स्मार्ट फोन बच्चों का दोस्त या दुश्मन ? आइए डालते हैं एक नजर

    स्मार्ट फोन बच्चों का दोस्त या दुश्मन ? आइए डालते हैं एक नजर
    TNP DESK : आज के डिजिटल युग में स्मार्टफोन बच्चों के जीवन का एक अहम हिस्सा बन चुका है. पहले जहां बच्चों का अधिकतर समय खेल के मैदान, किताबों और दोस्तों के साथ बीतता था, वहीं अब मोबाइल स्क्रीन ने उनकी दिनचर्या में बड़ी जगह बना ली है. ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि स्मार्टफोन बच्चों का दोस्त है या दुश्मन.

    TNP DESK : आज के डिजिटल युग में स्मार्टफोन बच्चों के जीवन का एक अहम हिस्सा बन चुका है. पहले जहां बच्चों का अधिकतर समय खेल के मैदान, किताबों और दोस्तों के साथ बीतता था, वहीं अब मोबाइल स्क्रीन ने उनकी दिनचर्या में बड़ी जगह बना ली है. ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि स्मार्टफोन बच्चों का दोस्त है या दुश्मन.

    बच्चों के ज्ञान और जानकारी का बड़ा माध्यम बना  स्मार्टफोन 

    सबसे पहले यदि स्मार्टफोन के सकारात्मक पहलुओं की बात करें तो यह बच्चों के लिए ज्ञान और जानकारी का बड़ा माध्यम बन गया है. इंटरनेट के जरिए बच्चे दुनिया भर की जानकारी कुछ ही सेकंड में प्राप्त कर सकते हैं. ऑनलाइन क्लास, शैक्षणिक वीडियो, ई-बुक और शैक्षिक ऐप्स बच्चों की पढ़ाई को आसान और रोचक बना रहे हैं. खासकर कोरोना काल में जब स्कूल बंद थे, तब स्मार्टफोन ही शिक्षा का मुख्य साधन बन गया था. इसके अलावा कई ऐप्स बच्चों की रचनात्मकता को भी बढ़ावा देते हैं,जैसे ड्राइंग, म्यूजिक और भाषा सीखने वाले ऐप.

    बच्चों का एक अच्छा दोस्त साबित हो सकता है स्मार्टफोन

    स्मार्टफोन बच्चों को तकनीक के प्रति जागरूक भी बनाता है. आज के समय में डिजिटल ज्ञान बेहद जरूरी हो गया है. जो बच्चे कम उम्र से तकनीक का सही इस्तेमाल सीखते हैं वे भविष्य में नई तकनीकों को आसानी से समझ पाते हैं. इस लिहाज से देखा जाए तो स्मार्टफोन बच्चों का एक अच्छा दोस्त साबित हो सकता है.

    देखा जाए तो स्मार्टफोन का दूसरा पहलू उतना ही गंभीर

    लेकिन स्मार्टफोन का दूसरा पहलू भी उतना ही गंभीर है. अगर इसका इस्तेमाल बिना नियंत्रण के किया जाए तो यह बच्चों के लिए नुकसानदायक भी बन सकता है. कई बच्चे घंटों मोबाइल पर गेम खेलने, सोशल मीडिया देखने या वीडियो देखने में लगे रहते हैं. इससे उनकी पढ़ाई, नींद और शारीरिक गतिविधियों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. लंबे समय तक स्क्रीन देखने से आंखों की समस्या, सिरदर्द और मानसिक तनाव जैसी परेशानियां भी हो सकती हैं.

    ऑनलाइन गेम या सोशल मीडिया की लत के शिकार हो जाते हैं बच्चे

    इसके अलावा स्मार्टफोन बच्चों को इंटरनेट की दुनिया में ऐसे कंटेंट तक भी पहुंचा सकता है जो उनकी उम्र के लिए उपयुक्त नहीं होता. कई बार बच्चे ऑनलाइन गेम या सोशल मीडिया की लत के शिकार हो जाते हैं, जिससे उनका व्यवहार और सामाजिक जीवन भी प्रभावित होता है. वे परिवार और दोस्तों से दूर होते जाते हैं और अकेलेपन की समस्या बढ़ने लगती है.

    इस स्थिति में माता-पिता और शिक्षकों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण

    इस स्थिति में माता-पिता और शिक्षकों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है. बच्चों को स्मार्टफोन देने से पहले उसके सही उपयोग के बारे में समझाना जरूरी है. स्क्रीन टाइम तय करना, बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर नजर रखना और उन्हें खेलकूद, किताबों तथा रचनात्मक गतिविधियों के लिए प्रेरित करना आवश्यक है.

    स्मार्टफोन अपने आप में न तो पूरी तरह दोस्त है और न ही दुश्मन

    अंततः यह कहा जा सकता है कि स्मार्टफोन अपने आप में न तो पूरी तरह दोस्त है और न ही दुश्मन. यह इस बात पर निर्भर करता है कि इसका इस्तेमाल कैसे और कितनी मात्रा में किया जा रहा है. यदि सही मार्गदर्शन और संतुलन के साथ स्मार्टफोन का उपयोग किया जाए तो यह बच्चों के लिए ज्ञान और विकास का एक बेहतरीन साधन बन सकता है लेकिन यदि इसका अत्यधिक और अनियंत्रित उपयोग हो तो यह उनके शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है. इसलिए जरूरी है कि तकनीक और बचपन के बीच संतुलन बनाए रखा जाए.

     

     


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