीयकरण के पहले के अपराध पर नजर डाले तो अपराध का तरीका कुछ अलग था. राष्ट्रीयकरण के बाद अपराध का तरीका बदला और माफिया संस्कृति तेजी से फ़ैली. 1960 या उसके पहले प्राइवेट मालिकों का जमाना था. प्राइवेट मालिक कोयला मजदूरों से अधिक काम लेने के लिए कई हथकंडे अपनाते थे. उसी हथकंडों में यह भी शामिल था कि कोयला मालिक लठैत रखते थे. इनका काम था कि कोयला मजदूरों से अधिक से अधिक उत्पादन कराया जाए. यह लठैत कोयला खान मालिकों के "मुखौटा" होते थे.
वह समय बीपी सिन्हा का था, जिनकी खूब चलती थी
जानकार बताते हैं कि वह समय बीपी सिन्हा का था, जिनकी बड़ी चलती थी. वैसे, धनबाद ज़िले की जैसे-जैसे आबादी बढ़ती गई, उसी अनुपात में अपराधों की संख्या भी बढ़ने लगी. उस समय धनबाद का रेल संपर्क देशभर में स्थापित हो चुका था. बोकारो और सिंदरी में उद्योग लगने की चर्चा देश भर में फैलने लगी थी. कोयला कारोबार या कहें कोयला उद्योग तो पहले से ही चर्चा में था. उसे समय यह कहावत प्रचलित हुई थी कि "धनबाद में नोट हवा में उड़ते हैं, पकड़ने की अक्ल चाहिए" और शायद यही वजह रही कि बाहर के अपराधी भी धनबाद पहुंचने लगे और धीरे-धीरे अपना पैर जमाने लगे. उसे समय धनबाद में बिहार में था ही. बिहार के अपराधी भी यहां पर जमने लगे तो उत्तर प्रदेश के अपराधी भी यहां पहुंचने लगे थे.
बाहर के अपराधी नाम बदलकर कोलियरियों में करने लगे थे काम
बुजुर्ग लोग बताते हैं कि बाहर के अपराधी नाम बदलकर कोलियरियों में काम करने लगे और स्थानीय अपराधियों से संपर्क बनाकर क्राइम करने लगे. बड़े अपराध के लिए बाहर से अपने संपर्क सूत्र को बुलाते थे और अपराध करने के बाद बाहर चले जाते थे. जानकार बताते हैं कि 1960 से लेकर 1972 तक अपराधों की संख्या तेजी से बढ़ी 1980 के बाद अपहरण की भी घटनाएं होने लगी. इसके पहले अपराधी रात में डाका डालते थे. भारी पत्थर मार कर दरवाजा तोड़ देते थे और फिर लूटपाट करते थे. इसके समानांतर कोलियरियों पर कब्जा करने का काम भी शुरू हो गया था. बताते हैं कि कोयला उद्योग के राष्ट्रीयकरण के बाद मजदूर संगठनो की भी संख्या बढ़ी और धीरे-धीरे मजदूर संघो का भी अपराधीकरण हो गया. उसके बाद अपराधियों की एक तरह से समानांतर सरकार बन गई.
बीपी सिन्हा और सूर्यदेव सिंह के बीच खूब तनातनी भी चली
यह स्थिति आज भी कमोवेश बानी हुई है. उसके पहले बीपी सिन्हा और सूर्यदेव सिंह के बीच खूब तनातनी चली. कहते हैं कि बीपी सिन्हा की पहुंच सरकार से लेकर प्रशासन तक थी, तो सूर्य देव सिंह भी यहां अपनी एक फौजी खड़ी कर लिए थे. उसके बाद कई माफिया अलग-अलग गट बनाकर इसमें शामिल हो गए. यहां तक की फौज की नौकरी छोड़कर अपराधी किस्म के लोग कोयलांचल पहुंचे और गोली बंदूक का दबदबा कायम हो गया. बुजुर्ग बताते हैं कि सूर्यदेव सिंह कभी बीपी सिन्हा के बड़े और प्रबल समर्थक थे. बाद में दोनों में खटपट हो गई. खटपट बहुत ज्यादा हो गई. उसके बाद माफिया आपस में टकराने लगे और फिर उसके बाद इलाके पर कब्जे की जो लड़ाई शुरू हुई, वह कई वर्षों तक बनी रही. इसमें कई हत्याएं हुई, बीपी सिन्हा तक की हत्या हो गई. बीपी सिन्हा की हत्या के बाद सूर्यदेव सिंह का चल निकला और वह एक तरह से कोयलांचल पर अपनी दबदबा कायम करने में सफल रहे.

