Bihar Congress Politics: राहुल गांधी के फैसले से कांग्रेस को बिहार में कितना फ़ायदा, कितना नुकसान, पढ़िए इस रिपोर्ट में

    Bihar Congress Politics: राहुल गांधी के फैसले से कांग्रेस को बिहार में कितना फ़ायदा, कितना नुकसान, पढ़िए इस रिपोर्ट में

    Bihar Politics: बिहार में कांग्रेस ने दलित नेता के हाथ प्रदेश की बागडोर सौंप दी है.  इससे यह अंदाज लगाया जा रहा  है कि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने बिहार में सामाजिक न्याय पर ध्यान केंद्रित किया है.  लेकिन यहीं से सवाल उठता है कि इसे कांग्रेस को कितना फायदा होगा.  क्या 20% दलित वोट जदयू से छिटक  जाएंगे और कांग्रेस के पक्ष में हो जाएंगे.  या  राहुल गांधी ने सामाजिक न्याय का एक बड़ा संदेश बिहार में देने का प्रयास किया है औरंगाबाद जिले के कुटुंबा  से दूसरी बार विधायक बने राजेश कुमार को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है.  वह अब सांसद अखिलेश प्रसाद सिंह की जगह लेंगे.  राजेश कुमार की नियुक्ति यह  बताती  है कि कांग्रेस अब बदलाव के रास्ते पर चल रही है.  कांग्रेस सिर्फ बिहार ही नहीं, बल्कि अन्य प्रदेशों में संविधान बचाओ और अन्य सामाजिक न्याय के मुद्दों के जरिए वंचित समाज के बीच आक्रामक तरीके से पैठ  बनाने की कोशिश कर रही है.

    20% दलित समुदाय के वोट तो टारगेट नहीं 
     
     यह भी  कहा जा रहा है कि बिहार में चुनाव के मद्देनजर एक दलित नेता को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर 20% दलित समुदाय के वोट को अपने पक्ष में करने की कोशिश है.  यहां यह कहना गलत नहीं होगा कि लंबे समय से सत्तारूड़  जदयू का  दलित समाज समर्थन करता आ रहा है. इस वोट बैंक पर सबकी नजर है.  इधर, जदयू भी विधानसभा चुनाव में इस समुदाय का वोट अपने पक्ष में करने का प्रयास कर रहा है. सवाल यह भी उठ रहे हैं कि सामाजिक न्याय के मुद्दे के अलावा कांग्रेस प्रभारी की नई नियुक्ति और पैदल मार्च की शुरुआत के कुछ दिनों बाद राजेश कुमार की नियुक्ति सहयोगी दल राजद  को कोई संदेश तो नहीं है? क्या कांग्रेस पूरे बिहार में अपनी उपस्थिति का विस्तार करने को इच्छुक है? सूत्र तो यह भी बताते हैं कि राजेश कुमार की नियुक्ति वैसे नेताओं के लिए भी संदेश है, जो कांग्रेस में रहकर दूसरे दलों के साथ सहयोग की भावना रखते है. 

    नए प्रभारी और अखिलेश सिंह के बीचमतभेद की भी आ रही थी खबरें 
     
    यह भी कहा जाता है कि नए प्रभारी और अखिलेश सिंह के बीच कार्यशैली को लेकर मतभेद थे.  इस मतभेद को दूर करने के लिए यह सब किया गया है.  सवाल तो यह भी है कि कांग्रेस पूरे राज्य में अपना विस्तार कर क्या अकेले चुनाव लड़ना चाहती है? या राजद  के साथ गठबंधन बरकरार रख सीटों के लिए यह सब कर रही है.  यह भी हो सकता है कि सीट के बंटवारे को लेकर दबाव की राजनीति के तहत बिहार में कांग्रेस अपनी सक्रियता बढ़ा चुकी है.  फिलहाल कांग्रेस रोजगार को लेकर कन्हैया कुमार के नेतृत्व में पैदल मार्च यात्रा पर है.   यह बात भी सच है कि बिहार प्रदेश को राजनीति में परिपक्व माना जाता है.  

    कांग्रेस ने बिहार के साथ-साथ झारखंड में भी प्रभारी को बदल दिया है.

    कांग्रेस ने बिहार के साथ-साथ झारखंड में भी प्रभारी को बदल दिया है.  झारखंड के प्रभारी के राजू ने संथाल परगना में अभी हाल ही में कहा था कि कांग्रेस में रहते हुए कई लोग भाजपा के लिए काम करते है.  तो क्या बिहार में भी कांग्रेस में रहते हुए कई लोग  भाजपा और राजद  के साथ मधुर संबंध रखते हैं? यह सब ऐसे सवाल हैं, जिनका उत्तर आने वाले समय में मिल सकता है.  वैसे, कहा तो यही जाता है कि कांग्रेस दलित वोट समेटने के लिए दलित नेता को प्रदेश की कमान दी है.   राजेश कुमार की नियुक्ति से दलित समुदाय यह  महसूस करेगा कि  कांग्रेस जो कहती है, वह करती है. 

    नए तेवर के साथ चुनाव में उतरने की तैयारी में कांग्रेस 
     
    कांग्रेस बिहार विधानसभा चुनाव में नए तेवर के साथ उतरने की तैयारी में है.  कांग्रेस ने प्रदेश प्रभारी और प्रदेश अध्यक्ष को बदलकर अपनी आक्रामकता की शुरुआत कर दी है.  लेकिन फिर सवाल उठता है कि कांग्रेस को इससे कितना लाभ होगा.  कुछ वोट बैंक जुड़ेंगे तो कुछ के खिसकने का भी खतरा बना रहेगा.  देखना है कांग्रेस आगे आगे अपनी रणनीति में क्या बदलाव करती है? बिहार में और कितनो पर गाज गिराती है.

    रिपोर्ट -धनबाद ब्यूरो  


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